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Monday, February 7, 2011

मेरे सौन्दर्यबोध के अमर पाठ

संस्मरण
मेरे सौन्दर्यबोध के अमर पाठ
लीलाधर मंडलोई

(1)
एक दाग आपको जीवन भर मनुष्य बने रहने का रास्ता दिखाता है  
कुछ याद करता हूँ तो इंद्रिया जाग उठती हैं। उनका स्मृतियों में जागना चैंकाता है। जैसे चूल्हे में गिरने के बाद जो हुआ। चूल्हे पर चाशनी उबल रही थी। मैं उस खौलती चाशनी पर। दोनों पाँव पर आ गिरी वह। मैं दर्द में चीखा। तो चीखता गया। अस्पताल में कई दिन। बाद में दाग़ जाने में महीने लगे। एक दाग़ अब भी बाक़ी। अब मैं पचपन का। जब भी आग देखता हूँ सिहर जाता हूँ। इस सिरहने में जलने की स्मृति अब भी इतनी जागृत कि ऐंद्रियता के इस दिलचस्प पहलू को जाने किन चीज़ों से जोड़कर देखता हूँ। क्या एक कवि स्मृतियों में जाकर इतना ही सिहरता है। क्या इस भय पैदा करने वाली सिहरन के जीवित बने रहने से सृजनात्मकता का कोई सम्बन्ध बनता है...? क्या मेरा इस तरह सोचना कहीं कुछ जोड़ता है? सोचता हूँ तो हर बार वह चूल्हा, वह घर, माँ, पिताजी, भाई, बहन, अस्पताल, डाॅक्टर, नर्स और बचपन के रिश्ते-नाते संग-साथ चले आते हैं। माँ-पिता के आँसू, भाई-बहन का रोना, नर्स का पट्टियाँ बदलते समय कोमल स्पर्श, बहन का सुलाना आदि। अगर यह सब बचा हुआ है तो एक कवि की पूँजी है। इस सजलता में कुछ ऐसा जरूर है कि मनुष्य जीवन की महिमा का पता चलता है। भले ही जलकर मनुष्य बनो कोई हर्ज नहीं। एक दाग़ आपको जीवन भर मनुष्य बने रहने का रास्ता दिखाता है कि आप ये सब नहीं भूलते जिसे भूल जाने से आप कुछ और होते...शायद मनुष्य नहीं।

(2)
गँध में भीगी-नहाई माँ
    माँ जब खदान से शाम गये लौटती तो पसीने के साथ कुछ और गँध होती। डीजल की गँध। टेमा में भरे गये घासलेट की गंध। वह गंध में भीगी-नहाई हुई माँ होती। मैं दौड़कर उसे चिपटने को होता और वह परे करने का यत्न करती। अनमने मन से। ताकि गँध में कहीं मैं न लिपट जाउ$ँ। लेकिन वह गँध जैसे मुझे भाती थी। माँ को मेरी इंद्रियाँ उन गंधों के साथ अधिक पहचानती थीं। कुछ ऐसा था कि माँ की साड़ियाँ बार-बार धुलने पर भी जैसे उनमें डूबी रहतीं। उनके काम पर जाने के बाद जीजी उनकी कोई एक गंध में जीवित साड़ी को खटिया पर बिछा देती। मैं उस खटिया पर साड़ी के साथ ऐसा बेफ़िक्ऱ सोता कि जैसे माँ के अंक में समाया होउ$ँ। वह गंध आज भी पीछा करती है। गाँव लौटता हूँ तो जैसे वह मुझे घेर लेती है अब भी...।
(3)
धरती से उठती सुगंध का रोग
    भयानक गर्मी। नौतपा खत्म हुआ। माँ रह-रहके आसमान तकती। बारिश के आने के इंतजार में वह जैसे कुछ और हो जाती। अपना गाँव उसे याद आता। बादलो को आसमान में उमड़ते-घुमड़ते देखकर उसकी आँखों में जैसे चमक जाग उठती। बचपन के कई दृश्य या कुछ छवियाँ हैं जिनके पुनः सजीव हो उठने के रोमांच में वह डूब जाना चाहती। वह खेतों को याद करती। हवाओं के शीतल झोंको की बाट जोहती। मैंने जब तक गाँव नहीं छोड़ा उन्हें इसी तरह आकुल देखा।
    और जब बादल घुमड़ते। ठंडी हवा दौड़ती। वह घर के पिछवाड़े बालकराम के खेत में जा खड़ी होती। जैसे ही बारिश की बूँदे गिरना शुरू होती वह खेत में बैठ जाती। भीगती रहती। और बार-बार बुलाने पर भी वहीं बनी रहती। हम देखते वह गीली हो रही मिट्टी को आस-पास पड़ी किसी लकड़ी से खोदने का काम करती। मिट्टी के साथ उसका यह खेल चलता रहता। धीरज टूटने पर मैं भी दौड़ पड़ता माँ के पास। वह मुझे भी मिट्टी खोदने को कहती। मेरे भीगने पर वह परेशान न होती। और मैं भीगने के आनंद में डूबता। खुश होता।
    पहली बारिश में भीगने की ललक से माँ के लिए कुछ बड़ा और विरल सुख नहीं था। माँ को इस तरह भीगते, मिट्टी से खेलते देख पिता जरूर मुस्कियाते थे। लेकिन माँ के भीगने और मिट्टी से इस तरह के प्रेम का रहस्य कुछ बड़े होने पर समझ आया।
    ऐसे ही दिनों में पचलावरे (गाँव) से गम्मू मामा आए थे। और उन्होंने माँ को भीगते-खेलते देखा तो हँस पड़े। जब हमने पूछा तो मामा ने बताया कि बचपन से यह ऐसा ही उ$धम करती थी। तुम्हारी माँ को पहली बारिश में भीगने से अधिक धरती से उठती उसकी सुगंध का रोग है। गाँव में भी ये ऐसे ही खेत में उतर जाती थी। और घँटो इस सुगंध में डूबी रहती थी। बारिश इसके मन के सबसे अधिक पास है। इस मौसम में वह सबसे ज्यादा खुश रहती है। बीमार नहीं होती।
    कुछ चमत्कार था कि माँ के साथ-साथ बारिश मेरे साथ जीवन में अपनी पहली सुगंध के साथ चली आई। बारिश के पहले ‘झले’ के साथ ही, मैं उस सुगंध में डूबने को व्याकुल हो उठता हूँ। मैं उसे एकदम साथ लिये यहाँ तक चला आया हूँ। आज मेरे बच्चे बारिश में भीगना पसन्द करते हैं और खूब लेकिन कृत्रिम खुश्बुओं के बीच वे धरती की सुगंध को उस तरह चीन्ह नहीं पाते। मैं अपनी माँ से इधर तक की यात्रा में उस सुगंध के चले आने पर चकित हूँ और बच्चों के भीतर से उसके खो जाने पर दुखी ...। मैं माँ को याद करता हूँ। इतना सजीव दृश्य। इतनी सजीव सुगंध...। माँ...अब भी इतनी सजीव अपनी इंद्रियों सहित...।

