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Monday, February 7, 2011

दीमक का घर

लीलाधर मंडलोई
(1)
दीमक का घर
कमाल सुन्दर
लेकिन कितना जटिल

सीखता हूँ अपनी कविता रचना

दीमक की भाषा में

(2)
रेत के सजीले घरधूले
बनाए जिन्हें हमने
बचपन में

तोड़े अपनों ने
कभी सनक में
कभी अनजाने

इस तरह जाना हमने
घरों के टूटने का सच

(3)
मेरी भाषा सपनों की सहयात्राी है
जैसे कल देखा मैंने सपना
बरस रही थी आसमान से आग
आज मेरी भाषा यह पौधा रोप रही है

(4)
यह साधारण घटना नहीं
शर्म की बात हैµराम

कि एक स्त्राी ने
प्रतिरोध में
धरती की शरण ली

(5)
इतना दुख
इतना अपमान
इतनी घृणा

मिथिला के लोग
नहीं ब्याहते अपनी बेटी
अयोध्या में



(6)
मैंने प्रार्थना को धर्म से कभी नहीं जोड़ा
जैसे कि मेरी यह प्रार्थना
हर ग़रीब को
वह सब मिले

जो उसका हक़ है

(7)
इस सृष्टि के अन्तिम जीव के लिए
सिर्फ़ प्रेम नहीं
बल्कि उसके जीवन के लिए
लड़ाई का संकल्प है जिसमें
मैं उस धर्म के साथ हूँ

(8)
भारी चट्टान के नीचे
जल है
यह उस फूल ने कहा

सुना आपने!!

(9)
वह एक हत्यारा है
सबने कहा

एक और था वहाँ
कहा जिसने
‘जन्म से नहीं’

उसने सुनी थी
हत्यारे के रोने की आवाज़

(10)
उनके बारे में
कुछ सोचो

जिन्हें देखकर
उदास हो जाता है
कवि का मन

(11)
जब मुदित हो रहे थे
नये बजट पर
लोग

एक भूखा कुत्ता
पागल की गोद में
रो रहा था

(12)
उसने जीत लिया
भूख और दुःख को
सरकार अब
घबराई हुई है

(13)
बच्चे जब भूलने लगे रिश्ते
डूबने लगे
और नयी नातेदारियों में

माँ ने फिर
सुनाना शुरू कर दी
कथा-कहानी

बच्चे और-और
सुनने की ज़िद में
लौटने लगे घर

(14)
करवटें बदलते हुए अमूमन
रात बीत जाती है

कोई एक विचार आ धमकता है भयानक
और एक बैचेन नदी का शोर
सुनाई पड़ता है रात भर
पत्नी की साँसों में

बिल्ली के रोने की आवाज़ में
एक रात और बीत जाती है

(15)
मदन महल की पहाड़ी पर
कुदरत का आश्चर्य

एक बड़ी सी असम्भव चट्टान
नीचे छोटी वाली पर टिकी हुई

मुझे याद हो आया बचपन
माँ जैसे
अब गिरी कि तब

(16)
बिक रहा है खुलेआम
‘मिडनाइट हाॅट’

मैं इस पेशे में
और शर्मसार बहोत

खरीद लेगा एक दिन वह इसे भी
क्या मैं लड़ पाउ$ँगा जबकि
सरकार कह रही है ख़ुशआमदीद

(17)
बचपन में सुनी थी
रानी दीमक की कहानी
रानी दीमक यानि रानी माँ

माँ हम सबकी भी
लेकिन रानी नहीं
न पति के राज में
न उसके बाद

उनके लिए तो
वृंदावन धाम जलता हुआ

जहाँ कृष्ण बांसुरी बजाता है

(18)
दुःख से प्यार करो
जीत होगी

इसमें छिपा है
लड़ने का अमर नुस्ख़ा

मेरे सौन्दर्यबोध के अमर पाठ

संस्मरण
मेरे सौन्दर्यबोध के अमर पाठ
लीलाधर मंडलोई

(1)
एक दाग आपको जीवन भर मनुष्य बने रहने का रास्ता दिखाता है  
कुछ याद करता हूँ तो इंद्रिया जाग उठती हैं। उनका स्मृतियों में जागना चैंकाता है। जैसे चूल्हे में गिरने के बाद जो हुआ। चूल्हे पर चाशनी उबल रही थी। मैं उस खौलती चाशनी पर। दोनों पाँव पर आ गिरी वह। मैं दर्द में चीखा। तो चीखता गया। अस्पताल में कई दिन। बाद में दाग़ जाने में महीने लगे। एक दाग़ अब भी बाक़ी। अब मैं पचपन का। जब भी आग देखता हूँ सिहर जाता हूँ। इस सिरहने में जलने की स्मृति अब भी इतनी जागृत कि ऐंद्रियता के इस दिलचस्प पहलू को जाने किन चीज़ों से जोड़कर देखता हूँ। क्या एक कवि स्मृतियों में जाकर इतना ही सिहरता है। क्या इस भय पैदा करने वाली सिहरन के जीवित बने रहने से सृजनात्मकता का कोई सम्बन्ध बनता है...? क्या मेरा इस तरह सोचना कहीं कुछ जोड़ता है? सोचता हूँ तो हर बार वह चूल्हा, वह घर, माँ, पिताजी, भाई, बहन, अस्पताल, डाॅक्टर, नर्स और बचपन के रिश्ते-नाते संग-साथ चले आते हैं। माँ-पिता के आँसू, भाई-बहन का रोना, नर्स का पट्टियाँ बदलते समय कोमल स्पर्श, बहन का सुलाना आदि। अगर यह सब बचा हुआ है तो एक कवि की पूँजी है। इस सजलता में कुछ ऐसा जरूर है कि मनुष्य जीवन की महिमा का पता चलता है। भले ही जलकर मनुष्य बनो कोई हर्ज नहीं। एक दाग़ आपको जीवन भर मनुष्य बने रहने का रास्ता दिखाता है कि आप ये सब नहीं भूलते जिसे भूल जाने से आप कुछ और होते...शायद मनुष्य नहीं।

