वीरगाथा काल के बाद भाषा बोलचाल के समीप आती है और दिल्ली के अमीर खुसरौ और तिरहुत के विद्यापति भाषा को असल बोलचाल का रंग प्रदान करते हैं। इनके यहाँ भी शृंगार का भाव और प्रेम (मूल्य रूप में) देखते बनते हैंµ
(1)
मोरा जोबना नवेलदा भयो है गुलाल।
कैसे गर दीनी कक्ष मोरी माला।।
(खुसरौ)
(2)
सूनि सेज पिय खालई रे
पिय बिनु बिन घर मोए आजि।
विनति करहु सुसहेलिन रे
मोहि देहि अगिहर साजि।।
(विद्यापति)
केदार जी की प्रेम कविताओं को लेकर प्रारम्भ में कई तरह से दबी-छुपी ढंग की चर्चा हुई। जिसमंे आलोचना का भाव था। इस लेख में केदार जी की विशिष्ट ऐंद्रिकता या सौंदर्य चेतना पर अपनी बात को रखने के पूर्व मैं परंपरा से कुछ पाने का यत्न कर रहा हूँ। संस्कृत साहित्य के बाद हिंदी साहित्य का इतिहास भी हमें बताता है कि ‘काम चेतना’ कवि के लिए अनिवार्य धातु की तरह है। डाॅ. राम विलास शर्मा परंपरा के आलोक में ही उन्हें ‘काम चेतना का आंचलिक कवि’ कहते हैं। यह चेतना ही उन्हें प्रेम, प्रकृति और सामाजिक यथार्थ को कविता में लाने के लिए प्रेरित करती है।
पूर्व मध्यकाल की निर्गुण और सगुण धारा में भी प्रेम और शृंगार के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं। वे अध्यात्म के आवरण में हैं, पर उनकी व्याख्या में उसे कोमल हृदय से आती अभिव्यक्ति है, उसे पढ़ा जा सकता है। विशेषतः प्रेम मार्गी (सूफी) शाखा में मंझन का जिक्र ज़रूरी है जिसने ‘मधुमालती’ की रचना की। इसमें राजकुमार मनोहर और राजकुमारी मधुमालती के प्रेम का वर्णन है। ‘पदमावत्’ के पूर्व मधुमालती की कथा कई कवि करते हैं। ‘उसमान’ की ‘चित्रावली’ का एक चित्रा हैंµ‘मधुमालती होई रूप देखावा। प्रेम मनोहर होई तहँ आवा।।’ ‘मधुमालती’ पर केंद्रित एक प्रेम कहानी दक्षिण के शायर नसरती ने भी (संवत 1700) दक्खिनी उर्दू में ‘गुलशने इश्क़’ के नाम से लिखा। मलिक मोहम्मद जायसी का ‘पदमावत’ पाठकों के ध्यान में होगा। रतनसेन और पद्मिनी की प्रेम कथा। जायसी पद्मिनी का रूप वर्णन कुछ इस तरह करते हैंµ
‘सरवर तीर पद्मिनी आई। खोंपा छोरि कंस मुकलाई।।
ससि मुख, अंग मलयगिरि बासा। नागिन झां दिलीन्ह चहुँपासा।।’
इसके साथ ही यह सौंदर्य चेतना साहित्य में आगे प्रवाहित मिलती हैं। कुछ उदाहरणों से इसके महत्व को समझा जा सकता हैµ
(1)
अपने मंजु रूप वह दारा। रूपगर्विता जगत मंसारा।।
प्रीतम प्रेम भाई वह नारी। प्रेमगार्विता भई पियारी।।
(नूर मुहम्मद)
(2)
प्रिय हँसि रस-रस कुचुकि खोलें।
चमकि निवारतिपा निलाड़िली, मुरक-मुरक मुख बौलें।।
आचार्य कृपानिवास (कृपानिवास सं. 1901) पदावली से
(3)
इंदु बदन नरगिस नयन संबलवारे वार।
उर कुंकुम, को किलबयन, जेहिल लखि लाजत मार।।
(मनोहर कविµअकबर के दरबार से)
(4)