(4)
ख़ुशबुओं में बिलमा के
    जाने किसने माँ को सिखाया था कि रसोई के अलावा घर और पिछवाड़े में सुवास का पर्यावरण रखो। ऐसा करने से भूख बनिस्बत कम लगती है या कहें भूख से लड़ने में मदद मिलती है। सो माँ ने इस गुण को गाँठ बाँध लिया। वह हमसे शायद इसी वजह कहती कि इसे सूँघो। इसे जरूर। और इसे न सूँघा तो क्या सूँघा। तो बाड़ी में धनिया जरूर उगे। अमरुद के पेड़ हों और पके अमरुद की गंध घर के आर-पार हो। तुलसी के बिना कोई घर, घर नहीं होता। सो वह सदैव बनी रहे। इसके अलावा अजवाइन, गुलाब, अनार, मैथी, पुदीना आदि का उन्होंने कभी साथ न छोड़ा। ये गाँव के घर के अपरिहार्य अँग थे। माँ ने इनकी खुश्बुओं में बिलमाके हमें कैसे भूख के भय से दूर रखने में सफलता पाई, इसे आज समझा जा सकता है। घर में दाना न हो तो अजवाइन के पत्तों के भाप में पके व्यंजन, मैथी का ढेर सा साग भात के साथ, पुदीना की चटनी के साथ अमेरिकन लाल ज्वांर के टिक्कड़, लहसुन की तीखी चटनी के साथ पेजा, पुदीना और आम की चटनी के साथ मक्के की रोटियाँ। माँ ने समझ रखा था कि दो ही अन्तिम सत्य है स्वाद और गँध। जैसे पिता को अगर दाल में हींग की सुगंध मिल जाए तो हो सकता है घर में दो रोटी अगर उनके भोजन में कम हो तो कोई बात नहीं।
    इस तरह सुगंध-स्वाद में कह सकते हैं मूर्ख बनाते हुए माँ ने दो कौर या दो रोटी को कम करते हुए घर चलाने को गणित बखूबी सीख रखा था। हम भूख से ज्यादा सुगंध-स्वाद को करते हैं बार-बार याद। भला इसे क्या कहें? इंद्रियाँ भूख जगाती हैं। यहाँ माँ ने ऐसा क्या जादू सीखा कि भूख कम जागती थी। कदाचित सुगंध में हरदम बने रहने की वजह से। या शायद कोई और रहस्य। कम से कम मैं नहीं समझ सका। बहुत-बहुत भूख लगने पर भी उतना कभी न खा सका जितनी औरों की सामान्य भूख होती है...। मुमकिन है यह वैज्ञानिक सत्य न हो। किन्तु जिस दिन रसोई में खाना पकाने जाता हूँ और मसालों की सुगंध के बीच बनते हुए भोजन के साथ रहता हूँ उस दिन रोटी-दो-रोटी की भूख कम हो जाती है। और माँ की उस गणित को सच मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं ढूँढ पाता...। मैं सचमुच विकल्पहीन बने रहते हुए जितना जीवन बचा है, इसी भरोसे में जीना चाहता हूँ।

