समीक्षा µ महेश कटारे
‘एक बहुत कोमल तान’ (कविता संग्रह)
कविµलीलाधर मंडलोई
प्रकाशकµअंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद
आवरण पृष्ठ से आरंभ करना जरूरी लग रहा है जो अपने रंग व दृश्य संयोजन में ही अलग तरह का लगा। पिघलती सी ऊँचाइयाँ...ऊँघती हरियाली के निर्जन में किसी की प्रतीक्षा करता अकेला घर और उसके पीछे बहती नील श्वेताभ जलराशि। भीतर पलटकर पाया कि मुखावरण पर वाॅन गाॅग की परिकल्पना है। अब एक अलग किस्म की कठिनाई दरपेश हुई कि आवरण चित्रा के संदर्भ में भीतर की कविताओं को किस तरह बांचू, जहां दृृश्य में विपुल प्रकृति है जिसके बीच एक घर मनुष्य की उपस्थिति का अहसास भी दिलाता है तथा अस्तव्यस्त उदास प्रकृति के माध्यम से यह आशंका भी पैदा करता है कि घर कहीं सूना न रह जाए। यह आशंका इसलिए भी दहशत में डालती है कि लीलाधर मंडलोई की कविताएं जीवन की तरह पढ़े जाने की कोटि में मानी जाने लगी हैं। यह भी कि मण्डलोई की कविताओं में जीवन प्रकृति से जुड़े बिना अन्य मन एक होने लगता है। आशंका को बल इसलिए भी मिलता है कि इस चरम आधुनिक तकनीकी समय में प्रकृति अब मात्रा चित्रा-स्मृति तक सीमित होने की ओर बढ़ रही है। विकास के लिए अधिकाधिक प्राकृतिक दोहन की लाभवादी अवधारणा ने मनुष्य के लालच को मान्यता प्रदान कर असीमित, आक्रामक दोहन के द्वार खोल दिए। पौर्वात्य दर्शन में मनुष्य के उध्र्वरेतस विकास की अवधारणा है जिसके तहत वह प्रकृति के। सामने याचक बनकर खड़ा हो अपनायापन, सुख व समृद्धि मांगता है और आवश्यकता भर ही लेता है। साम्राज्यवादी सोच ने मनुष्य को स्वामी होने का पाठ सिखाया जिसमें वह प्रकृति से सहचर या याचक भांति मांगता नहीं वरन् छीनता है। वहां के साहित्य में ऐसे साहसी लुटेरों को ‘हीरो’ का दर्ज़ा दिया जाता रहा है। पर प्रकृति के सहने की भी एक सीमा है। मनुष्य का अवांछित, अनियंत्रित प्रकृति-दोहन स्वयं मनुष्य के लिए ही भस्मासुर की भूमिका निभाने को तत्पर हैµ
कहां से आती है इतनी
कार्बन मोनोक्साइड
कि बर्फ पिघलती है
समय से पहले
धंसकते हैं पहाड़ धीरे-धीरे
धीरे-धीरे खत्म होता है जीवन। (कार्बन मोनोक्साइड)
यूं ही नहीं कि इन कविताओं में पहाड़, नदी, झरने, बादल, पक्षी, वनस्पति, पेड़, वर्षा, गर्मी सर्दी तथा बीमार सा बसंत लौट-लौट कर आता है। शहरों, महानगरों की बड़ी, व्यस्त, संपन्न व शायद सुखी भी एक ऐसी दुनिया है जिसे बदलती ऋतुओं, मौसमों का पता मीडिया के जरिये लगता है और इसमें कह उठते हैंµअच्छा! एक दिन हमें मौसम भी मनाना चाहिए। वह संख्या भी करोड़ों से ऊपर जा पहुंची है जो नहीं जानती कि जिस आटे की वह ब्रेड, रोटी सेण्डविच खाते हैं उस गेहूं का पौधा कैसा होता है। देश के भाग्य के निर्णायक वर्ग से आने वाली अगली पीढ़ी दूध के लिए डेअरियों को पहचानती है...गाय भैंस बकरी को नहीं। ‘जिसने पहचान लिया,’ तितलियां जैसी कविताएं हमें स्मृति-लोप की उसी बुनावट के निकट ले पहुंचती हैं। हम प्रकृति, वनस्पतियों के प्रति निरंतर संवेदन शून्य होते जा रहे हैंµ
बगीचे की शोभा और बात