रूंदन को रंग फीको लगै, झलके अति अंगिनि गोराई।
आँखिन में अलसाबि, चितौन में मंजु बिलासन की सरसाई।।
(मतिराम: रीतिकालीन कवि)
(5)
अमिय हलाहल, मदभरे, सेत स्याम रतनार।
जियत, मरत, झुकि-झुकि परत, जेहि चितवत एक बार।
(रसलीन: अंगदर्पण से)
आगे हम कृष्ण भक्ति शाखा में राधाकृष्ण के प्रेम में शृंगार की मनोरम और उन्माद का किसी पंक्तियाँ कविता में पाते हैं। डाॅ. राम विलास शर्मा केदार नाथ अग्रवाल की कविता में आंचलिक प्रकृति से देशकाल की व्यापक भावनाओं में सूरदास की ब्रज से जुड़ी भावनाओं का जिक्र करते हुए, उनकी काम चेतना का उल्लेख करते हैं। इसी युग में मीरा के पद का स्मरण हो आता हैµ‘बसौ मेरे नैनन में नंदलाल/ मोहनि मूरति, साँवरि सूरति, नैना बने रसाल।’ यह प्रेम के साथ शृंगार भाव की मनोहर अभिव्यक्ति ही है। हिन्दी साहित्य के कालों में वर्णित इन भावों को हम आगे भी अनेक रूपों में पाते हैं। कुछ उदाहरण देखने में आते हैं जिनसे परंपरा का पता चलता हैµ
(1)
तरुनि लसति प्रकासतें मालति लसति सुबास
गोरस गोरस देतनहिं, गोरस चहति हुलास।
(हरिनाथµ‘अलंकार दर्पण’ से)
(2)
छाजत छबीले छिति छहरि छरा के छोर,
भोर उठिआई केलि मंदिर के द्वार पर,
एक पग भीतर औ एक देहड़ी पर धरे
एक कर कंज, एक कर है दिवार पर।
(पदमाकर)
(3)
प्रेमरंग-पगे जगमग जगे जामिनी के
जीवन की जोति जगी जोर उमगत हैं।
मदन के माते मतवारे ऐसे घूमत हैं
झूमत हैं झुकि-झुकि झेंप उधरत हैं
(आलम)
(1)
मोरा जोबना नवेलदा भयो है गुलाल।
कैसे गर दीनी कक्ष मोरी माला।।
(खुसरौ)
(2)
सूनि सेज पिय खालई रे
पिय बिनु बिन घर मोए आजि।
विनति करहु सुसहेलिन रे
मोहि देहि अगिहर साजि।।
(विद्यापति)
केदार जी की प्रेम कविताओं को लेकर प्रारम्भ में कई तरह से दबी-छुपी ढंग की चर्चा हुई। जिसमंे आलोचना का भाव था। इस लेख में केदार जी की विशिष्ट ऐंद्रिकता या सौंदर्य चेतना पर अपनी बात को रखने के पूर्व मैं परंपरा से कुछ पाने का यत्न कर रहा हूँ। संस्कृत साहित्य के बाद हिंदी साहित्य का इतिहास भी हमें बताता है कि ‘काम चेतना’ कवि के लिए अनिवार्य धातु की तरह है। डाॅ. राम विलास शर्मा परंपरा के आलोक में ही उन्हें ‘काम चेतना का आंचलिक कवि’ कहते हैं। यह चेतना ही उन्हें प्रेम, प्रकृति और सामाजिक यथार्थ को कविता में लाने के लिए प्रेरित करती है।
पूर्व मध्यकाल की निर्गुण और सगुण धारा में भी प्रेम और शृंगार के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं। वे अध्यात्म के आवरण में हैं, पर उनकी व्याख्या में उसे कोमल हृदय से आती अभिव्यक्ति है, उसे पढ़ा जा सकता है। विशेषतः प्रेम मार्गी (सूफी) शाखा में मंझन का जिक्र ज़रूरी है जिसने ‘मधुमालती’ की रचना की। इसमें राजकुमार मनोहर और राजकुमारी मधुमालती के प्रेम का वर्णन है। ‘पदमावत्’ के पूर्व मधुमालती की कथा कई कवि करते हैं। ‘उसमान’ की ‘चित्रावली’ का एक चित्रा हैंµ‘मधुमालती होई रूप देखावा। प्रेम मनोहर होई तहँ आवा।।’ ‘मधुमालती’ पर केंद्रित एक प्रेम कहानी दक्षिण के शायर नसरती ने भी (संवत 1700) दक्खिनी उर्दू में ‘गुलशने इश्क़’ के नाम से लिखा। मलिक मोहम्मद जायसी का ‘पदमावत’ पाठकों के ध्यान में होगा। रतनसेन और पद्मिनी की प्रेम कथा। जायसी पद्मिनी का रूप वर्णन कुछ इस तरह करते हैंµ
‘सरवर तीर पद्मिनी आई। खोंपा छोरि कंस मुकलाई।।
ससि मुख, अंग मलयगिरि बासा। नागिन झां दिलीन्ह चहुँपासा।।’
इसके साथ ही यह सौंदर्य चेतना साहित्य में आगे प्रवाहित मिलती हैं। कुछ उदाहरणों से इसके महत्व को समझा जा सकता हैµ
(1)
अपने मंजु रूप वह दारा। रूपगर्विता जगत मंसारा।।
प्रीतम प्रेम भाई वह नारी। प्रेमगार्विता भई पियारी।।
(नूर मुहम्मद)
(2)
प्रिय हँसि रस-रस कुचुकि खोलें।
चमकि निवारतिपा निलाड़िली, मुरक-मुरक मुख बौलें।।
आचार्य कृपानिवास (कृपानिवास सं. 1901) पदावली से
(3)
इंदु बदन नरगिस नयन संबलवारे वार।
उर कुंकुम, को किलबयन, जेहिल लखि लाजत मार।।
(मनोहर कविµअकबर के दरबार से)
(4)
रूंदन को रंग फीको लगै, झलके अति अंगिनि गोराई।
आँखिन में अलसाबि, चितौन में मंजु बिलासन की सरसाई।।
(मतिराम: रीतिकालीन कवि)
(5)
अमिय हलाहल, मदभरे, सेत स्याम रतनार।
जियत, मरत, झुकि-झुकि परत, जेहि चितवत एक बार।
(रसलीन: अंगदर्पण से)
आगे हम कृष्ण भक्ति शाखा में राधाकृष्ण के प्रेम में शृंगार की मनोरम और उन्माद का किसी पंक्तियाँ कविता में पाते हैं। डाॅ. राम विलास शर्मा केदार नाथ अग्रवाल की कविता में आंचलिक प्रकृति से देशकाल की व्यापक भावनाओं में सूरदास की ब्रज से जुड़ी भावनाओं का जिक्र करते हुए, उनकी काम चेतना का उल्लेख करते हैं। इसी युग में मीरा के पद का स्मरण हो आता हैµ‘बसौ मेरे नैनन में नंदलाल/ मोहनि मूरति, साँवरि सूरति, नैना बने रसाल।’ यह प्रेम के साथ शृंगार भाव की मनोहर अभिव्यक्ति ही है। हिन्दी साहित्य के कालों में वर्णित इन भावों को हम आगे भी अनेक रूपों में पाते हैं। कुछ उदाहरण देखने में आते हैं जिनसे परंपरा का पता चलता हैµ
(1)
तरुनि लसति प्रकासतें मालति लसति सुबास
गोरस गोरस देतनहिं, गोरस चहति हुलास।
(हरिनाथµ‘अलंकार दर्पण’ से)
(2)
छाजत छबीले छिति छहरि छरा के छोर,
भोर उठिआई केलि मंदिर के द्वार पर,
एक पग भीतर औ एक देहड़ी पर धरे
एक कर कंज, एक कर है दिवार पर।
(पदमाकर)
(3)
प्रेमरंग-पगे जगमग जगे जामिनी के
जीवन की जोति जगी जोर उमगत हैं।
मदन के माते मतवारे ऐसे घूमत हैं
झूमत हैं झुकि-झुकि झेंप उधरत हैं
(आलम)
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