(5)
शेर छाप बीड़ी की गँध
    पिता क्रोध में शेर की तरह दहाड़ते थे। वे मोहनलाल हरगोविन्ददास की ‘शेर छाप बीड़ी’ पीते थे। हमें लगता यह शेर छाप बीड़ी का प्रताप है। हमारे घर में बीड़ी के धुएँ की गंध चैतरफ डोलती रहती थी। ये कुछ अजीब था कि माँ पिता को बीड़ी पीने पर टोकती थी लेकिन उसकी गंध को पसन्द करती थी। पिता की सुआपी (अंगोछा) और कुर्ते में वह गंध होती थी और शायद पसीने की भी। हमने माँ को कई दफा उन्हें सूँघते हुए देखा था। चोरी-छिपे मैं भी सूँघता और मुझे अच्छा लगता। पिता की अनुपस्थिति में इस तरह पिता के साथ रहने का एक अनोखा अनुभव बचपन में बना रहा। ऐसा भी हुआ कि पिता के घर पर न होने पर उनके बंडल से बीड़ी निकालकर चोरी से पीने की कोशिश भी की किन्तु उसे पीना कभी अच्छा न लगा। हाँ उसकी गंध ने जरूर बाँधे रखा। आज भी कोई शख़्स बीड़ी पीता हुआ मिल जाए तो मैं चुपचाप उसके पास कुछ देर के लिए खड़ा होकर गंध में डूब जाना चाहता हूँ।

(6)
वात्सल्यों के स्पर्श में डूबे वे दिन
मैं कई रोज़ बुखार में था। देसी-विदेशी दवाओं के प्रयोग रोज़ होते। कोई कहता मियादी बुखार। कोई मलेरिया। कोई कुछ और। माँ ने काम पर जाना बंद कर दिया। वह बस घर पर मेरे साथ बनी रहतीं। पट्टियाँ पानी की दिन भर बदली जातीं कि बुखार में पड़ता शरीर शीतल हो।
    उन दिनों सबसे अधिक शीतलता माँ के प्यार में मिलती। वह चूमती तो लगता हवा का सबसे शीतल झोंका घर में आके आ विराजा हो। उसके अधरों का स्पर्श अनोखी शांति देता। माथे पर, गालों पर, होठों पर, आँखों पर। ममता जैसे आत्मा सहित बहती रही हो। वात्सल्य के स्पर्शों में डूबे वे दिन आज इतने मूर्त और जीवंत हैं कि लगता है कि फिर वैसा बुखार हो। फिर माँ हो। और माँ के वे अविस्मरणीय स्पर्श। कोई सलोना वैसा स्पर्श मिल जाए अब भी, इसकी इच्छा अशेष बनी रहती है...। ऐसे स्पर्श कदाचित ढूँढता रहता हूँ मैं आकुल-व्याकुल सा...।

