केदार की प्रगतिशील ऐंद्रिकता का लोक-आलोक
लीलाधर मंडलोई
केदारनाथ अग्रवाल मेरे प्रिय कवियों में हैं। जब मैं कविता की दुनिया में आया तो वे मेरे सामने थे। 1982 में आकाशवाणी छतरपुर में मेरा तबादला हुआ। तब बाँदा प्रसारण और कवरेज की दृष्टि से आकाशवाणी छतरपुर की सीमा में आता था। बाँदा जाकर उन्हें रिकार्ड और बातचीत करने के अवसर मिले। अपने जीवन में हरिशंकर परसाई के बाद वे पहले बड़े लेखक थे जिनका सानिध्य प्राप्त हुआ। प्रमोद पांडेय के साथ केदार जी की कविताओं को समझने का दौर चला। वे भी केदार जी की कविताओं के दीवाने थे। मैं भी संग-साथ बना रहने से, केदार जी के काव्यजगत में प्रवेश कर सका। तब मेरे प्रवेश का रास्ता बुंदेलखंड की प्रकृति और चीन्हा हुआ वस्तुजगत था। साथ ही बुंदेली भाषा और उसका साहित्य। यदि आकाशवाणी में नौकरी करना है तो ‘स्थानीयता’ सबसे बड़ी कुंजी है। आपको वहाँ के पुराने और नये लेखकों के साहित्य से अनिवार्य रूप से परिचित होना होगा। इस तरह मेरे पाठ में पदमाकर, जगनिक, इंसुरी, गंगाधर व्यास, खयालीराम आदि आए। लोकनाट्य की विधाएं थीं, लोक कथाएं और लोकगीत। बुंदेली भाषा थी और उसका ओज, उसकी दीप्ति। बुंदेलखंडी लोग थे अपनी चारित्रिक विशिष्टताओं के साथ। अपने व्यक्तित्व के अनेक रंगों में। नदी और पहाड़ थे। उनका सौंदर्य था। इन सबसे बनी एक समझ थी जो केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं तक पहुँचने का रास्ता देती थी। इस रास्ते एक सीमित दुनिया उजागर हो सकती थी। उनकी कविताओं के साथ कोई विरला ही एकाएक समझदार हो सकता है। दरअसल जब हम यह जान पाते हैं कि प्रेम उनका जीवन मूल्य है और सौंदर्य उनके काव्य में केंद्रीय तत्व, तब आपको और पीछे लौटना पड़ता है। अर्थात परंपरा में। उनकी कविताओं को उत्स से जानने के लिए आपको आदिकाल की दीर्घ परंपरा का थोड़ा बहुत ज्ञान जरूरी है जिसमें शृंगार, धर्म और नीति विषय के दोहे हैं। राज्याश्रित कवि और चारण राजसभाओं में इन विषयों पर दोहे सुनाया करते थे। अपभ्रंश में शृंगारिक दोहों को देखा जा सकता हैµ
पिय संगनि कउ निद्दड़ी? पियहो परक्खहो केंन।
भई बिन्निवि विन्नासिया, निंदन ऐंव नटेंव।।
अर्थात प्रिय के मिलन में नींद कहाँ और प्रिय की अनुपस्थिति में भी? मैं दोनों से नींद को खोकर जीने को अभिशप्त हूँ। यह दोहा हेमचंद्र का बताया जाता है जिन्होंने ‘सिद्ध हेमचंद्र शब्दानुशासन’ जैसा व्याकरण ग्रंथ लिखा। इसी तरह सोमप्रभसूरि का दोहा हैµ
बाँह बिछोड़ बिजिह तुंह हउँ तेवदूँ का दोसु।
हिअय ट्ठिय जई नीसरहि, जाणउ$ँ मुंज रसोसु।।
(अर्थात बाँह छुड़ाकर जाता है वैसे मैं भी जाती हूँ लेकिन मन से यदि निकल या निकाल सके तो मैं जानूँ कि ‘मुंज’ (प्रेमी रूठा है।) इसके बाद देश भाषा काव्य (रासौ साहित्य) में भी फुटकर रूप से ‘शृंगार’ साहित्य का हिस्सा बनता है। अर्थात कवियों की सौंदर्य चेतना में शृंगार एक अनिवार्य तत्व की तरह मौजूद रहा।