(2)
गँध में भीगी-नहाई माँ
    माँ जब खदान से शाम गये लौटती तो पसीने के साथ कुछ और गँध होती। डीजल की गँध। टेमा में भरे गये घासलेट की गंध। वह गंध में भीगी-नहाई हुई माँ होती। मैं दौड़कर उसे चिपटने को होता और वह परे करने का यत्न करती। अनमने मन से। ताकि गँध में कहीं मैं न लिपट जाउ$ँ। लेकिन वह गँध जैसे मुझे भाती थी। माँ को मेरी इंद्रियाँ उन गंधों के साथ अधिक पहचानती थीं। कुछ ऐसा था कि माँ की साड़ियाँ बार-बार धुलने पर भी जैसे उनमें डूबी रहतीं। उनके काम पर जाने के बाद जीजी उनकी कोई एक गंध में जीवित साड़ी को खटिया पर बिछा देती। मैं उस खटिया पर साड़ी के साथ ऐसा बेफ़िक्ऱ सोता कि जैसे माँ के अंक में समाया होउ$ँ। वह गंध आज भी पीछा करती है। गाँव लौटता हूँ तो जैसे वह मुझे घेर लेती है अब भी...।
(3)
धरती से उठती सुगंध का रोग
    भयानक गर्मी। नौतपा खत्म हुआ। माँ रह-रहके आसमान तकती। बारिश के आने के इंतजार में वह जैसे कुछ और हो जाती। अपना गाँव उसे याद आता। बादलो को आसमान में उमड़ते-घुमड़ते देखकर उसकी आँखों में जैसे चमक जाग उठती। बचपन के कई दृश्य या कुछ छवियाँ हैं जिनके पुनः सजीव हो उठने के रोमांच में वह डूब जाना चाहती। वह खेतों को याद करती। हवाओं के शीतल झोंको की बाट जोहती। मैंने जब तक गाँव नहीं छोड़ा उन्हें इसी तरह आकुल देखा।
    और जब बादल घुमड़ते। ठंडी हवा दौड़ती। वह घर के पिछवाड़े बालकराम के खेत में जा खड़ी होती। जैसे ही बारिश की बूँदे गिरना शुरू होती वह खेत में बैठ जाती। भीगती रहती। और बार-बार बुलाने पर भी वहीं बनी रहती। हम देखते वह गीली हो रही मिट्टी को आस-पास पड़ी किसी लकड़ी से खोदने का काम करती। मिट्टी के साथ उसका यह खेल चलता रहता। धीरज टूटने पर मैं भी दौड़ पड़ता माँ के पास। वह मुझे भी मिट्टी खोदने को कहती। मेरे भीगने पर वह परेशान न होती। और मैं भीगने के आनंद में डूबता। खुश होता।
    पहली बारिश में भीगने की ललक से माँ के लिए कुछ बड़ा और विरल सुख नहीं था। माँ को इस तरह भीगते, मिट्टी से खेलते देख पिता जरूर मुस्कियाते थे। लेकिन माँ के भीगने और मिट्टी से इस तरह के प्रेम का रहस्य कुछ बड़े होने पर समझ आया।
    ऐसे ही दिनों में पचलावरे (गाँव) से गम्मू मामा आए थे। और उन्होंने माँ को भीगते-खेलते देखा तो हँस पड़े। जब हमने पूछा तो मामा ने बताया कि बचपन से यह ऐसा ही उ$धम करती थी। तुम्हारी माँ को पहली बारिश में भीगने से अधिक धरती से उठती उसकी सुगंध का रोग है। गाँव में भी ये ऐसे ही खेत में उतर जाती थी। और घँटो इस सुगंध में डूबी रहती थी। बारिश इसके मन के सबसे अधिक पास है। इस मौसम में वह सबसे ज्यादा खुश रहती है। बीमार नहीं होती।
    कुछ चमत्कार था कि माँ के साथ-साथ बारिश मेरे साथ जीवन में अपनी पहली सुगंध के साथ चली आई। बारिश के पहले ‘झले’ के साथ ही, मैं उस सुगंध में डूबने को व्याकुल हो उठता हूँ। मैं उसे एकदम साथ लिये यहाँ तक चला आया हूँ। आज मेरे बच्चे बारिश में भीगना पसन्द करते हैं और खूब लेकिन कृत्रिम खुश्बुओं के बीच वे धरती की सुगंध को उस तरह चीन्ह नहीं पाते। मैं अपनी माँ से इधर तक की यात्रा में उस सुगंध के चले आने पर चकित हूँ और बच्चों के भीतर से उसके खो जाने पर दुखी ...। मैं माँ को याद करता हूँ। इतना सजीव दृश्य। इतनी सजीव सुगंध...। माँ...अब भी इतनी सजीव अपनी इंद्रियों सहित...।

(4)
ख़ुशबुओं में बिलमा के
    जाने किसने माँ को सिखाया था कि रसोई के अलावा घर और पिछवाड़े में सुवास का पर्यावरण रखो। ऐसा करने से भूख बनिस्बत कम लगती है या कहें भूख से लड़ने में मदद मिलती है। सो माँ ने इस गुण को गाँठ बाँध लिया। वह हमसे शायद इसी वजह कहती कि इसे सूँघो। इसे जरूर। और इसे न सूँघा तो क्या सूँघा। तो बाड़ी में धनिया जरूर उगे। अमरुद के पेड़ हों और पके अमरुद की गंध घर के आर-पार हो। तुलसी के बिना कोई घर, घर नहीं होता। सो वह सदैव बनी रहे। इसके अलावा अजवाइन, गुलाब, अनार, मैथी, पुदीना आदि का उन्होंने कभी साथ न छोड़ा। ये गाँव के घर के अपरिहार्य अँग थे। माँ ने इनकी खुश्बुओं में बिलमाके हमें कैसे भूख के भय से दूर रखने में सफलता पाई, इसे आज समझा जा सकता है। घर में दाना न हो तो अजवाइन के पत्तों के भाप में पके व्यंजन, मैथी का ढेर सा साग भात के साथ, पुदीना की चटनी के साथ अमेरिकन लाल ज्वांर के टिक्कड़, लहसुन की तीखी चटनी के साथ पेजा, पुदीना और आम की चटनी के साथ मक्के की रोटियाँ। माँ ने समझ रखा था कि दो ही अन्तिम सत्य है स्वाद और गँध। जैसे पिता को अगर दाल में हींग की सुगंध मिल जाए तो हो सकता है घर में दो रोटी अगर उनके भोजन में कम हो तो कोई बात नहीं।
    इस तरह सुगंध-स्वाद में कह सकते हैं मूर्ख बनाते हुए माँ ने दो कौर या दो रोटी को कम करते हुए घर चलाने को गणित बखूबी सीख रखा था। हम भूख से ज्यादा सुगंध-स्वाद को करते हैं बार-बार याद। भला इसे क्या कहें? इंद्रियाँ भूख जगाती हैं। यहाँ माँ ने ऐसा क्या जादू सीखा कि भूख कम जागती थी। कदाचित सुगंध में हरदम बने रहने की वजह से। या शायद कोई और रहस्य। कम से कम मैं नहीं समझ सका। बहुत-बहुत भूख लगने पर भी उतना कभी न खा सका जितनी औरों की सामान्य भूख होती है...। मुमकिन है यह वैज्ञानिक सत्य न हो। किन्तु जिस दिन रसोई में खाना पकाने जाता हूँ और मसालों की सुगंध के बीच बनते हुए भोजन के साथ रहता हूँ उस दिन रोटी-दो-रोटी की भूख कम हो जाती है। और माँ की उस गणित को सच मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं ढूँढ पाता...। मैं सचमुच विकल्पहीन बने रहते हुए जितना जीवन बचा है, इसी भरोसे में जीना चाहता हूँ।

(5)
शेर छाप बीड़ी की गँध
    पिता क्रोध में शेर की तरह दहाड़ते थे। वे मोहनलाल हरगोविन्ददास की ‘शेर छाप बीड़ी’ पीते थे। हमें लगता यह शेर छाप बीड़ी का प्रताप है। हमारे घर में बीड़ी के धुएँ की गंध चैतरफ डोलती रहती थी। ये कुछ अजीब था कि माँ पिता को बीड़ी पीने पर टोकती थी लेकिन उसकी गंध को पसन्द करती थी। पिता की सुआपी (अंगोछा) और कुर्ते में वह गंध होती थी और शायद पसीने की भी। हमने माँ को कई दफा उन्हें सूँघते हुए देखा था। चोरी-छिपे मैं भी सूँघता और मुझे अच्छा लगता। पिता की अनुपस्थिति में इस तरह पिता के साथ रहने का एक अनोखा अनुभव बचपन में बना रहा। ऐसा भी हुआ कि पिता के घर पर न होने पर उनके बंडल से बीड़ी निकालकर चोरी से पीने की कोशिश भी की किन्तु उसे पीना कभी अच्छा न लगा। हाँ उसकी गंध ने जरूर बाँधे रखा। आज भी कोई शख़्स बीड़ी पीता हुआ मिल जाए तो मैं चुपचाप उसके पास कुछ देर के लिए खड़ा होकर गंध में डूब जाना चाहता हूँ।