(7)
आँखों में सदैव कुछ खोज लेने का भाव
घर से एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर महुआर था। महुआ के पेड़ों को सघन कुंज। आम, जामुन और नीम के भी। कई तरह की जंगली झाड़ियाँ। सतपुड़ा का हरा सौन्दर्य। छोटे-छोटे से नाले जो पानी से भरे रहते। नालों में मछलियाँ। इठलाती-तैरतीं। करौंदे के छोटे-छोटे गोल मटोल फलों का गुच्छा। बेल के पेड़। हम बेलपत्रा पूजा के लिए तोड़ने हर सोमवार जाते। महुआर जो सतपुड़ा घाटी में था, उससे दोस्ती पहले पहल हुई। जैसे-जैसे बड़े होते गये जंगलों में उतरना शुरू हुआ। वहीं हमने खरगोश, हिरन, भालू यहाँ तक चीतों और लकड़बग्घों को देखा। देखने का अतीव सुख आपको भीतर तक हरा-भरा करता रहा। प्रकृति का सत्संग एक जुदा अनुभूति थी। पत्तों, फलों, पेड़ों को छूना। किसी शाखा पर बैठकर आम चूसना या जामुन खाना। जीवन का ऐसा काल जब आप ऐंद्रिक रूप से पूरी तरह जवान। फलों के गिरने की ध्वनि मात्रा से दौड़ पड़ते उस दिशा में। हवा का रूख़ पहचानते और जीव जन्तुओं की आवाज़। गाय के खास ढंग से रंभाने मात्रा से आप समझ जाते कि वह अपने बछड़े को पुकार रही। आपके ध्वनि बोध में इज़ाफा होता। आपकी अँगुलियाँ स्पर्शों से वस्तुओं को पहचान लेतीं। आपकी आँखों में सदैव कुछ खोज लेने का भाव होता। आप धूप-छाँह के अर्थ जानते और हवा का संगीत। बारिश की टप-टप करती बूँदों की हो या कि झमाझम जलवर्षा का नाद। आप प्रकृति की पाठशाला में जितना सीखते उतना न तो किताबों से, न फिल्मों से। प्रकृति का स्वभाव प्रकृति के साथ ही रहकर समझ आता। कल्पना इसमें दूर तक आपकी हम सफर नहीं होती।
आज कहने भर को महुआर है। सतपुड़ा का वैसा नैसर्गिक गाना कब का बन्द हुआ। न पेड़ उतने बचे कि हवा झूमे, न नालों में इतना पानी कि मछलियाँ इठलायें। अब बंदरों के अलावा दूसरे जानवरों का जैसा नामो निशान नहीं। लौटता हूँ जैसे उजाड़ में। बच्चों को जंगल घुमाना हो तो कहीं और का रुख करो। देखने-दिखाने, छूने-खाने का सिलसिला जैसे ख़त्म हुआ। भाई की बेटियाँ किताबों में पढ़कर जंगल के बारे में पूछती हैं और मैं उन्हें किसी दिन ले जाने का वादा कर चुपा जाता हूँ। बच्चों ने क्या कुछ खोया है यह जानकर मैं अपने पोरों, तलुओं में छूट गई गुदगुदी, आँखों में बचे रह गये रोमांच और कानों में शेष ध्वनियों को याद करता हूँ...। मैं बचपन के जंगल-महुआर में लौटना चाहता हूँ। जगह-जगह लिखा एक ही बोर्ड हैµ‘आगे खदान का इलाक़ा है। ब्लास्टिंग का समय है। कृपया इसके आगे न जाएँ।’ और मैं ठिठकता हूँ तो जैसे फ्रीज़ हो जाता हूँ...।
(8)
पिसान से उठती सुगँध
    चक्की जैसे शब्द से आज के बच्चों का जैसे कोई वास्ता नहीं। खासकर शहरों में। वे सब सामान घर बैठे बाज़ार से पा लेते हैं। हाथ चक्की का तो वे शायद नाम भी न जानते हों। बचपन में हमने हाथ चक्की का संगीत सुना। घरर-घरर। जैसे एक लय में किसी चट्टान से उतरनी नदी की धारा का संगीत। माँ के घूमते-झूमते हाथ किसी अदृश्य लय में। एक से दाना डालना चक्की के मुख पर। दूसरे से चक्की की मूँठ पकड़कर उ$परी पाठ को घुमाना। दाने के पिसान से उठती सुगंध। चने की दाल हो अथवा गेहूँ, जब पिसता तो एक मादक उष्ण गंध घर के उस इलाक़े को घेर लेती। अन्न से उठती इस सुगंध में मन जैसे झूम उठता। सुगंध का इतना आकर्षक की आटे को मैं ऐसे ही फाँक लेता जैसे प्रसाद या पंजीरी।
    इस सुगँध का मेरे बचपन का दोस्त भुप्पी भी दीवाना था। वह गाँव वालों का दाना पिसाने का काम करता था। इससे उसे कुछ पैसा मिल जाता है। जब वह बिजली वाली चक्की पर जाता तो घंटे-दो-घंटे पिसान के बाद भी खड़ा रहता और तरह-तरह के अन्न-गेहूँ, ज्वाँर, बाजरा, मक्का के पिसते आटे की सुगंध में डूब जाता। वह ताज़ा आटे को बड़े स्वाद के साथ खाता। इस बीच किसी ने कुछ कहा तो जवाब देते समय आटे के कण उसके मुँह से निकलते और वह एकाएक मुँह बन्द कर लेता। आटा फांकते-खाते हुए उसकी आँखों में चमक सी उठती रहती। नथुने आनन्द में फड़कते। और वह एक दूसरा भुप्पी होता सुगंध में डूबा...

(9)
गोबरी रंग के सुख छुई के साथ
बचपन में हम गोबर उठाने जाते। एक लोहे का तसला होता या बांस की सघन टोकरी। गोबर लाने के दो कारण थे। घर के पीछे उपले थोपना और कच्चे घर की धरती को लीपना। शुरू में कुछ दिन गोबर उठाने में जुगुप्सा भाव बना रहा। लेकिन धीरे-धीरे ताजे़ गोबर की गंध मन को भाने लगी। हम माँ के साथ उपले थापते और बाल्टी में गोबर का पानी मिलाके घर के भीतरी कमरों की ज़मीन को लीपते। लीपना एक कला है यह हमने माँ से जाना। गोबर का रंग लिपाई में सब जगह एक सा होना चाहिए। इस तरह गोबर की लिपाई करते हुए, हमने गोबरी रंग के सुख को जाना। आँखों को यह इतना भाया कि एक आत्मीय बिम्ब की तरह बस गया। रंग के अलावा उसकी गँध ने चेतना पर कब्जा कर लिया। लिपाई के बाद जब वह सूखकर अपने रंग और गंध का साम्राज्य फैला देता। घर सचमुच का घर हो उठता और बाहर जाने का मन न होता।
कच्चे घरों में पुताई की एक और गंध का वास होता है। जमीन की लिपाई तो गोबर से होती थी। दीवारों को छुई से पोता जाता था। आज के समय में इसे पुताई वाले चूने का विकल्प कहा जा सकता है। छुई की छोटी-मोटी प्राकृतिक खदानें होती हैं। किन्तु पूरी तरह सफ़ेद छुई की मिट्टी मिलना संयाग से ही होता था। मिट्टी कोमल और चिकनी होे। कंकड़ न हों। इसकी छनाई घर में कठिन होती है। अतः उम्दा मिट्टी की तलाश में हम टेकरियों-पहाड़ियों की शरण में जाते थे। मिट्टी को पहचानने में रज्जो ने हमारी बड़ी मदद की। वह इस मामले में होशियार थी। उसे छुई मिट्टी का स्वाद प्रिय था। वह उसे चुपके-चुपके खाती पाई जाती थी। इसलिए स्वाद का धर्म जान लेने के कारण वह उसे खोज निकालती थी। हम छुई मिट्टी को खोदते, बोरी में भरते और सिर पर उठाये घर लौटकर माँ को अचंभित कर देते।
घर की धरती तो गोबर से चमक उठी। अब दीवारों की बारी। छुई पानी में भिगोई जाती। पोतने के लायक कुछ पतली की जाती। फिर कपड़े के पोतने से स्टूल या कुर्सी पर खड़े होकर पोतने के आनन्द में डूब जाते। नन्हे हाथ एक बड़ी दीवार को पोतकर जीत लेने का स्वप्न देखते। नीचे के हिस्से हमारे हाथ पड़ते। उ$पर माँ के। घर की दीवारें लगभग सफेदी में नहाकर हँसने लगती। आँखों को अपने ही घर का यह मौलिक सौंदर्य भला लगता। एक सुकून। सुन्दरता का। गँध का। शायद इसी तरह हमने घर को सुन्दर बनाते हुए दुनिया के सुन्दर होने की कामना की। हम आज भी इसी प्रार्थना में डूबे हैं।




