लीलाधर मंडलोई
(1)
दीमक का घर
कमाल सुन्दर
लेकिन कितना जटिल
सीखता हूँ अपनी कविता रचना
दीमक की भाषा में
(2)
रेत के सजीले घरधूले
बनाए जिन्हें हमने
बचपन में
तोड़े अपनों ने
कभी सनक में
कभी अनजाने
इस तरह जाना हमने
घरों के टूटने का सच
(3)
मेरी भाषा सपनों की सहयात्राी है
जैसे कल देखा मैंने सपना
बरस रही थी आसमान से आग
आज मेरी भाषा यह पौधा रोप रही है
(4)
यह साधारण घटना नहीं
शर्म की बात हैµराम
कि एक स्त्राी ने
प्रतिरोध में
धरती की शरण ली
(5)
इतना दुख
इतना अपमान
इतनी घृणा
मिथिला के लोग
नहीं ब्याहते अपनी बेटी
अयोध्या में
(6)
मैंने प्रार्थना को धर्म से कभी नहीं जोड़ा
जैसे कि मेरी यह प्रार्थना
हर ग़रीब को
वह सब मिले
जो उसका हक़ है
(7)
इस सृष्टि के अन्तिम जीव के लिए
सिर्फ़ प्रेम नहीं
बल्कि उसके जीवन के लिए
लड़ाई का संकल्प है जिसमें
मैं उस धर्म के साथ हूँ
(8)
भारी चट्टान के नीचे
जल है
यह उस फूल ने कहा
सुना आपने!!
(9)
वह एक हत्यारा है
सबने कहा
एक और था वहाँ
कहा जिसने
‘जन्म से नहीं’
उसने सुनी थी
हत्यारे के रोने की आवाज़
(10)
उनके बारे में
कुछ सोचो
जिन्हें देखकर
उदास हो जाता है
कवि का मन
(11)
जब मुदित हो रहे थे
नये बजट पर
लोग
एक भूखा कुत्ता
पागल की गोद में
रो रहा था
(12)
उसने जीत लिया
भूख और दुःख को
सरकार अब
घबराई हुई है
(13)
बच्चे जब भूलने लगे रिश्ते
डूबने लगे
और नयी नातेदारियों में
माँ ने फिर
सुनाना शुरू कर दी
कथा-कहानी
बच्चे और-और
सुनने की ज़िद में
लौटने लगे घर
(14)
करवटें बदलते हुए अमूमन
रात बीत जाती है
कोई एक विचार आ धमकता है भयानक
और एक बैचेन नदी का शोर
सुनाई पड़ता है रात भर
पत्नी की साँसों में
बिल्ली के रोने की आवाज़ में
एक रात और बीत जाती है
(15)
मदन महल की पहाड़ी पर
कुदरत का आश्चर्य
एक बड़ी सी असम्भव चट्टान
नीचे छोटी वाली पर टिकी हुई
मुझे याद हो आया बचपन
माँ जैसे
अब गिरी कि तब
(16)
बिक रहा है खुलेआम
‘मिडनाइट हाॅट’
मैं इस पेशे में
और शर्मसार बहोत
खरीद लेगा एक दिन वह इसे भी
क्या मैं लड़ पाउ$ँगा जबकि
सरकार कह रही है ख़ुशआमदीद
(17)
बचपन में सुनी थी
रानी दीमक की कहानी
रानी दीमक यानि रानी माँ
माँ हम सबकी भी
लेकिन रानी नहीं
न पति के राज में
न उसके बाद
उनके लिए तो
वृंदावन धाम जलता हुआ
जहाँ कृष्ण बांसुरी बजाता है
(18)
दुःख से प्यार करो
जीत होगी
इसमें छिपा है
लड़ने का अमर नुस्ख़ा
(1)
दीमक का घर
कमाल सुन्दर
लेकिन कितना जटिल
सीखता हूँ अपनी कविता रचना
दीमक की भाषा में
(2)
रेत के सजीले घरधूले
बनाए जिन्हें हमने
बचपन में
तोड़े अपनों ने
कभी सनक में
कभी अनजाने
इस तरह जाना हमने
घरों के टूटने का सच
(3)
मेरी भाषा सपनों की सहयात्राी है
जैसे कल देखा मैंने सपना
बरस रही थी आसमान से आग
आज मेरी भाषा यह पौधा रोप रही है
(4)
यह साधारण घटना नहीं
शर्म की बात हैµराम
कि एक स्त्राी ने
प्रतिरोध में
धरती की शरण ली
(5)
इतना दुख
इतना अपमान
इतनी घृणा
मिथिला के लोग
नहीं ब्याहते अपनी बेटी
अयोध्या में
(6)
मैंने प्रार्थना को धर्म से कभी नहीं जोड़ा
जैसे कि मेरी यह प्रार्थना
हर ग़रीब को
वह सब मिले
जो उसका हक़ है
(7)
इस सृष्टि के अन्तिम जीव के लिए
सिर्फ़ प्रेम नहीं
बल्कि उसके जीवन के लिए
लड़ाई का संकल्प है जिसमें
मैं उस धर्म के साथ हूँ
(8)
भारी चट्टान के नीचे
जल है
यह उस फूल ने कहा
सुना आपने!!