अपनी बाड़ में इसका प्राकृतिक ढंग से फैलना
आपको मंजूर नहीं
आपका माली आपका हर हुक़्म बजा लाता है
लो उसने बाहर झांकती डालियों की काट-छांट शुरू कर दी
टहनियों से बह रहा हैµदूधिया रक्त। (कनेर और आप)
आज के आदमी ने तो अपनी संतान को भी अपनी इच्छानुसार ढालना शुरू कर दिया है और खुश हो रहे हैं। वन समाप्त होते हैं, उससे पहले वन्य जीवµ
अब किन वनों में होंगे वे
या कि उन्हें उठा लिया
चिड़ियाघरों,
मदारियों ने
कहीं मार तो नहीं दिया
शिकारियों ने।
इन पंक्तियों में कोई त्रास कौंधता है कि हमारी जाॅब-आंकाक्षी संतानें चिड़ियाघरों, मदारियों के हत्थे पड़ती जा रही है, ये शिकारी उनका मनुष्यत्व मारकर मशीन में बदलते हैं। वे विजयी अभिमान अपनी दर्दमनीय लिप्सा में प्रकृति पर वार करने में जुटे है। क्षत-विक्षत धरती की सूखती नदियां, गुम होते प्रपात, मिटते पहाड़, गड़बड़ाता ऋतु-चक्र मनुष्य के इसी लोभी-प्रहार का परिणाम है। अब समझ और संभल जाना चाहिए कि आहत प्रकृति अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करने लगी है। ग्लोबल वार्मिग, सुनामी, नये-नये रोग, महामारियां, जीवन के मूल आधार वायु, जल का प्रदूषण और कमी। प्रकृति पलटवार को सन्नद्ध दिखने लगी है। उसकी मात्रा एक छोटी सी करवट आदमी की अहंसिक्त श्रेष्ठता को अतल में डुबाकर इस जीव की जाति के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। (क्या पता फिर कोई एलियन जाति विलुप्त होती मानव जाति के संरक्षण का उपाय करे।) प्रकृति के इस प्रतिवार को पुश्किन ने ‘उदासीन प्रकृति की शाश्वत दीप्ति’ कहा है। टाॅमस माल्थस ने ‘अवांछित का अस्वीकार’ बताया है। महानगरों में दिनोदिन आकाश की और ऊंचे उठते गगनचुंबी भवनों के चलते यह निहायत सामान्य अनुभव हुआ है कि जो लोग पेड़ों से ऊंचे मकानों में रहते हैं उनकी संवेदनशीलता कम हो जाती है।
इन कविताओं में मां हैµप्रकृति के साथ घुलीमिली, उसका हिस्सा, उसका एक रूप। दोनों इस तरह जुड़ी है कि कवि के लिए इन्हें अलग-अलग कर देखना संभव नहीं लगताµ
मां हमें अक्सर बताती
कि पेड़-पौधों से प्रेम करो
उनमें मनुष्य सरीखा जीवन है। (छुईमुई)
बहुत सीधी बात है कि मात्रा मनुष्य से ही जीवन नहीं चल सकता। कवि की ‘मां’ बंगले के लाॅन में बैठ सुखद स्मृतियां चुभलाती विज्ञापनी मां नहीं है। संग्रह में एक छोटी सी कविता हैµ ‘त्यौहार का दिन’µ
‘आज त्यौहार का दिन है
आज मां घबराई हुई है’
इन पंक्तियों के साथ ही एकाएक ‘ईदगाह’ कहानी की दादी अमीना और बालक हामिद का स्मरण हो आता है। दादी जिसमें अभावों के बीच जीने की आदत और जूझने का संकल्प है तथा हामिद जिसमें अभावों के होते हुए भी आशा का प्रकाश है। इसलिए इन कविताओं में मां के दूध से उतरते जीवन का प्रकाश दिखाई देता है। इस प्रकाश वृृत्त में सुख-दुख के साथी दोस्त हैं, रचनाकार कलाकार हैं तथा विडंबना आत्मानुभव भीµ
‘यह क्या हो गया है मुझे
कि हर वक़्त इतना सावधान
बोलने में
लिखने में
खड़े होने और बैठने तक में
इतना डर कैसे चला आया’ (सावधान)
मैं सूत हूं
इस तरह नीच कुल का
....
मैं कारीगर
मैं रथकार
मैं कवि
...
...