(10)
नीम से उतरती पाहुनी हवा
पिता का प्रिय पेड़ नीम था। गाँव में एक विशाल नीम के पेड़ तले उनके दोस्तों की जमघट होती थी। खासकर गर्मी के दिनों में ये जमघट नियमित हुआ करती थीं। नीम के पड़े से आलिंगन कर बहती हवा प्राणदायी हुआ करती थी। और खदान में काम करने वाले मजूरों के लिए तो नीम वरदान थी। कहते हैं जितना शुद्ध पर्यावरण अकेला नीम करता है शायद दूसरे पेड़ नहीं। एक और तथ्य कि वैसाख और जेठ की गर्मी की तीव्रता के बीच ही नीम की पत्तियाँ युवा होती हैं। वे गर्मी की तीव्रता को सोखकर ठंडी हवा के झोंके उपहारस्वरूप सौंपती हैं। कहना न होगा कि उन दिनों में न बिजती होती थी, न पंखें। दरवाजे-खिड़कियाँ खुला रखो और नीम से उतरती पाहुनी हवा को घर में बगर जाने दो। हवा समूचे ममत्व के साथ नींद की दुनिया में यात्रा कराने को प्रस्तुत हुआ करती थी। पिताजी के कुछ साथी तो पेड़ के नीचे ही सो जाया करते थे। आज के जमाने में पेड़ के इस दुलार को कौन समझाता है। अब कहाँ फुर्सत और चिन्ता कि कोई नीम आपको पुकारे और आप इसकी छाँह में हो लें। पिता कहा करते थे जो सुख पिता के कँधे पर सवार होने और माँ के आँचल में छुप जाने में मिलता है वही अनुभूति नीम की छाँह में। नीम के पड़े में संगीत का खजाना है। कोयल की कुहुक और चिड़ियों के कंठ से सुबह शाम फूटती रागनियाँ यही पेड़ देता है। चिड़ियाँ यदि अपने सुबह-शाम का ठिकाना इस पेड़ को बनाती हैं। तो इस रहस्य और महत्व को समझना चाहिए। पंछियों की धमनियाँ को ऐसी हवा चाहिए जो उन्हें निरोग रख सके। ऐसा वातावरण कि वे उन्मुक्त चहक सकें। कागा को गाँव में ऐसा समीपी पेड़ कि वह जब बोले तो इसमें पाहुने के आने का संदेश हो। बच्चों के लिए ममत्व का एक ऐसा आसरा हो घर के आस-पास कि काम पर गये माता-पिता की अनुपस्थिति में वे निर्भय होकर खेल सकें। इस पेड़ के पास देने को कई आशीर्वाद हैं। दातून, कोमल पत्तियाँ कई रोगों से लड़ने के लिए छाल, चर्म रोग से मुक्ति के लिए निमोली से निकलने वाला तेल है घाव भरने के लिए, अनाज को सुरक्षित रखने के लिए इसकी पत्तियाँ हैं जो कोठार का अविभाज्य अंग। ऐसे नीम धन्वन्तरी ने हमें कुछ जरूरी आयुर्वेदिक ज्ञान से नवाजा। माँ कहा करती थी कि नीम से दोस्ती जीवन से प्रेम करने के समान है। दमड़ू कक्का नदियों के किनारे के अलावा इसे भी संस्कृति का केन्द्र मानते थे। किस्से-कहानी, गप्पगोई, गाना-बजाना, पंगत आदि इसी पेड़ के नीचे, इसकी अमर अध्यक्षता में संभव होते थे। सावन में झूले भी इसी पेड़ पर पड़ते थे और स्त्रिायों की उन्मुक्त हँसी बस्ती को भर देती थी। अगर कोई आनगाँव की नौकरी पर जाता तो बढ़े-बूढ़े आशीर्वाद देते ‘नीम सा बड़ा हो, नीम का मन पाये।’ क्या हम ‘नीम का मन’ पाने का अर्थ समझ पाये। नीम ने मेरे मन में सौंदर्य का थोड़ा सा उजाला भरा है, मैं उसे हवा के अँधड़ों से बचाए हुए हैं ताकि थोड़ा ही सही उजाले करने में जुगनू सी भूमिका निभा सकूँ।