(6)
वात्सल्यों के स्पर्श में डूबे वे दिन
मैं कई रोज़ बुखार में था। देसी-विदेशी दवाओं के प्रयोग रोज़ होते। कोई कहता मियादी बुखार। कोई मलेरिया। कोई कुछ और। माँ ने काम पर जाना बंद कर दिया। वह बस घर पर मेरे साथ बनी रहतीं। पट्टियाँ पानी की दिन भर बदली जातीं कि बुखार में पड़ता शरीर शीतल हो।
    उन दिनों सबसे अधिक शीतलता माँ के प्यार में मिलती। वह चूमती तो लगता हवा का सबसे शीतल झोंका घर में आके आ विराजा हो। उसके अधरों का स्पर्श अनोखी शांति देता। माथे पर, गालों पर, होठों पर, आँखों पर। ममता जैसे आत्मा सहित बहती रही हो। वात्सल्य के स्पर्शों में डूबे वे दिन आज इतने मूर्त और जीवंत हैं कि लगता है कि फिर वैसा बुखार हो। फिर माँ हो। और माँ के वे अविस्मरणीय स्पर्श। कोई सलोना वैसा स्पर्श मिल जाए अब भी, इसकी इच्छा अशेष बनी रहती है...। ऐसे स्पर्श कदाचित ढूँढता रहता हूँ मैं आकुल-व्याकुल सा...।

(7)
आँखों में सदैव कुछ खोज लेने का भाव
घर से एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर महुआर था। महुआ के पेड़ों को सघन कुंज। आम, जामुन और नीम के भी। कई तरह की जंगली झाड़ियाँ। सतपुड़ा का हरा सौन्दर्य। छोटे-छोटे से नाले जो पानी से भरे रहते। नालों में मछलियाँ। इठलाती-तैरतीं। करौंदे के छोटे-छोटे गोल मटोल फलों का गुच्छा। बेल के पेड़। हम बेलपत्रा पूजा के लिए तोड़ने हर सोमवार जाते। महुआर जो सतपुड़ा घाटी में था, उससे दोस्ती पहले पहल हुई। जैसे-जैसे बड़े होते गये जंगलों में उतरना शुरू हुआ। वहीं हमने खरगोश, हिरन, भालू यहाँ तक चीतों और लकड़बग्घों को देखा। देखने का अतीव सुख आपको भीतर तक हरा-भरा करता रहा। प्रकृति का सत्संग एक जुदा अनुभूति थी। पत्तों, फलों, पेड़ों को छूना। किसी शाखा पर बैठकर आम चूसना या जामुन खाना। जीवन का ऐसा काल जब आप ऐंद्रिक रूप से पूरी तरह जवान। फलों के गिरने की ध्वनि मात्रा से दौड़ पड़ते उस दिशा में। हवा का रूख़ पहचानते और जीव जन्तुओं की आवाज़। गाय के खास ढंग से रंभाने मात्रा से आप समझ जाते कि वह अपने बछड़े को पुकार रही। आपके ध्वनि बोध में इज़ाफा होता। आपकी अँगुलियाँ स्पर्शों से वस्तुओं को पहचान लेतीं। आपकी आँखों में सदैव कुछ खोज लेने का भाव होता। आप धूप-छाँह के अर्थ जानते और हवा का संगीत। बारिश की टप-टप करती बूँदों की हो या कि झमाझम जलवर्षा का नाद। आप प्रकृति की पाठशाला में जितना सीखते उतना न तो किताबों से, न फिल्मों से। प्रकृति का स्वभाव प्रकृति के साथ ही रहकर समझ आता। कल्पना इसमें दूर तक आपकी हम सफर नहीं होती।
आज कहने भर को महुआर है। सतपुड़ा का वैसा नैसर्गिक गाना कब का बन्द हुआ। न पेड़ उतने बचे कि हवा झूमे, न नालों में इतना पानी कि मछलियाँ इठलायें। अब बंदरों के अलावा दूसरे जानवरों का जैसा नामो निशान नहीं। लौटता हूँ जैसे उजाड़ में। बच्चों को जंगल घुमाना हो तो कहीं और का रुख करो। देखने-दिखाने, छूने-खाने का सिलसिला जैसे ख़त्म हुआ। भाई की बेटियाँ किताबों में पढ़कर जंगल के बारे में पूछती हैं और मैं उन्हें किसी दिन ले जाने का वादा कर चुपा जाता हूँ। बच्चों ने क्या कुछ खोया है यह जानकर मैं अपने पोरों, तलुओं में छूट गई गुदगुदी, आँखों में बचे रह गये रोमांच और कानों में शेष ध्वनियों को याद करता हूँ...। मैं बचपन के जंगल-महुआर में लौटना चाहता हूँ। जगह-जगह लिखा एक ही बोर्ड हैµ‘आगे खदान का इलाक़ा है। ब्लास्टिंग का समय है। कृपया इसके आगे न जाएँ।’ और मैं ठिठकता हूँ तो जैसे फ्रीज़ हो जाता हूँ...।
(8)
पिसान से उठती सुगँध
    चक्की जैसे शब्द से आज के बच्चों का जैसे कोई वास्ता नहीं। खासकर शहरों में। वे सब सामान घर बैठे बाज़ार से पा लेते हैं। हाथ चक्की का तो वे शायद नाम भी न जानते हों। बचपन में हमने हाथ चक्की का संगीत सुना। घरर-घरर। जैसे एक लय में किसी चट्टान से उतरनी नदी की धारा का संगीत। माँ के घूमते-झूमते हाथ किसी अदृश्य लय में। एक से दाना डालना चक्की के मुख पर। दूसरे से चक्की की मूँठ पकड़कर उ$परी पाठ को घुमाना। दाने के पिसान से उठती सुगंध। चने की दाल हो अथवा गेहूँ, जब पिसता तो एक मादक उष्ण गंध घर के उस इलाक़े को घेर लेती। अन्न से उठती इस सुगंध में मन जैसे झूम उठता। सुगंध का इतना आकर्षक की आटे को मैं ऐसे ही फाँक लेता जैसे प्रसाद या पंजीरी।
    इस सुगँध का मेरे बचपन का दोस्त भुप्पी भी दीवाना था। वह गाँव वालों का दाना पिसाने का काम करता था। इससे उसे कुछ पैसा मिल जाता है। जब वह बिजली वाली चक्की पर जाता तो घंटे-दो-घंटे पिसान के बाद भी खड़ा रहता और तरह-तरह के अन्न-गेहूँ, ज्वाँर, बाजरा, मक्का के पिसते आटे की सुगंध में डूब जाता। वह ताज़ा आटे को बड़े स्वाद के साथ खाता। इस बीच किसी ने कुछ कहा तो जवाब देते समय आटे के कण उसके मुँह से निकलते और वह एकाएक मुँह बन्द कर लेता। आटा फांकते-खाते हुए उसकी आँखों में चमक सी उठती रहती। नथुने आनन्द में फड़कते। और वह एक दूसरा भुप्पी होता सुगंध में डूबा...