अपमान और हत्या को स्मरण करता
मैं सिर्फ चुप हूं
मेरा चुप होना हार जाना नहीं है। (सूत)
कविता का मोर्चा यहां तीन जगह खुला हैµएक प्रकृति को बचाने अर्थात्् प्रकारांतर से पूरी सभ्यता को बचाने का। दूसरा सांस्कृतिक दायित्व का मोर्चा जहां किसी भी रचनाकार को लड़ना ही पड़ता है। तीसरा ‘स्व’ अस्तित्व व सम्मान का। इस प्रकार ‘एक बहुत कोमल तान’ की कविताएं व्यक्तिगत अनुभव से सामाजिक अनुभव तक सेतु बनती कविताएं हैµअर्थ संकेत में विस्तार और व्यापकता सहेजती हुई। यहां कवि ने सहज सौन्दर्य के अमीप्सित प्रतिमान भी गढ़े हैं। वृक्ष व मां के सायुज्य की कविता हैµअरंडी। मुझे नहीं लगता कि भद्र नागरी सौन्दर्य बोध में अरंडी को कहीं जगह मिली हो। सुन्दर तो इस वृक्ष को ग्राम-जीवन में भी नहीं माना गया पर स्थान बहुत निकट का मिला है क्योंकि यह बहु उपयोगी है। अरंडी के बीज का तेल स्वयं औषधि होने के साथ अनेक औषधियों से मिल उत्प्रेरक का काम करता है। चोट लगने अथवा सूजन पर इसी के पत्ते पर इसी का तेल चुपड़ गुनगुना बांधा जाता है पुल्टिश चढ़ाई जाती है। पीलिया की अक्सीर दवा है अरंडी। तेल से धूमरहित प्रकाश किया जाता है। लकड़ी या तने से छप्पर छाये जाते हैं। कविता रेखांकित करती है कि सौन्दर्य आकर्षक रूप रंग में नहीं उस गुण में निहित है जो अधिकाधिक लोगों के काम आ सके हैं।
µमां कहती कि वह मनुष्य सेवा में निमग्न
एक दुर्लभ उदाहरण है दुनिया में
वह अब याद करती थी उसे
बिछड़े भाई की तरह
और ढूंढती फिरती थी हर उस शहर में
जहां-जहां मेरा तबादला हुआ। (अरंडी)
आत्मासक्ति से मुक्त सौन्दर्य लोक (मंगल) से जुड़ता है। लोक ने शास्त्राीय सौन्दर्य को सराहा अवश्य है पर अपनाने के लिए जीवन-सापेक्ष सौन्दर्य प्रतिमान गढ़े हैं। अतः यहां कला उल्लास, अवसाद, अनुताय औदार्य की सहज अभिव्यक्ति बनकर दूब की तरह उमगती हैµरोपे जाने पर दूब में ओप नहीं आता।
संग्रह की कुछ छोटी छोटी कविताएं इतनी बेधक हैं कि मण्टो की कहानियों की तरह मष्तिक में किसी कील सी गड़ जाती हैंµ
मैंने देखा
वो कत्ल
मैं गूंगा
मैं सर झुकाए चलता हूं (गूंगा)
बस इतनी सी है यह कविता जो आज के समय की पोच मानसिकता को उघाड़कर रख देती है। क्या यह पूरी कविता, बड़ी या उससे भी कुछ अधिक नहीं है? एक अन्य कविता हैµ‘और रात में’ जिसमें एक अकेली विधवा स्त्राी रातभर स्वयं को अपने दुख की आंच में तपाकर दुनियावी संघर्ष के लिए खुद को तैयार करती हैµ
घर के पिछवाड़े एक झोपड़ी
वहां एक परछाईं है
जो रात गए रोती है
वह तो एक बेवा की झोपड़ी
जो तेज-तर्रार बहुत
इतनी कि उसकी मर्दानगी के किस्से बहुत। (और रात में)
संग्रह में कुछ लंबी कविताएं भी हैµइस तरह पहली बार, चिट्ठियां, स्वाद के अनंतिम शिखर पर, वह एक कलंदर (वेणुगोपाल के लिए) स्मृतियां माला के धागे की तरह संग्रह में ओर से छोर पैठी हैं जो कवि को प्रायः लोक की ओर ले जाती हैं जहां वह ‘कविता के लिए कच्चा माल’ अबेरता है। क्या इसलिए कि अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा खजाना हर लोकभाषा में मौजूद होता है। लोकभाषा कभी मरती नहीं। अपने आप में संशोधन करती रहती है इसलिए बड़े रचनाकारों में हमें लोक मुहावरे की समृद्धि मिलती है।