(11)
सूर्य: बचपन का आनंददायी पाठ
पिता सुबह-सुबह स्नान के बाद सूर्य को प्रणाम करते थे। मैं उनके साथ खड़ा हो जाता। सूर्य को देखता। चाहता कि टकटकी लगाके कुछ समय तक देख सकूँ। लेकिन आँखें पनियाने लगती। सूर्य के बारे में जब मैं पिता से पूछता तो वह कहते, ‘सूर्य समय देवता है, प्रकाश देवता है, प्रकृति के भीतर और बाहर के बदलते रूप, रंग, स्वभाव में सूर्य ही है। उसी के कारण अन्न है, जल है, अग्नि है, परिवर्तन है। एक अकेले सूर्य में सृष्टि को बनाने संवारने के जितने गुण हैं उतने किसी और नक्षत्रा में नहीं। वह धरती का तारणहार है। मैं सोचता बचपन में कि सूर्य न हो तो जैसे सब कुछ रूक जाए। उसके आने पर जागने और जाने पर सोने का जो ज्ञान हुआ, इन्हीं दो आश्चर्य को समझना जैसे सोचने की प्रक्रिया में पहले-पहल प्रवेश करना है।
बचपन में सूर्य की महिमा सुनते हुए मैंने उसे जाना। प्रकाश का महत्व, ताप की गरिमा, उसकी उपस्थिति मात्रा से जीवन चक्र में गति का प्रवेश, संक्राति पर्व पर उसका सांस्कृतिक अर्थ आदि। माँ कहा करती थी बाकी देवी-देवता तो ध्यान में रहते हैं यदि कोई है जो इतना अधिक साकार तो सूर्य है और चन्द्रमा। ये दोनों जो करते हैं सामने है। बाक़ी मन की बातें हैं। अगर इन दोनों के हिसाब से चलो और बड़े-बूढ़ों की बात मानो तो स्वस्थ-प्रसन्न तो रहोगे ही। और यह कम बड़ा वरदान नहीं। जो सूर्य की सुन्दरता समझता है, चन्द्रमा उसके पास अपनी सुन्दरता लिए आ खड़ा होता है।
इन दोनों के किस्से-कहानी, महत्व, भूमिका, अवदान को समझते हुए सूर्य के सौंदर्य को जानना बचपन का आनंददायी पाठ था। मुझे लगता है भीतर अँधेरे से लड़ने की जो ताकत है और उजाले के पक्ष में खड़े रहने की प्रतिबद्धता, वह सूर्य ने दी। मैं उसका आजीवन ऋणी हूँ।

(12)
जल महिमा का गान
मैंनें पार की नदी
कागज की नाव में

बचपन की
इस कला ने
कभी डूबने न दिया
सावन के महीने में पोखर, तालाब, नदी-नाले भर उठते थे। पानी से हमारी पहचान का यह अद्भुत मौसम होता था। हम बरसते पानी में निकल पड़ते। उसे बालों, भौंहों, आँखों, होठों और देह के बाकी अंगों पर अनुभव करते। देह में अव्यक्त रोमांच की लहर दौड़ती। देह की शीतलता का गहरा आभास होता। आज भी नहाते समय पानी के वे पहले संस्मरण याद आते हैं।
पानी की गरिमा के आख्यान हमें बचपन से संस्कारों को देखते-समझते मिले। पेड़-पौधों को पानी देना, सूर्य को जल चढ़ाना, शालिगराम को पूजा के पहले नहलाना, मेहमान के आते ही पानी का लोटा लेकर पहुँचना, वर-वधु के प्रवेश पर सदी द्वारा पानी दरपना, वर-वधु का पानी की परात में अँगूठी खोजते हुए स्पर्श सुख से एक-दूसरे के करीब आना, मिट्टी की मूर्तियाँ गढ़ने के पूर्व मिट्टी को पानी से तैयार करना, कथा-भागवत में पानी से धरती पर छिड़काव कर उसे पवित्रा करना, पूजा के पूर्व पवित्रा होने के लिए पानी का प्रयोग आदि।
जीवन की सुबह पानी के स्पर्श से होती है। हाथ-मुँह धोये या नहाये बिना कोई काम शुरू होता हो, यह देखने में नहीं आता। पानी की इस महिमा को हमारे पूर्वज समझते थे। माँ कहती है देखो यह पानी, हवा और धूप है जो हमारे पास बिन-बुलाये आते हैं हमारे जीवन को संवारने। पानी आसमान से होता हुआ नदी, तालाब, पोखर, झरनों में आता है। वह समूची सृष्टि की भलाई के लिए है। पानी में परोपकार है। वह सबके कल्याण के लिए निस्वार्थ भाव से आता है। हम स्वार्थवश जाते हैं। उसका दोहन करते हैं। पवित्राता को नष्ट करते हैं। और छोड़कर चले जाते हैं। ‘बिन पानी सब सून’ का पद उनकी जुबान पर रहता था क्योंकि दूर-दराज से पानी ढोने का दर्द स्त्राी होने के नाते वह अधिक जानती थी। किसी भी यात्रा में जाती तो नदी का पानी लाने के लिए पीतल का एक ढक्कन वाला पात्रा ले जाना न भूलती जिसे वो ‘गंगाजली’ नाम से पुकारती। उसकी पूजा में जिन लोक देवी-देवता के नाम आते उसमें ‘झिरिया माता’ थी। उसे वह देवी मानती। ‘झिरिया’ अर्थात पानी का एक कुंड उनके गाँव उड़नी पिपरिया में, जो कभी न सूखा। आज भी। अकाल के दिनों में भी उसके सूखने की कोई स्मृति नहीं।
आज हम जलसंवर्धन की बात करते हैं। जल से उतना प्यार नहीं। जितना पूर्वज करते थे और आज बचे खुचे बुजुर्ग। अंदमान-निकोबार द्वीप समूह में वर्षा के संग्रहीत जल से ही गुजारा चलता है। इसलिए खारे पानी के बीच संग्रहीत मीठे जल की महिमा का गान है। वहाँ लोग प्यास का अर्थ जानते हैं। उसकी शिद्दत। वे नारियल पानी और बाँस पानी से कठिन यात्रा में अपनी प्यास बुझाते और जीवन संघर्ष में बने रहते हैं।
बचपन में पानी को लेकर घर में अनेक संवाद स्मरण में हैं। यहाँ तक पानी के झगड़े। कँुए, तालाब पर कब्जा करने के लिए लड़ाइयाँ। आँखों में पानी की कथाएँ रोने, प्रसन्न होने की। देह में सात गुना पानी का सच भी स्कूल में ही पता चला। पेड़-पौधों में पानी की उपस्थिति।
मुझे लगता है संवेदना में जल है। मैं इस जल के भरोसे चल रहा हूँ। मैं चलूँगा कि मैं चाहता हूँ जल बना रहे सृष्टि के कण-कण में...