(9)
गोबरी रंग के सुख छुई के साथ
बचपन में हम गोबर उठाने जाते। एक लोहे का तसला होता या बांस की सघन टोकरी। गोबर लाने के दो कारण थे। घर के पीछे उपले थोपना और कच्चे घर की धरती को लीपना। शुरू में कुछ दिन गोबर उठाने में जुगुप्सा भाव बना रहा। लेकिन धीरे-धीरे ताजे़ गोबर की गंध मन को भाने लगी। हम माँ के साथ उपले थापते और बाल्टी में गोबर का पानी मिलाके घर के भीतरी कमरों की ज़मीन को लीपते। लीपना एक कला है यह हमने माँ से जाना। गोबर का रंग लिपाई में सब जगह एक सा होना चाहिए। इस तरह गोबर की लिपाई करते हुए, हमने गोबरी रंग के सुख को जाना। आँखों को यह इतना भाया कि एक आत्मीय बिम्ब की तरह बस गया। रंग के अलावा उसकी गँध ने चेतना पर कब्जा कर लिया। लिपाई के बाद जब वह सूखकर अपने रंग और गंध का साम्राज्य फैला देता। घर सचमुच का घर हो उठता और बाहर जाने का मन न होता।
कच्चे घरों में पुताई की एक और गंध का वास होता है। जमीन की लिपाई तो गोबर से होती थी। दीवारों को छुई से पोता जाता था। आज के समय में इसे पुताई वाले चूने का विकल्प कहा जा सकता है। छुई की छोटी-मोटी प्राकृतिक खदानें होती हैं। किन्तु पूरी तरह सफ़ेद छुई की मिट्टी मिलना संयाग से ही होता था। मिट्टी कोमल और चिकनी होे। कंकड़ न हों। इसकी छनाई घर में कठिन होती है। अतः उम्दा मिट्टी की तलाश में हम टेकरियों-पहाड़ियों की शरण में जाते थे। मिट्टी को पहचानने में रज्जो ने हमारी बड़ी मदद की। वह इस मामले में होशियार थी। उसे छुई मिट्टी का स्वाद प्रिय था। वह उसे चुपके-चुपके खाती पाई जाती थी। इसलिए स्वाद का धर्म जान लेने के कारण वह उसे खोज निकालती थी। हम छुई मिट्टी को खोदते, बोरी में भरते और सिर पर उठाये घर लौटकर माँ को अचंभित कर देते।
घर की धरती तो गोबर से चमक उठी। अब दीवारों की बारी। छुई पानी में भिगोई जाती। पोतने के लायक कुछ पतली की जाती। फिर कपड़े के पोतने से स्टूल या कुर्सी पर खड़े होकर पोतने के आनन्द में डूब जाते। नन्हे हाथ एक बड़ी दीवार को पोतकर जीत लेने का स्वप्न देखते। नीचे के हिस्से हमारे हाथ पड़ते। उ$पर माँ के। घर की दीवारें लगभग सफेदी में नहाकर हँसने लगती। आँखों को अपने ही घर का यह मौलिक सौंदर्य भला लगता। एक सुकून। सुन्दरता का। गँध का। शायद इसी तरह हमने घर को सुन्दर बनाते हुए दुनिया के सुन्दर होने की कामना की। हम आज भी इसी प्रार्थना में डूबे हैं।




(10)
नीम से उतरती पाहुनी हवा
पिता का प्रिय पेड़ नीम था। गाँव में एक विशाल नीम के पेड़ तले उनके दोस्तों की जमघट होती थी। खासकर गर्मी के दिनों में ये जमघट नियमित हुआ करती थीं। नीम के पड़े से आलिंगन कर बहती हवा प्राणदायी हुआ करती थी। और खदान में काम करने वाले मजूरों के लिए तो नीम वरदान थी। कहते हैं जितना शुद्ध पर्यावरण अकेला नीम करता है शायद दूसरे पेड़ नहीं। एक और तथ्य कि वैसाख और जेठ की गर्मी की तीव्रता के बीच ही नीम की पत्तियाँ युवा होती हैं। वे गर्मी की तीव्रता को सोखकर ठंडी हवा के झोंके उपहारस्वरूप सौंपती हैं। कहना न होगा कि उन दिनों में न बिजती होती थी, न पंखें। दरवाजे-खिड़कियाँ खुला रखो और नीम से उतरती पाहुनी हवा को घर में बगर जाने दो। हवा समूचे ममत्व के साथ नींद की दुनिया में यात्रा कराने को प्रस्तुत हुआ करती थी। पिताजी के कुछ साथी तो पेड़ के नीचे ही सो जाया करते थे। आज के जमाने में पेड़ के इस दुलार को कौन समझाता है। अब कहाँ फुर्सत और चिन्ता कि कोई नीम आपको पुकारे और आप इसकी छाँह में हो लें। पिता कहा करते थे जो सुख पिता के कँधे पर सवार होने और माँ के आँचल में छुप जाने में मिलता है वही अनुभूति नीम की छाँह में। नीम के पड़े में संगीत का खजाना है। कोयल की कुहुक और चिड़ियों के कंठ से सुबह शाम फूटती रागनियाँ यही पेड़ देता है। चिड़ियाँ यदि अपने सुबह-शाम का ठिकाना इस पेड़ को बनाती हैं। तो इस रहस्य और महत्व को समझना चाहिए। पंछियों की धमनियाँ को ऐसी हवा चाहिए जो उन्हें निरोग रख सके। ऐसा वातावरण कि वे उन्मुक्त चहक सकें। कागा को गाँव में ऐसा समीपी पेड़ कि वह जब बोले तो इसमें पाहुने के आने का संदेश हो। बच्चों के लिए ममत्व का एक ऐसा आसरा हो घर के आस-पास कि काम पर गये माता-पिता की अनुपस्थिति में वे निर्भय होकर खेल सकें। इस पेड़ के पास देने को कई आशीर्वाद हैं। दातून, कोमल पत्तियाँ कई रोगों से लड़ने के लिए छाल, चर्म रोग से मुक्ति के लिए निमोली से निकलने वाला तेल है घाव भरने के लिए, अनाज को सुरक्षित रखने के लिए इसकी पत्तियाँ हैं जो कोठार का अविभाज्य अंग। ऐसे नीम धन्वन्तरी ने हमें कुछ जरूरी आयुर्वेदिक ज्ञान से नवाजा। माँ कहा करती थी कि नीम से दोस्ती जीवन से प्रेम करने के समान है। दमड़ू कक्का नदियों के किनारे के अलावा इसे भी संस्कृति का केन्द्र मानते थे। किस्से-कहानी, गप्पगोई, गाना-बजाना, पंगत आदि इसी पेड़ के नीचे, इसकी अमर अध्यक्षता में संभव होते थे। सावन में झूले भी इसी पेड़ पर पड़ते थे और स्त्रिायों की उन्मुक्त हँसी बस्ती को भर देती थी। अगर कोई आनगाँव की नौकरी पर जाता तो बढ़े-बूढ़े आशीर्वाद देते ‘नीम सा बड़ा हो, नीम का मन पाये।’ क्या हम ‘नीम का मन’ पाने का अर्थ समझ पाये। नीम ने मेरे मन में सौंदर्य का थोड़ा सा उजाला भरा है, मैं उसे हवा के अँधड़ों से बचाए हुए हैं ताकि थोड़ा ही सही उजाले करने में जुगनू सी भूमिका निभा सकूँ।