किसी कवि की कविता को हम उसके जीवन, परिवेश, विरासत, अतीत तथा समकालीन स्थितियों की समग्रता में एक अंश की तरह परखते हैं। वह अंश नहीं जिसे विरासत ने बांधकर निष्क्रिय बना दिया हो। (रचनाकार मृत संसार का उत्तराधिकारी नहीं है) कोई जिम्मेदारी कवि स्मृति व अतीत का उपयोग न सिर्फ अतीत ही बदलने बल्कि वर्तमान को भी बदलने के लिए करता है। ‘एक बहुत कोमल तान’ की कविताओं का मर्म जीवन के साथ तौल, कसकर ही परखा जा सकता है। कवि ने कटु संघर्षों के दौरान स्वयं को नये सांचे में ढालते हुए कविता को पाथेय की तरह चुना है जिसमें पारिवारिक प्रेम से आलोकित कविताएं भी अपनी गहरी सादगी के साथ उपस्थित हैंµवेदना बीच इच्छा शक्ति की भांति। भारतीय श्रमिक के जीवन से नाभि नाल बद्ध ये कविताएं प्रतिभा को व्यर्थ-संघर्ष की वेदी पर चढ़ाने वाले इस समय में ‘एक बहुत कोमल तान’ बचाने का संकल्प लेती हुई यह संकेत भी देती हैं कि निरंकुशता कितनी ही क्रूर, आक्रामक क्यों न हो उससे लड़ने के साधनों व इच्छाओं का अभाव नहीं है।
प्रसंगवश यह ज़िक्र जरूरी है कि लीलाधर मंडलोई के दो और संग्रह हैं ‘लिखे में दुक्ख’ और ‘महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने’। ये क्रमशः राधाकृष्ण और मेधा बुक्स से प्रकाशित हैं। दोनों संग्रह इस अर्थ में विशिष्ट हैं कि भाषा फाॅर्म और कहने के स्तर पर कविताएँ निजता मौलिकता के धरातल पर जोखिम उठाती हैं। ‘लिखे में दुक्ख’ मैं दो से चैदह पंक्तियों वाली कविताएँ लघु सघन स्वरूप में हैं और सूक्ति की काया में। ये कविताएँ भाषा को इधर के समकालीन सायास भार से मुक्त करती हैं। अत्यंत संप्रेषणीय। स्मृति में रह जाने वाली। ‘क्वोटोबेल क्वोक्टस’ की भांति पारदर्शी और सरल हैं। इनमें दार्शनिक वाक्यों का प्रकाश है। सिर्फ एक उदाहरणµ
मेरे लिखे में
अगर दुक्ख है
और सबका नहीं
मेरे लिखे को आग लगे (पृष्ठ 92)
‘महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने’ का ब्लर्ब महाश्वेता देवी का लिखा है। उनकी पंक्तियाँ हैंµ‘सुभाष मुखोपाध्याय से लेकर वीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती का मानना है कि महान कविता वह है जो हमारे सुख का समर्थन करे, संग्राम को साहस दे और शोक में सांत्वना दे। इस कसौटी पर मंडलोई की अनेक कविताएँ खरी उतरती हैं। कदाचित इसीलिए हिंदी कविता की समृद्ध परंपरा के वे ऐसे हिस्सेदार हैं जिनके बगैर समकालीन हिंदी कविता की मुकम्मल तस्वीर नहीं बन सकती। समकालीन हिंदी कविता का अद्यतन रूप और चरित्रा बनाने वालों में मंडलोई भी हैं।’
महाश्वेता देवी के विचारों के आलोक में बतौर उदाहरण एक काव्यांशµ
निर्वासन के बावजूद
हम आत्मनिर्वासित नहीं
पृथ्वी को अपना घर समझने वाले
असंख्य लोग हैं और बेआवाज नहीं
इनमें बोलता है मुल्क
और मुल्क को हराना
इतना आसान नहीं
कुल मिलकार यह कहना समीचीन होगा कि लीलाधर मंडलोई समकालीन कविता में एक ऐसा नाम है जिनका लिखा परम्परा की शक्ति, आधुनिकता की समझ और नवसाम्राज्यवाद के खतरों से रूबरू होता हुआ, सृष्टि को अपनी निजी भाषा और मुहावरे में मूर्त करता है। यह रास्ता संघर्ष और जोखिम का है और मंडलोई उसी पर चलते हैं, जो इधर विरल होता जा रहा है।