(13)
संगीत के गुरु-गुरुमाताओं की याद
हमारे इलाके में गोंड जनजाति के लोग अच्छी संख्या में हैं। इन्हें बचपन में हम आश्चर्य से देखा करते थे। बेफ़िक्री और बेलौसपन इनके जीवन में बिखरा हुआ था। गोंड स्त्रिायों के आभूषण अभी भी स्मृति में टंके हैंµचुरिया, पटा बहुँआ, पैरी सतुवा, चुटकी तोड़ा, हमेल, ढार, ढरका, तरकी बारी, टिकुसी आदि। इन आभूषणों की चमक और ध्वनि अब भी कौंध-कौंध जाती है। पुरुष भी आभूषणों में याद आते हैंµचांदी का चूड़ा, कान का बूँदा, गले में मोहर और हाथ में अँगूठी। सजे-धजे गोंडों की निर्मल मुस्कानों में चमकती दंत पंक्तियों का सौंदर्य अब भी पीछा करता है। उनकी हँसी को हम कभी पा न सके। वे हँसते तो उनकी देह के गोदने जैसे नाचते-लगते। उनकी इस मान्यता पर मैं आज भी हैरत में हूँ कि गोदने मृत्यु के बाद आत्मा का शृंगार करते हैं यह अद्भुत कल्पना है जैसे अमर काव्य पंक्ति।
अद्भुत श्रम उनके जीवन का सामान्य गुण है। कभी न थकने वाली चेतना। दिन भर के श्रम के बाद थकान को संगीत में डुबा देने का हुनर और प्रसन्न बने रहने की जुगत कहीं और दिखाई नहीं देती। गोंडों के नृत्य-संगीत को याद करता हूँ तो देेह थिकरनों को आमंत्रित करती है। करमा, सैला, सजनी, भड़ौनी, कहरवा और सुआ नृत्यों की आज भी मधुर स्मृतियाँ हैं उनकी समूची देह ‘राग’ हो उठती थी। सजनी नृत्य की भाव मुद्राओं की अतरंगता और तल्लीनता में युवा जोड़ियों का दुनिया को भूलकर खो जाना जैसे विलक्षण बिम्ब है। दिवाली नृत्य के वाद्यों माँदल, टिमकी, सिंगबाजा, नगाड़ा, मंजीरा, खरताल, ठिसकी, चुटकी, झाँझ, बाँसुरी, अलगोझा, तमूरा, चिकारा और किंदरी के स्वर आज भी मन को घेरे हुए हैं। पाँवों की थिरकन और कंठ से उठते नाद स्वरों की गूंज-अनुगूँज में नृत्य-संगीत से प्रथम साक्षात्कार की अमिट छवियाँ हैं। गुनगुनाते नकल करते हुए धुनों को मन में अबेर लेने की कोशिश ने उनके खजाने से कुछ अब भी बचा रखा है। संगीत के प्रति जितना राग है या कान श्रवण में जितने भी पगे हैं उसके मूल में निश्छल-निष्पाप गोंड़ों के संगीत की छवियाँ हैं और श्रवण बिम्ब। कदाचित इन्होंने मेरे लिखने में बहुत कुछ ऐसा जोड़ा है जो मैं अनुभव तो करता हूँ परन्तु साफ-साफ चीन्ह नहीं पाता। संगीत के उन गुरु-गुरुमाताओं को बस याद करता हूँ। उनके चेहरे स्मृतियों में पूरी तरह साकार नहीं होते। बस वह संगीत है जो गूंजता रहता है।