(11)
सूर्य: बचपन का आनंददायी पाठ
पिता सुबह-सुबह स्नान के बाद सूर्य को प्रणाम करते थे। मैं उनके साथ खड़ा हो जाता। सूर्य को देखता। चाहता कि टकटकी लगाके कुछ समय तक देख सकूँ। लेकिन आँखें पनियाने लगती। सूर्य के बारे में जब मैं पिता से पूछता तो वह कहते, ‘सूर्य समय देवता है, प्रकाश देवता है, प्रकृति के भीतर और बाहर के बदलते रूप, रंग, स्वभाव में सूर्य ही है। उसी के कारण अन्न है, जल है, अग्नि है, परिवर्तन है। एक अकेले सूर्य में सृष्टि को बनाने संवारने के जितने गुण हैं उतने किसी और नक्षत्रा में नहीं। वह धरती का तारणहार है। मैं सोचता बचपन में कि सूर्य न हो तो जैसे सब कुछ रूक जाए। उसके आने पर जागने और जाने पर सोने का जो ज्ञान हुआ, इन्हीं दो आश्चर्य को समझना जैसे सोचने की प्रक्रिया में पहले-पहल प्रवेश करना है।
बचपन में सूर्य की महिमा सुनते हुए मैंने उसे जाना। प्रकाश का महत्व, ताप की गरिमा, उसकी उपस्थिति मात्रा से जीवन चक्र में गति का प्रवेश, संक्राति पर्व पर उसका सांस्कृतिक अर्थ आदि। माँ कहा करती थी बाकी देवी-देवता तो ध्यान में रहते हैं यदि कोई है जो इतना अधिक साकार तो सूर्य है और चन्द्रमा। ये दोनों जो करते हैं सामने है। बाक़ी मन की बातें हैं। अगर इन दोनों के हिसाब से चलो और बड़े-बूढ़ों की बात मानो तो स्वस्थ-प्रसन्न तो रहोगे ही। और यह कम बड़ा वरदान नहीं। जो सूर्य की सुन्दरता समझता है, चन्द्रमा उसके पास अपनी सुन्दरता लिए आ खड़ा होता है।
इन दोनों के किस्से-कहानी, महत्व, भूमिका, अवदान को समझते हुए सूर्य के सौंदर्य को जानना बचपन का आनंददायी पाठ था। मुझे लगता है भीतर अँधेरे से लड़ने की जो ताकत है और उजाले के पक्ष में खड़े रहने की प्रतिबद्धता, वह सूर्य ने दी। मैं उसका आजीवन ऋणी हूँ।

(12)
जल महिमा का गान
मैंनें पार की नदी
कागज की नाव में

बचपन की
इस कला ने
कभी डूबने न दिया
सावन के महीने में पोखर, तालाब, नदी-नाले भर उठते थे। पानी से हमारी पहचान का यह अद्भुत मौसम होता था। हम बरसते पानी में निकल पड़ते। उसे बालों, भौंहों, आँखों, होठों और देह के बाकी अंगों पर अनुभव करते। देह में अव्यक्त रोमांच की लहर दौड़ती। देह की शीतलता का गहरा आभास होता। आज भी नहाते समय पानी के वे पहले संस्मरण याद आते हैं।
पानी की गरिमा के आख्यान हमें बचपन से संस्कारों को देखते-समझते मिले। पेड़-पौधों को पानी देना, सूर्य को जल चढ़ाना, शालिगराम को पूजा के पहले नहलाना, मेहमान के आते ही पानी का लोटा लेकर पहुँचना, वर-वधु के प्रवेश पर सदी द्वारा पानी दरपना, वर-वधु का पानी की परात में अँगूठी खोजते हुए स्पर्श सुख से एक-दूसरे के करीब आना, मिट्टी की मूर्तियाँ गढ़ने के पूर्व मिट्टी को पानी से तैयार करना, कथा-भागवत में पानी से धरती पर छिड़काव कर उसे पवित्रा करना, पूजा के पूर्व पवित्रा होने के लिए पानी का प्रयोग आदि।
जीवन की सुबह पानी के स्पर्श से होती है। हाथ-मुँह धोये या नहाये बिना कोई काम शुरू होता हो, यह देखने में नहीं आता। पानी की इस महिमा को हमारे पूर्वज समझते थे। माँ कहती है देखो यह पानी, हवा और धूप है जो हमारे पास बिन-बुलाये आते हैं हमारे जीवन को संवारने। पानी आसमान से होता हुआ नदी, तालाब, पोखर, झरनों में आता है। वह समूची सृष्टि की भलाई के लिए है। पानी में परोपकार है। वह सबके कल्याण के लिए निस्वार्थ भाव से आता है। हम स्वार्थवश जाते हैं। उसका दोहन करते हैं। पवित्राता को नष्ट करते हैं। और छोड़कर चले जाते हैं। ‘बिन पानी सब सून’ का पद उनकी जुबान पर रहता था क्योंकि दूर-दराज से पानी ढोने का दर्द स्त्राी होने के नाते वह अधिक जानती थी। किसी भी यात्रा में जाती तो नदी का पानी लाने के लिए पीतल का एक ढक्कन वाला पात्रा ले जाना न भूलती जिसे वो ‘गंगाजली’ नाम से पुकारती। उसकी पूजा में जिन लोक देवी-देवता के नाम आते उसमें ‘झिरिया माता’ थी। उसे वह देवी मानती। ‘झिरिया’ अर्थात पानी का एक कुंड उनके गाँव उड़नी पिपरिया में, जो कभी न सूखा। आज भी। अकाल के दिनों में भी उसके सूखने की कोई स्मृति नहीं।
आज हम जलसंवर्धन की बात करते हैं। जल से उतना प्यार नहीं। जितना पूर्वज करते थे और आज बचे खुचे बुजुर्ग। अंदमान-निकोबार द्वीप समूह में वर्षा के संग्रहीत जल से ही गुजारा चलता है। इसलिए खारे पानी के बीच संग्रहीत मीठे जल की महिमा का गान है। वहाँ लोग प्यास का अर्थ जानते हैं। उसकी शिद्दत। वे नारियल पानी और बाँस पानी से कठिन यात्रा में अपनी प्यास बुझाते और जीवन संघर्ष में बने रहते हैं।
बचपन में पानी को लेकर घर में अनेक संवाद स्मरण में हैं। यहाँ तक पानी के झगड़े। कँुए, तालाब पर कब्जा करने के लिए लड़ाइयाँ। आँखों में पानी की कथाएँ रोने, प्रसन्न होने की। देह में सात गुना पानी का सच भी स्कूल में ही पता चला। पेड़-पौधों में पानी की उपस्थिति।
मुझे लगता है संवेदना में जल है। मैं इस जल के भरोसे चल रहा हूँ। मैं चलूँगा कि मैं चाहता हूँ जल बना रहे सृष्टि के कण-कण में...