‘एक बहुत कोमल तान’ (कविता संग्रह)
कविµलीलाधर मंडलोई
प्रकाशकµअंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद
आवरण पृष्ठ से आरंभ करना जरूरी लग रहा है जो अपने रंग व दृश्य संयोजन में ही अलग तरह का लगा। पिघलती सी ऊँचाइयाँ...ऊँघती हरियाली के निर्जन में किसी की प्रतीक्षा करता अकेला घर और उसके पीछे बहती नील श्वेताभ जलराशि। भीतर पलटकर पाया कि मुखावरण पर वाॅन गाॅग की परिकल्पना है। अब एक अलग किस्म की कठिनाई दरपेश हुई कि आवरण चित्रा के संदर्भ में भीतर की कविताओं को किस तरह बांचू, जहां दृृश्य में विपुल प्रकृति है जिसके बीच एक घर मनुष्य की उपस्थिति का अहसास भी दिलाता है तथा अस्तव्यस्त उदास प्रकृति के माध्यम से यह आशंका भी पैदा करता है कि घर कहीं सूना न रह जाए। यह आशंका इसलिए भी दहशत में डालती है कि लीलाधर मंडलोई की कविताएं जीवन की तरह पढ़े जाने की कोटि में मानी जाने लगी हैं। यह भी कि मण्डलोई की कविताओं में जीवन प्रकृति से जुड़े बिना अन्य मन एक होने लगता है। आशंका को बल इसलिए भी मिलता है कि इस चरम आधुनिक तकनीकी समय में प्रकृति अब मात्रा चित्रा-स्मृति तक सीमित होने की ओर बढ़ रही है। विकास के लिए अधिकाधिक प्राकृतिक दोहन की लाभवादी अवधारणा ने मनुष्य के लालच को मान्यता प्रदान कर असीमित, आक्रामक दोहन के द्वार खोल दिए। पौर्वात्य दर्शन में मनुष्य के उध्र्वरेतस विकास की अवधारणा है जिसके तहत वह प्रकृति के। सामने याचक बनकर खड़ा हो अपनायापन, सुख व समृद्धि मांगता है और आवश्यकता भर ही लेता है। साम्राज्यवादी सोच ने मनुष्य को स्वामी होने का पाठ सिखाया जिसमें वह प्रकृति से सहचर या याचक भांति मांगता नहीं वरन् छीनता है। वहां के साहित्य में ऐसे साहसी लुटेरों को ‘हीरो’ का दर्ज़ा दिया जाता रहा है। पर प्रकृति के सहने की भी एक सीमा है। मनुष्य का अवांछित, अनियंत्रित प्रकृति-दोहन स्वयं मनुष्य के लिए ही भस्मासुर की भूमिका निभाने को तत्पर हैµ
कहां से आती है इतनी
कार्बन मोनोक्साइड
कि बर्फ पिघलती है
समय से पहले
धंसकते हैं पहाड़ धीरे-धीरे
धीरे-धीरे खत्म होता है जीवन। (कार्बन मोनोक्साइड)
यूं ही नहीं कि इन कविताओं में पहाड़, नदी, झरने, बादल, पक्षी, वनस्पति, पेड़, वर्षा, गर्मी सर्दी तथा बीमार सा बसंत लौट-लौट कर आता है। शहरों, महानगरों की बड़ी, व्यस्त, संपन्न व शायद सुखी भी एक ऐसी दुनिया है जिसे बदलती ऋतुओं, मौसमों का पता मीडिया के जरिये लगता है और इसमें कह उठते हैंµअच्छा! एक दिन हमें मौसम भी मनाना चाहिए। वह संख्या भी करोड़ों से ऊपर जा पहुंची है जो नहीं जानती कि जिस आटे की वह ब्रेड, रोटी सेण्डविच खाते हैं उस गेहूं का पौधा कैसा होता है। देश के भाग्य के निर्णायक वर्ग से आने वाली अगली पीढ़ी दूध के लिए डेअरियों को पहचानती है...गाय भैंस बकरी को नहीं। ‘जिसने पहचान लिया,’ तितलियां जैसी कविताएं हमें स्मृति-लोप की उसी बुनावट के निकट ले पहुंचती हैं। हम प्रकृति, वनस्पतियों के प्रति निरंतर संवेदन शून्य होते जा रहे हैंµ