(9)
वह एक हत्यारा है
सबने कहा
एक और था वहाँ
कहा जिसने
‘जन्म से नहीं’
उसने सुनी थी
हत्यारे के रोने की आवाज़
(10)
उनके बारे में
कुछ सोचो
जिन्हें देखकर
उदास हो जाता है
कवि का मन
(11)
जब मुदित हो रहे थे
नये बजट पर
लोग
एक भूखा कुत्ता
पागल की गोद में
रो रहा था
(12)
उसने जीत लिया
भूख और दुःख को
सरकार अब
घबराई हुई है
(13)
बच्चे जब भूलने लगे रिश्ते
डूबने लगे
और नयी नातेदारियों में
माँ ने फिर
सुनाना शुरू कर दी
कथा-कहानी
बच्चे और-और
सुनने की ज़िद में
लौटने लगे घर
(14)
करवटें बदलते हुए अमूमन
रात बीत जाती है
कोई एक विचार आ धमकता है भयानक
और एक बैचेन नदी का शोर
सुनाई पड़ता है रात भर
पत्नी की साँसों में
बिल्ली के रोने की आवाज़ में
एक रात और बीत जाती है
(15)
मदन महल की पहाड़ी पर
कुदरत का आश्चर्य
एक बड़ी सी असम्भव चट्टान
नीचे छोटी वाली पर टिकी हुई
मुझे याद हो आया बचपन
माँ जैसे
अब गिरी कि तब
(16)
बिक रहा है खुलेआम
‘मिडनाइट हाॅट’
मैं इस पेशे में
और शर्मसार बहोत
खरीद लेगा एक दिन वह इसे भी
क्या मैं लड़ पाउ$ँगा जबकि
सरकार कह रही है ख़ुशआमदीद
(17)
बचपन में सुनी थी
रानी दीमक की कहानी
रानी दीमक यानि रानी माँ
माँ हम सबकी भी
लेकिन रानी नहीं
न पति के राज में
न उसके बाद
उनके लिए तो
वृंदावन धाम जलता हुआ
जहाँ कृष्ण बांसुरी बजाता है
(18)
दुःख से प्यार करो
जीत होगी
इसमें छिपा है
लड़ने का अमर नुस्ख़ा
4 comments:
आदरणीय लीलाधर मंडलोई जी
नमस्कार !
बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में
तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.
वाह वाह मंडलोई जी,
भई हम तो आपके पंखे थे, फिर कूलर हुए
और अब आपने हमें अपना ए0सी0 बना डाला ।
कविताएं बहुत बहुत अच्छी हैं ।
कवि मन .. हम तो आप मन के सगा मन हवन ..
ये कवितायें एक गंभीर मूल्यांकन की मांग करती हैं इसलिए मित्रों से अनुरोध है की इतने हल्की प्रतिकृया न दें ..........यह कविता दीमक के बहाने से हमारी स्मृतियों हमारे पुरखे हो चुके संस्कारो का आख्यान रचती हैं .......सुनील
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