(13)
संगीत के गुरु-गुरुमाताओं की याद
हमारे इलाके में गोंड जनजाति के लोग अच्छी संख्या में हैं। इन्हें बचपन में हम आश्चर्य से देखा करते थे। बेफ़िक्री और बेलौसपन इनके जीवन में बिखरा हुआ था। गोंड स्त्रिायों के आभूषण अभी भी स्मृति में टंके हैंµचुरिया, पटा बहुँआ, पैरी सतुवा, चुटकी तोड़ा, हमेल, ढार, ढरका, तरकी बारी, टिकुसी आदि। इन आभूषणों की चमक और ध्वनि अब भी कौंध-कौंध जाती है। पुरुष भी आभूषणों में याद आते हैंµचांदी का चूड़ा, कान का बूँदा, गले में मोहर और हाथ में अँगूठी। सजे-धजे गोंडों की निर्मल मुस्कानों में चमकती दंत पंक्तियों का सौंदर्य अब भी पीछा करता है। उनकी हँसी को हम कभी पा न सके। वे हँसते तो उनकी देह के गोदने जैसे नाचते-लगते। उनकी इस मान्यता पर मैं आज भी हैरत में हूँ कि गोदने मृत्यु के बाद आत्मा का शृंगार करते हैं यह अद्भुत कल्पना है जैसे अमर काव्य पंक्ति।
अद्भुत श्रम उनके जीवन का सामान्य गुण है। कभी न थकने वाली चेतना। दिन भर के श्रम के बाद थकान को संगीत में डुबा देने का हुनर और प्रसन्न बने रहने की जुगत कहीं और दिखाई नहीं देती। गोंडों के नृत्य-संगीत को याद करता हूँ तो देेह थिकरनों को आमंत्रित करती है। करमा, सैला, सजनी, भड़ौनी, कहरवा और सुआ नृत्यों की आज भी मधुर स्मृतियाँ हैं उनकी समूची देह ‘राग’ हो उठती थी। सजनी नृत्य की भाव मुद्राओं की अतरंगता और तल्लीनता में युवा जोड़ियों का दुनिया को भूलकर खो जाना जैसे विलक्षण बिम्ब है। दिवाली नृत्य के वाद्यों माँदल, टिमकी, सिंगबाजा, नगाड़ा, मंजीरा, खरताल, ठिसकी, चुटकी, झाँझ, बाँसुरी, अलगोझा, तमूरा, चिकारा और किंदरी के स्वर आज भी मन को घेरे हुए हैं। पाँवों की थिरकन और कंठ से उठते नाद स्वरों की गूंज-अनुगूँज में नृत्य-संगीत से प्रथम साक्षात्कार की अमिट छवियाँ हैं। गुनगुनाते नकल करते हुए धुनों को मन में अबेर लेने की कोशिश ने उनके खजाने से कुछ अब भी बचा रखा है। संगीत के प्रति जितना राग है या कान श्रवण में जितने भी पगे हैं उसके मूल में निश्छल-निष्पाप गोंड़ों के संगीत की छवियाँ हैं और श्रवण बिम्ब। कदाचित इन्होंने मेरे लिखने में बहुत कुछ ऐसा जोड़ा है जो मैं अनुभव तो करता हूँ परन्तु साफ-साफ चीन्ह नहीं पाता। संगीत के उन गुरु-गुरुमाताओं को बस याद करता हूँ। उनके चेहरे स्मृतियों में पूरी तरह साकार नहीं होते। बस वह संगीत है जो गूंजता रहता है।

मालवीय मास्साब, पातालकोट और धरती माँ
भारिया आदिवासी पातालकोट में रहते हैं। उनके छोटे-छोटे से गाँव हैं। स्कूल में 9वीं 11वीं की पढ़ाई के बीच उनसे मिलना हुआ। हमारे एक मालवीय मास्साब थे। वे तामिया में रहने चले गये थे। हम तामिया जाते और वे हमें तामिया घुमाते। पातालकोट के गाँव घुमाने भी ले जाते।
भारिया की यादें अभी भी जैसे ताजा है। छरहरे बदन। नाक चैड़ी किन्तु सुडौल। आँखें बनिस्बत छोटी। स्त्रिायों के अधार पतले। दंत पंक्तियाँ आकर्षक। श्यामवर्ण। गठा हुआ शरीर। देह चुस्त और गतिमय। भारिया पुरुष धोती, कुर्ता, बंडी व पगड़ी पहनते हैं। स्त्रिायाँ लाल रंग की सेंदरी साड़ी और पोलका धारण करता हैं। गोदने से शरीर के अंगों का विन्यास करते हैं।
भड़म, सैतम और करम-सैला उनके प्रिय नृत्य हैं। ढोल, टिमकी, झाँझ, ढोलक व बाँसुरी प्रमुख वाद्य। विशेष यह कि स्त्रिायाँ मंजीरा और चिटकुला बजाते हुए मदमस्त हो सबकुछ भूलकर नाचती गातीं। मालवीय मास्साब के सहयोग बिना उन तक पहुँचना और घुल-मिल जाना कितना कठिन था अब समझ में आता है। विद्यार्थी जीवन में घूमने सीखने की ललक होती है यह मास्साब जानते थे। उन्होंने भारियाओं के घर दिखाये। उनके देवता भीमसेन के बारे में बताया। भारिया बाघ की पूजा भी करते हैं। मास्साब ने दरवाजों पर उकेरे चित्रों से परिचय कराया। बाँस और छिंद के पत्तों से बने सूपे, टोकरियाँ और अन्य कलात्मक वस्तुएँ दिखाई। पेड़ों के छाल से बनी रस्सी देखकर हम अचंभित हुए। छूकर देखा तो मजबूती का पता चला।
सबसे अधिक जिज्ञासा उनके खाद्य पदार्थों की जानकारी पाकर जागी। हमने उन भाजियों के नाम ही नहीं सुने थे देखना तो दूर। छबई, भाड़का, मौसिया और छितावर की भाजी। मैनहर व कातुल की सब्जियाँ। कंद-मूल में नंदमाती, सेतकंद, बरहाकंद, कडुकंद, गोहलारी, ठेंगी, खटवी, भैरों, सुआरूख, बनसिंघाड़ा, महुल, मछारिया आदि। हमें वहाँ उनका एक पकवान खाने को मिला ‘ठेठरा’। आटे में महुआ मिलाकर इसे बनाया जाता है। खूब स्वादिष्ट लेकिन सख्त। महुआ और आम की बीजी की रोटी भी इनका भोजन का हिस्सा है, जो बरसात में इनका आसरा है। मछलियों का शिकार पानी उलीचकर करते हैं व पशु-पक्षियों के आखेट के लिए फंदे बनाते हैं। वनोपज में महुआ, चिंरौजी, गोंद, हर्रा, आँवला, गुल्ली, लाख आदि इनका आर्थिक आधार है जिसे हफ्ते की हाट में बेचकर जरूरती चीजें खरीद लेते हैं।
मालवीय मास्साब ने हमें ऐसे समाज के दर्शन कराये और व्यवहारिक रूप से जीवन का हिस्सा बनाया कि वह किसी स्कूली पढ़ाई से अधिक सार्थक रहा। आज स्मृतियों में जो बचा है वह देखने-सुनने और उनके बीच रहने का नतीजा है। कुछ स्वाद, कुछ सुंगधें, कुछ ध्वनियाँ, कुछ धुनें, संगीत के कुछ विरले वाद्य स्वर स्मृतियों में अब भी छूटे हैं और आदिवासी जीवन के कुछ सघन दृश्य जिसमें वनस्पतियाँ है और पेड़-पौधे। हवा के तीखे अहसास धूप की गर्म स्मृति। कितना कुछ है यादों में आवाजाही करता।
लेकिन एक स्मृति ऐसी भी कि जिसे भूलना नामुमकिन। भारियाओं की डहिया खेती। पाताल कोट की भूमि समतल नहीं है। पहाड़ पर सीढ़ीनुमा या नालीहार खेती होती है। इसमें खुरपी का उपयोग होता है। हल नहीं चलाया जाता। भारिया मानते हैं धरती माँ है। हल चलाकर उसका हृदय चीरना पाप है। बुजुर्ग आज भी हल लाने-बनाने को पाप समझते हैं। हालांकि बदलते वक्त ने परम्पराओं को बदला है लेकिन स्मृति व विश्वास में धरती आज भी माँ है।

‘एक बहुत कोमल तान’ (कविता संग्रह)

समीक्षा µ महेश कटारे
‘एक बहुत कोमल तान’ (कविता संग्रह)
कविµलीलाधर मंडलोई
प्रकाशकµअंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद


आवरण पृष्ठ से आरंभ करना जरूरी लग रहा है जो अपने रंग व दृश्य संयोजन में ही अलग तरह का लगा। पिघलती सी ऊँचाइयाँ...ऊँघती हरियाली के निर्जन में किसी की प्रतीक्षा करता अकेला घर और उसके पीछे बहती नील श्वेताभ जलराशि। भीतर पलटकर पाया कि मुखावरण पर वाॅन गाॅग की परिकल्पना है। अब एक अलग किस्म की कठिनाई दरपेश हुई कि आवरण चित्रा के संदर्भ में भीतर की कविताओं को किस तरह बांचू, जहां दृृश्य में विपुल प्रकृति है जिसके बीच एक घर मनुष्य की उपस्थिति का अहसास भी दिलाता है तथा अस्तव्यस्त उदास प्रकृति के माध्यम से यह आशंका भी पैदा करता है कि घर कहीं सूना न रह जाए। यह आशंका इसलिए भी दहशत में डालती है कि लीलाधर मंडलोई की कविताएं जीवन की तरह पढ़े जाने की कोटि में मानी जाने लगी हैं। यह भी कि मण्डलोई की कविताओं में जीवन प्रकृति से जुड़े बिना अन्य मन एक होने लगता है। आशंका को बल इसलिए भी मिलता है कि इस चरम आधुनिक तकनीकी समय में प्रकृति अब मात्रा चित्रा-स्मृति तक सीमित होने की ओर बढ़ रही है। विकास के लिए अधिकाधिक प्राकृतिक दोहन की लाभवादी अवधारणा ने मनुष्य के लालच को मान्यता प्रदान कर असीमित, आक्रामक दोहन के द्वार खोल दिए। पौर्वात्य दर्शन में मनुष्य के उध्र्वरेतस विकास की अवधारणा है जिसके तहत वह प्रकृति के। सामने याचक बनकर खड़ा हो अपनायापन, सुख व समृद्धि मांगता है और आवश्यकता भर ही लेता है। साम्राज्यवादी सोच ने मनुष्य को स्वामी होने का पाठ सिखाया जिसमें वह प्रकृति से सहचर या याचक भांति मांगता नहीं वरन् छीनता है। वहां के साहित्य में ऐसे साहसी लुटेरों को ‘हीरो’ का दर्ज़ा दिया जाता रहा है। पर प्रकृति के सहने की भी एक सीमा है। मनुष्य का अवांछित, अनियंत्रित प्रकृति-दोहन स्वयं मनुष्य के लिए ही भस्मासुर की भूमिका निभाने को तत्पर हैµ
कहां से आती है इतनी
कार्बन मोनोक्साइड
कि बर्फ पिघलती है
समय से पहले
        धंसकते हैं पहाड़ धीरे-धीरे
        धीरे-धीरे खत्म होता है जीवन।            (कार्बन मोनोक्साइड)
यूं ही नहीं कि इन कविताओं में पहाड़, नदी, झरने, बादल, पक्षी, वनस्पति, पेड़, वर्षा, गर्मी सर्दी तथा बीमार सा बसंत लौट-लौट कर आता है। शहरों, महानगरों की बड़ी, व्यस्त, संपन्न व शायद सुखी भी एक ऐसी दुनिया है जिसे बदलती ऋतुओं, मौसमों का पता मीडिया के जरिये लगता है और इसमें कह उठते हैंµअच्छा! एक दिन हमें मौसम भी मनाना चाहिए। वह संख्या भी करोड़ों से ऊपर जा पहुंची है जो नहीं जानती कि जिस आटे की वह ब्रेड, रोटी सेण्डविच खाते हैं उस गेहूं का पौधा कैसा होता है। देश के भाग्य के निर्णायक वर्ग से आने वाली अगली पीढ़ी दूध के लिए डेअरियों को पहचानती है...गाय भैंस बकरी को नहीं। ‘जिसने पहचान लिया,’ तितलियां जैसी कविताएं हमें स्मृति-लोप की उसी बुनावट के निकट ले पहुंचती हैं। हम प्रकृति, वनस्पतियों के प्रति निरंतर संवेदन शून्य होते जा रहे हैंµ
बगीचे की शोभा और बात
अपनी बाड़ में इसका प्राकृतिक ढंग से फैलना
आपको मंजूर नहीं
        आपका माली आपका हर हुक़्म बजा लाता है
        लो उसने बाहर झांकती डालियों की काट-छांट शुरू कर दी
        टहनियों से बह रहा हैµदूधिया रक्त।           (कनेर और आप)
आज के आदमी ने तो अपनी संतान को भी अपनी इच्छानुसार ढालना शुरू कर दिया है और खुश हो रहे हैं। वन समाप्त होते हैं, उससे पहले वन्य जीवµ
अब किन वनों में होंगे वे
या कि उन्हें उठा लिया
चिड़ियाघरों,
मदारियों ने
कहीं मार तो नहीं दिया
शिकारियों ने।
इन पंक्तियों में कोई त्रास कौंधता है कि हमारी जाॅब-आंकाक्षी संतानें चिड़ियाघरों, मदारियों के हत्थे पड़ती जा रही है, ये शिकारी उनका मनुष्यत्व मारकर मशीन में बदलते हैं। वे विजयी अभिमान अपनी दर्दमनीय लिप्सा में प्रकृति पर वार करने में जुटे है। क्षत-विक्षत धरती की सूखती नदियां, गुम होते प्रपात, मिटते पहाड़, गड़बड़ाता ऋतु-चक्र मनुष्य के इसी लोभी-प्रहार का परिणाम है। अब समझ और संभल जाना चाहिए कि आहत प्रकृति अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करने लगी है। ग्लोबल वार्मिग, सुनामी, नये-नये रोग, महामारियां, जीवन के मूल आधार वायु, जल का प्रदूषण और कमी। प्रकृति पलटवार को सन्नद्ध दिखने लगी है। उसकी मात्रा एक छोटी सी करवट आदमी की अहंसिक्त श्रेष्ठता को अतल में डुबाकर इस जीव की जाति के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। (क्या पता फिर कोई एलियन जाति विलुप्त होती मानव जाति के संरक्षण का उपाय करे।) प्रकृति के इस प्रतिवार को पुश्किन ने ‘उदासीन प्रकृति की शाश्वत दीप्ति’ कहा है। टाॅमस माल्थस ने ‘अवांछित का अस्वीकार’ बताया है। महानगरों में दिनोदिन आकाश की और ऊंचे उठते गगनचुंबी भवनों के चलते यह निहायत सामान्य अनुभव हुआ है कि जो लोग पेड़ों से ऊंचे मकानों में रहते हैं उनकी संवेदनशीलता कम हो जाती है।
इन कविताओं में मां हैµप्रकृति के साथ घुलीमिली, उसका हिस्सा, उसका एक रूप। दोनों इस तरह जुड़ी है कि कवि के लिए इन्हें अलग-अलग कर देखना संभव नहीं लगताµ
मां हमें अक्सर बताती
कि पेड़-पौधों से प्रेम करो
उनमें मनुष्य सरीखा जीवन है। (छुईमुई)
बहुत सीधी बात है कि मात्रा मनुष्य से ही जीवन नहीं चल सकता। कवि की ‘मां’ बंगले के लाॅन में बैठ सुखद स्मृतियां चुभलाती विज्ञापनी मां नहीं है। संग्रह में एक छोटी सी कविता हैµ ‘त्यौहार का दिन’µ
‘आज त्यौहार का दिन है
आज मां घबराई हुई है’
इन पंक्तियों के साथ ही एकाएक ‘ईदगाह’ कहानी की दादी अमीना और बालक हामिद का स्मरण हो आता है। दादी जिसमें अभावों के बीच जीने की आदत और जूझने का संकल्प है तथा हामिद जिसमें अभावों के होते हुए भी आशा का प्रकाश है। इसलिए इन कविताओं में मां के दूध से उतरते जीवन का प्रकाश दिखाई देता है। इस प्रकाश वृृत्त में सुख-दुख के साथी दोस्त हैं, रचनाकार कलाकार हैं तथा विडंबना आत्मानुभव भीµ
‘यह क्या हो गया है मुझे
कि हर वक़्त इतना सावधान
बोलने में
लिखने में
खड़े होने और बैठने तक में
        इतना डर कैसे चला आया’  (सावधान)