बगीचे की शोभा और बात
अपनी बाड़ में इसका प्राकृतिक ढंग से फैलना
आपको मंजूर नहीं
आपका माली आपका हर हुक़्म बजा लाता है
लो उसने बाहर झांकती डालियों की काट-छांट शुरू कर दी
टहनियों से बह रहा हैµदूधिया रक्त। (कनेर और आप)
आज के आदमी ने तो अपनी संतान को भी अपनी इच्छानुसार ढालना शुरू कर दिया है और खुश हो रहे हैं। वन समाप्त होते हैं, उससे पहले वन्य जीवµ
अब किन वनों में होंगे वे
या कि उन्हें उठा लिया
चिड़ियाघरों,
मदारियों ने
कहीं मार तो नहीं दिया
शिकारियों ने।
इन पंक्तियों में कोई त्रास कौंधता है कि हमारी जाॅब-आंकाक्षी संतानें चिड़ियाघरों, मदारियों के हत्थे पड़ती जा रही है, ये शिकारी उनका मनुष्यत्व मारकर मशीन में बदलते हैं। वे विजयी अभिमान अपनी दर्दमनीय लिप्सा में प्रकृति पर वार करने में जुटे है। क्षत-विक्षत धरती की सूखती नदियां, गुम होते प्रपात, मिटते पहाड़, गड़बड़ाता ऋतु-चक्र मनुष्य के इसी लोभी-प्रहार का परिणाम है। अब समझ और संभल जाना चाहिए कि आहत प्रकृति अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करने लगी है। ग्लोबल वार्मिग, सुनामी, नये-नये रोग, महामारियां, जीवन के मूल आधार वायु, जल का प्रदूषण और कमी। प्रकृति पलटवार को सन्नद्ध दिखने लगी है। उसकी मात्रा एक छोटी सी करवट आदमी की अहंसिक्त श्रेष्ठता को अतल में डुबाकर इस जीव की जाति के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। (क्या पता फिर कोई एलियन जाति विलुप्त होती मानव जाति के संरक्षण का उपाय करे।) प्रकृति के इस प्रतिवार को पुश्किन ने ‘उदासीन प्रकृति की शाश्वत दीप्ति’ कहा है। टाॅमस माल्थस ने ‘अवांछित का अस्वीकार’ बताया है। महानगरों में दिनोदिन आकाश की और ऊंचे उठते गगनचुंबी भवनों के चलते यह निहायत सामान्य अनुभव हुआ है कि जो लोग पेड़ों से ऊंचे मकानों में रहते हैं उनकी संवेदनशीलता कम हो जाती है।
इन कविताओं में मां हैµप्रकृति के साथ घुलीमिली, उसका हिस्सा, उसका एक रूप। दोनों इस तरह जुड़ी है कि कवि के लिए इन्हें अलग-अलग कर देखना संभव नहीं लगताµ
मां हमें अक्सर बताती
कि पेड़-पौधों से प्रेम करो
उनमें मनुष्य सरीखा जीवन है। (छुईमुई)
बहुत सीधी बात है कि मात्रा मनुष्य से ही जीवन नहीं चल सकता। कवि की ‘मां’ बंगले के लाॅन में बैठ सुखद स्मृतियां चुभलाती विज्ञापनी मां नहीं है। संग्रह में एक छोटी सी कविता हैµ ‘त्यौहार का दिन’µ
‘आज त्यौहार का दिन है
आज मां घबराई हुई है’
इन पंक्तियों के साथ ही एकाएक ‘ईदगाह’ कहानी की दादी अमीना और बालक हामिद का स्मरण हो आता है। दादी जिसमें अभावों के बीच जीने की आदत और जूझने का संकल्प है तथा हामिद जिसमें अभावों के होते हुए भी आशा का प्रकाश है। इसलिए इन कविताओं में मां के दूध से उतरते जीवन का प्रकाश दिखाई देता है। इस प्रकाश वृृत्त में सुख-दुख के साथी दोस्त हैं, रचनाकार कलाकार हैं तथा विडंबना आत्मानुभव भीµ
‘यह क्या हो गया है मुझे
कि हर वक़्त इतना सावधान
बोलने में
लिखने में
खड़े होने और बैठने तक में
इतना डर कैसे चला आया’ (सावधान)
मैं सूत हूं
इस तरह नीच कुल का
....
मैं कारीगर
मैं रथकार
मैं कवि
...
...