लीलाधर मंडलोई
केदारनाथ अग्रवाल मेरे प्रिय कवियों में हैं। जब मैं कविता की दुनिया में आया तो वे मेरे सामने थे। 1982 में आकाशवाणी छतरपुर में मेरा तबादला हुआ। तब बाँदा प्रसारण और कवरेज की दृष्टि से आकाशवाणी छतरपुर की सीमा में आता था। बाँदा जाकर उन्हें रिकार्ड और बातचीत करने के अवसर मिले। अपने जीवन में हरिशंकर परसाई के बाद वे पहले बड़े लेखक थे जिनका सानिध्य प्राप्त हुआ। प्रमोद पांडेय के साथ केदार जी की कविताओं को समझने का दौर चला। वे भी केदार जी की कविताओं के दीवाने थे। मैं भी संग-साथ बना रहने से, केदार जी के काव्यजगत में प्रवेश कर सका। तब मेरे प्रवेश का रास्ता बुंदेलखंड की प्रकृति और चीन्हा हुआ वस्तुजगत था। साथ ही बुंदेली भाषा और उसका साहित्य। यदि आकाशवाणी में नौकरी करना है तो ‘स्थानीयता’ सबसे बड़ी कुंजी है। आपको वहाँ के पुराने और नये लेखकों के साहित्य से अनिवार्य रूप से परिचित होना होगा। इस तरह मेरे पाठ में पदमाकर, जगनिक, इंसुरी, गंगाधर व्यास, खयालीराम आदि आए। लोकनाट्य की विधाएं थीं, लोक कथाएं और लोकगीत। बुंदेली भाषा थी और उसका ओज, उसकी दीप्ति। बुंदेलखंडी लोग थे अपनी चारित्रिक विशिष्टताओं के साथ। अपने व्यक्तित्व के अनेक रंगों में। नदी और पहाड़ थे। उनका सौंदर्य था। इन सबसे बनी एक समझ थी जो केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं तक पहुँचने का रास्ता देती थी। इस रास्ते एक सीमित दुनिया उजागर हो सकती थी। उनकी कविताओं के साथ कोई विरला ही एकाएक समझदार हो सकता है। दरअसल जब हम यह जान पाते हैं कि प्रेम उनका जीवन मूल्य है और सौंदर्य उनके काव्य में केंद्रीय तत्व, तब आपको और पीछे लौटना पड़ता है। अर्थात परंपरा में। उनकी कविताओं को उत्स से जानने के लिए आपको आदिकाल की दीर्घ परंपरा का थोड़ा बहुत ज्ञान जरूरी है जिसमें शृंगार, धर्म और नीति विषय के दोहे हैं। राज्याश्रित कवि और चारण राजसभाओं में इन विषयों पर दोहे सुनाया करते थे। अपभ्रंश में शृंगारिक दोहों को देखा जा सकता हैµ
पिय संगनि कउ निद्दड़ी? पियहो परक्खहो केंन।
भई बिन्निवि विन्नासिया, निंदन ऐंव नटेंव।।
अर्थात प्रिय के मिलन में नींद कहाँ और प्रिय की अनुपस्थिति में भी? मैं दोनों से नींद को खोकर जीने को अभिशप्त हूँ। यह दोहा हेमचंद्र का बताया जाता है जिन्होंने ‘सिद्ध हेमचंद्र शब्दानुशासन’ जैसा व्याकरण ग्रंथ लिखा। इसी तरह सोमप्रभसूरि का दोहा हैµ
बाँह बिछोड़ बिजिह तुंह हउँ तेवदूँ का दोसु।
हिअय ट्ठिय जई नीसरहि, जाणउ$ँ मुंज रसोसु।।
(अर्थात बाँह छुड़ाकर जाता है वैसे मैं भी जाती हूँ लेकिन मन से यदि निकल या निकाल सके तो मैं जानूँ कि ‘मुंज’ (प्रेमी रूठा है।) इसके बाद देश भाषा काव्य (रासौ साहित्य) में भी फुटकर रूप से ‘शृंगार’ साहित्य का हिस्सा बनता है। अर्थात कवियों की सौंदर्य चेतना में शृंगार एक अनिवार्य तत्व की तरह मौजूद रहा।
No comments:
Post a Comment