मालवीय मास्साब, पातालकोट और धरती माँ
भारिया आदिवासी पातालकोट में रहते हैं। उनके छोटे-छोटे से गाँव हैं। स्कूल में 9वीं 11वीं की पढ़ाई के बीच उनसे मिलना हुआ। हमारे एक मालवीय मास्साब थे। वे तामिया में रहने चले गये थे। हम तामिया जाते और वे हमें तामिया घुमाते। पातालकोट के गाँव घुमाने भी ले जाते।
भारिया की यादें अभी भी जैसे ताजा है। छरहरे बदन। नाक चैड़ी किन्तु सुडौल। आँखें बनिस्बत छोटी। स्त्रिायों के अधार पतले। दंत पंक्तियाँ आकर्षक। श्यामवर्ण। गठा हुआ शरीर। देह चुस्त और गतिमय। भारिया पुरुष धोती, कुर्ता, बंडी व पगड़ी पहनते हैं। स्त्रिायाँ लाल रंग की सेंदरी साड़ी और पोलका धारण करता हैं। गोदने से शरीर के अंगों का विन्यास करते हैं।
भड़म, सैतम और करम-सैला उनके प्रिय नृत्य हैं। ढोल, टिमकी, झाँझ, ढोलक व बाँसुरी प्रमुख वाद्य। विशेष यह कि स्त्रिायाँ मंजीरा और चिटकुला बजाते हुए मदमस्त हो सबकुछ भूलकर नाचती गातीं। मालवीय मास्साब के सहयोग बिना उन तक पहुँचना और घुल-मिल जाना कितना कठिन था अब समझ में आता है। विद्यार्थी जीवन में घूमने सीखने की ललक होती है यह मास्साब जानते थे। उन्होंने भारियाओं के घर दिखाये। उनके देवता भीमसेन के बारे में बताया। भारिया बाघ की पूजा भी करते हैं। मास्साब ने दरवाजों पर उकेरे चित्रों से परिचय कराया। बाँस और छिंद के पत्तों से बने सूपे, टोकरियाँ और अन्य कलात्मक वस्तुएँ दिखाई। पेड़ों के छाल से बनी रस्सी देखकर हम अचंभित हुए। छूकर देखा तो मजबूती का पता चला।
सबसे अधिक जिज्ञासा उनके खाद्य पदार्थों की जानकारी पाकर जागी। हमने उन भाजियों के नाम ही नहीं सुने थे देखना तो दूर। छबई, भाड़का, मौसिया और छितावर की भाजी। मैनहर व कातुल की सब्जियाँ। कंद-मूल में नंदमाती, सेतकंद, बरहाकंद, कडुकंद, गोहलारी, ठेंगी, खटवी, भैरों, सुआरूख, बनसिंघाड़ा, महुल, मछारिया आदि। हमें वहाँ उनका एक पकवान खाने को मिला ‘ठेठरा’। आटे में महुआ मिलाकर इसे बनाया जाता है। खूब स्वादिष्ट लेकिन सख्त। महुआ और आम की बीजी की रोटी भी इनका भोजन का हिस्सा है, जो बरसात में इनका आसरा है। मछलियों का शिकार पानी उलीचकर करते हैं व पशु-पक्षियों के आखेट के लिए फंदे बनाते हैं। वनोपज में महुआ, चिंरौजी, गोंद, हर्रा, आँवला, गुल्ली, लाख आदि इनका आर्थिक आधार है जिसे हफ्ते की हाट में बेचकर जरूरती चीजें खरीद लेते हैं।
मालवीय मास्साब ने हमें ऐसे समाज के दर्शन कराये और व्यवहारिक रूप से जीवन का हिस्सा बनाया कि वह किसी स्कूली पढ़ाई से अधिक सार्थक रहा। आज स्मृतियों में जो बचा है वह देखने-सुनने और उनके बीच रहने का नतीजा है। कुछ स्वाद, कुछ सुंगधें, कुछ ध्वनियाँ, कुछ धुनें, संगीत के कुछ विरले वाद्य स्वर स्मृतियों में अब भी छूटे हैं और आदिवासी जीवन के कुछ सघन दृश्य जिसमें वनस्पतियाँ है और पेड़-पौधे। हवा के तीखे अहसास धूप की गर्म स्मृति। कितना कुछ है यादों में आवाजाही करता।
लेकिन एक स्मृति ऐसी भी कि जिसे भूलना नामुमकिन। भारियाओं की डहिया खेती। पाताल कोट की भूमि समतल नहीं है। पहाड़ पर सीढ़ीनुमा या नालीहार खेती होती है। इसमें खुरपी का उपयोग होता है। हल नहीं चलाया जाता। भारिया मानते हैं धरती माँ है। हल चलाकर उसका हृदय चीरना पाप है। बुजुर्ग आज भी हल लाने-बनाने को पाप समझते हैं। हालांकि बदलते वक्त ने परम्पराओं को बदला है लेकिन स्मृति व विश्वास में धरती आज भी माँ है।

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