अपमान और हत्या को स्मरण करता
मैं सिर्फ चुप हूं
मेरा चुप होना हार जाना नहीं है। (सूत)
कविता का मोर्चा यहां तीन जगह खुला हैµएक प्रकृति को बचाने अर्थात्् प्रकारांतर से पूरी सभ्यता को बचाने का। दूसरा सांस्कृतिक दायित्व का मोर्चा जहां किसी भी रचनाकार को लड़ना ही पड़ता है। तीसरा ‘स्व’ अस्तित्व व सम्मान का। इस प्रकार ‘एक बहुत कोमल तान’ की कविताएं व्यक्तिगत अनुभव से सामाजिक अनुभव तक सेतु बनती कविताएं हैµअर्थ संकेत में विस्तार और व्यापकता सहेजती हुई। यहां कवि ने सहज सौन्दर्य के अमीप्सित प्रतिमान भी गढ़े हैं। वृक्ष व मां के सायुज्य की कविता हैµअरंडी। मुझे नहीं लगता कि भद्र नागरी सौन्दर्य बोध में अरंडी को कहीं जगह मिली हो। सुन्दर तो इस वृक्ष को ग्राम-जीवन में भी नहीं माना गया पर स्थान बहुत निकट का मिला है क्योंकि यह बहु उपयोगी है। अरंडी के बीज का तेल स्वयं औषधि होने के साथ अनेक औषधियों से मिल उत्प्रेरक का काम करता है। चोट लगने अथवा सूजन पर इसी के पत्ते पर इसी का तेल चुपड़ गुनगुना बांधा जाता है पुल्टिश चढ़ाई जाती है। पीलिया की अक्सीर दवा है अरंडी। तेल से धूमरहित प्रकाश किया जाता है। लकड़ी या तने से छप्पर छाये जाते हैं। कविता रेखांकित करती है कि सौन्दर्य आकर्षक रूप रंग में नहीं उस गुण में निहित है जो अधिकाधिक लोगों के काम आ सके हैं।
µमां कहती कि वह मनुष्य सेवा में निमग्न
एक दुर्लभ उदाहरण है दुनिया में
वह अब याद करती थी उसे
बिछड़े भाई की तरह
और ढूंढती फिरती थी हर उस शहर में
जहां-जहां मेरा तबादला हुआ। (अरंडी)
आत्मासक्ति से मुक्त सौन्दर्य लोक (मंगल) से जुड़ता है। लोक ने शास्त्राीय सौन्दर्य को सराहा अवश्य है पर अपनाने के लिए जीवन-सापेक्ष सौन्दर्य प्रतिमान गढ़े हैं। अतः यहां कला उल्लास, अवसाद, अनुताय औदार्य की सहज अभिव्यक्ति बनकर दूब की तरह उमगती हैµरोपे जाने पर दूब में ओप नहीं आता।
संग्रह की कुछ छोटी छोटी कविताएं इतनी बेधक हैं कि मण्टो की कहानियों की तरह मष्तिक में किसी कील सी गड़ जाती हैंµ
मैंने देखा
वो कत्ल
मैं गूंगा
मैं सर झुकाए चलता हूं (गूंगा)
बस इतनी सी है यह कविता जो आज के समय की पोच मानसिकता को उघाड़कर रख देती है। क्या यह पूरी कविता, बड़ी या उससे भी कुछ अधिक नहीं है? एक अन्य कविता हैµ‘और रात में’ जिसमें एक अकेली विधवा स्त्राी रातभर स्वयं को अपने दुख की आंच में तपाकर दुनियावी संघर्ष के लिए खुद को तैयार करती हैµ
घर के पिछवाड़े एक झोपड़ी
वहां एक परछाईं है
जो रात गए रोती है
वह तो एक बेवा की झोपड़ी
जो तेज-तर्रार बहुत
इतनी कि उसकी मर्दानगी के किस्से बहुत। (और रात में)
संग्रह में कुछ लंबी कविताएं भी हैµइस तरह पहली बार, चिट्ठियां, स्वाद के अनंतिम शिखर पर, वह एक कलंदर (वेणुगोपाल के लिए) स्मृतियां माला के धागे की तरह संग्रह में ओर से छोर पैठी हैं जो कवि को प्रायः लोक की ओर ले जाती हैं जहां वह ‘कविता के लिए कच्चा माल’ अबेरता है। क्या इसलिए कि अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा खजाना हर लोकभाषा में मौजूद होता है। लोकभाषा कभी मरती नहीं। अपने आप में संशोधन करती रहती है इसलिए बड़े रचनाकारों में हमें लोक मुहावरे की समृद्धि मिलती है।
किसी कवि की कविता को हम उसके जीवन, परिवेश, विरासत, अतीत तथा समकालीन स्थितियों की समग्रता में एक अंश की तरह परखते हैं। वह अंश नहीं जिसे विरासत ने बांधकर निष्क्रिय बना दिया हो। (रचनाकार मृत संसार का उत्तराधिकारी नहीं है) कोई जिम्मेदारी कवि स्मृति व अतीत का उपयोग न सिर्फ अतीत ही बदलने बल्कि वर्तमान को भी बदलने के लिए करता है। ‘एक बहुत कोमल तान’ की कविताओं का मर्म जीवन के साथ तौल, कसकर ही परखा जा सकता है। कवि ने कटु संघर्षों के दौरान स्वयं को नये सांचे में ढालते हुए कविता को पाथेय की तरह चुना है जिसमें पारिवारिक प्रेम से आलोकित कविताएं भी अपनी गहरी सादगी के साथ उपस्थित हैंµवेदना बीच इच्छा शक्ति की भांति। भारतीय श्रमिक के जीवन से नाभि नाल बद्ध ये कविताएं प्रतिभा को व्यर्थ-संघर्ष की वेदी पर चढ़ाने वाले इस समय में ‘एक बहुत कोमल तान’ बचाने का संकल्प लेती हुई यह संकेत भी देती हैं कि निरंकुशता कितनी ही क्रूर, आक्रामक क्यों न हो उससे लड़ने के साधनों व इच्छाओं का अभाव नहीं है।
प्रसंगवश यह ज़िक्र जरूरी है कि लीलाधर मंडलोई के दो और संग्रह हैं ‘लिखे में दुक्ख’ और ‘महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने’। ये क्रमशः राधाकृष्ण और मेधा बुक्स से प्रकाशित हैं। दोनों संग्रह इस अर्थ में विशिष्ट हैं कि भाषा फाॅर्म और कहने के स्तर पर कविताएँ निजता मौलिकता के धरातल पर जोखिम उठाती हैं। ‘लिखे में दुक्ख’ मैं दो से चैदह पंक्तियों वाली कविताएँ लघु सघन स्वरूप में हैं और सूक्ति की काया में। ये कविताएँ भाषा को इधर के समकालीन सायास भार से मुक्त करती हैं। अत्यंत संप्रेषणीय। स्मृति में रह जाने वाली। ‘क्वोटोबेल क्वोक्टस’ की भांति पारदर्शी और सरल हैं। इनमें दार्शनिक वाक्यों का प्रकाश है। सिर्फ एक उदाहरणµ
मेरे लिखे में
अगर दुक्ख है
और सबका नहीं
मेरे लिखे को आग लगे (पृष्ठ 92)
‘महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने’ का ब्लर्ब महाश्वेता देवी का लिखा है। उनकी पंक्तियाँ हैंµ‘सुभाष मुखोपाध्याय से लेकर वीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती का मानना है कि महान कविता वह है जो हमारे सुख का समर्थन करे, संग्राम को साहस दे और शोक में सांत्वना दे। इस कसौटी पर मंडलोई की अनेक कविताएँ खरी उतरती हैं। कदाचित इसीलिए हिंदी कविता की समृद्ध परंपरा के वे ऐसे हिस्सेदार हैं जिनके बगैर समकालीन हिंदी कविता की मुकम्मल तस्वीर नहीं बन सकती। समकालीन हिंदी कविता का अद्यतन रूप और चरित्रा बनाने वालों में मंडलोई भी हैं।’
महाश्वेता देवी के विचारों के आलोक में बतौर उदाहरण एक काव्यांशµ
निर्वासन के बावजूद
हम आत्मनिर्वासित नहीं
पृथ्वी को अपना घर समझने वाले
असंख्य लोग हैं और बेआवाज नहीं
इनमें बोलता है मुल्क
और मुल्क को हराना
इतना आसान नहीं
कुल मिलकार यह कहना समीचीन होगा कि लीलाधर मंडलोई समकालीन कविता में एक ऐसा नाम है जिनका लिखा परम्परा की शक्ति, आधुनिकता की समझ और नवसाम्राज्यवाद के खतरों से रूबरू होता हुआ, सृष्टि को अपनी निजी भाषा और मुहावरे में मूर्त करता है। यह रास्ता संघर्ष और जोखिम का है और मंडलोई उसी पर चलते हैं, जो इधर विरल होता जा रहा है।
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