मैं सूत हूं
इस तरह नीच कुल का
....
मैं कारीगर
मैं रथकार
मैं कवि
...
...
अपमान और हत्या को स्मरण करता
मैं सिर्फ चुप हूं
मेरा चुप होना हार जाना नहीं है। (सूत)
कविता का मोर्चा यहां तीन जगह खुला हैµएक प्रकृति को बचाने अर्थात्् प्रकारांतर से पूरी सभ्यता को बचाने का। दूसरा सांस्कृतिक दायित्व का मोर्चा जहां किसी भी रचनाकार को लड़ना ही पड़ता है। तीसरा ‘स्व’ अस्तित्व व सम्मान का। इस प्रकार ‘एक बहुत कोमल तान’ की कविताएं व्यक्तिगत अनुभव से सामाजिक अनुभव तक सेतु बनती कविताएं हैµअर्थ संकेत में विस्तार और व्यापकता सहेजती हुई। यहां कवि ने सहज सौन्दर्य के अमीप्सित प्रतिमान भी गढ़े हैं। वृक्ष व मां के सायुज्य की कविता हैµअरंडी। मुझे नहीं लगता कि भद्र नागरी सौन्दर्य बोध में अरंडी को कहीं जगह मिली हो। सुन्दर तो इस वृक्ष को ग्राम-जीवन में भी नहीं माना गया पर स्थान बहुत निकट का मिला है क्योंकि यह बहु उपयोगी है। अरंडी के बीज का तेल स्वयं औषधि होने के साथ अनेक औषधियों से मिल उत्प्रेरक का काम करता है। चोट लगने अथवा सूजन पर इसी के पत्ते पर इसी का तेल चुपड़ गुनगुना बांधा जाता है पुल्टिश चढ़ाई जाती है। पीलिया की अक्सीर दवा है अरंडी। तेल से धूमरहित प्रकाश किया जाता है। लकड़ी या तने से छप्पर छाये जाते हैं। कविता रेखांकित करती है कि सौन्दर्य आकर्षक रूप रंग में नहीं उस गुण में निहित है जो अधिकाधिक लोगों के काम आ सके हैं।
µमां कहती कि वह मनुष्य सेवा में निमग्न
एक दुर्लभ उदाहरण है दुनिया में
वह अब याद करती थी उसे
बिछड़े भाई की तरह
और ढूंढती फिरती थी हर उस शहर में
जहां-जहां मेरा तबादला हुआ।  (अरंडी)
आत्मासक्ति से मुक्त सौन्दर्य लोक (मंगल) से जुड़ता है। लोक ने शास्त्राीय सौन्दर्य को सराहा अवश्य है पर अपनाने के लिए जीवन-सापेक्ष सौन्दर्य प्रतिमान गढ़े हैं। अतः यहां कला उल्लास, अवसाद, अनुताय औदार्य की सहज अभिव्यक्ति बनकर दूब की तरह उमगती हैµरोपे जाने पर दूब में ओप नहीं आता।
संग्रह की कुछ छोटी छोटी कविताएं इतनी बेधक हैं कि मण्टो की कहानियों की तरह मष्तिक में किसी कील सी गड़ जाती हैंµ
मैंने देखा
वो कत्ल
मैं गूंगा
मैं सर झुकाए चलता हूं (गूंगा)
बस इतनी सी है यह कविता जो आज के समय की पोच मानसिकता को उघाड़कर रख देती है। क्या यह पूरी कविता, बड़ी या उससे भी कुछ अधिक नहीं है? एक अन्य कविता हैµ‘और रात में’ जिसमें एक अकेली विधवा स्त्राी रातभर स्वयं को अपने दुख की आंच में तपाकर दुनियावी संघर्ष के लिए खुद को तैयार करती हैµ
घर के पिछवाड़े एक झोपड़ी
वहां एक परछाईं है
जो रात गए रोती है
        वह तो एक बेवा की झोपड़ी
        जो तेज-तर्रार बहुत
        इतनी कि उसकी मर्दानगी के किस्से बहुत। (और रात में)
संग्रह में कुछ लंबी कविताएं भी हैµइस तरह पहली बार, चिट्ठियां, स्वाद के अनंतिम शिखर पर, वह एक कलंदर (वेणुगोपाल के लिए) स्मृतियां माला के धागे की तरह संग्रह में ओर से छोर पैठी हैं जो कवि को प्रायः लोक की ओर ले जाती हैं जहां वह ‘कविता के लिए कच्चा माल’ अबेरता है। क्या इसलिए कि अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा खजाना हर लोकभाषा में मौजूद होता है। लोकभाषा कभी मरती नहीं। अपने आप में संशोधन करती रहती है इसलिए बड़े रचनाकारों में हमें लोक मुहावरे की समृद्धि मिलती है।
किसी कवि की कविता को हम उसके जीवन, परिवेश, विरासत, अतीत तथा समकालीन स्थितियों की समग्रता में एक अंश की तरह परखते हैं। वह अंश नहीं जिसे विरासत ने बांधकर निष्क्रिय बना दिया हो। (रचनाकार मृत संसार का उत्तराधिकारी नहीं है) कोई जिम्मेदारी कवि स्मृति व अतीत का उपयोग न सिर्फ अतीत ही बदलने बल्कि वर्तमान को भी बदलने के लिए करता है। ‘एक बहुत कोमल तान’ की कविताओं का मर्म जीवन के साथ तौल, कसकर ही परखा जा सकता है। कवि ने कटु संघर्षों के दौरान स्वयं को नये सांचे में ढालते हुए कविता को पाथेय की तरह चुना है जिसमें पारिवारिक प्रेम से आलोकित कविताएं भी अपनी गहरी सादगी के साथ उपस्थित हैंµवेदना बीच इच्छा शक्ति की भांति। भारतीय श्रमिक के जीवन से नाभि नाल बद्ध ये कविताएं प्रतिभा को व्यर्थ-संघर्ष की वेदी पर चढ़ाने वाले इस समय में ‘एक बहुत कोमल तान’ बचाने का संकल्प लेती हुई यह संकेत भी देती हैं कि निरंकुशता कितनी ही क्रूर, आक्रामक क्यों न हो उससे लड़ने के साधनों व इच्छाओं का अभाव नहीं है।
प्रसंगवश यह ज़िक्र जरूरी है कि लीलाधर मंडलोई के दो और संग्रह हैं ‘लिखे में दुक्ख’ और ‘महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने’। ये क्रमशः राधाकृष्ण और मेधा बुक्स से प्रकाशित हैं। दोनों संग्रह इस अर्थ में विशिष्ट हैं कि भाषा फाॅर्म और कहने के स्तर पर कविताएँ निजता मौलिकता के धरातल पर जोखिम उठाती हैं। ‘लिखे में दुक्ख’ मैं दो से चैदह पंक्तियों वाली कविताएँ लघु सघन स्वरूप में हैं और सूक्ति की काया में। ये कविताएँ भाषा को इधर के समकालीन सायास भार से मुक्त करती हैं। अत्यंत संप्रेषणीय। स्मृति में रह जाने वाली। ‘क्वोटोबेल क्वोक्टस’ की भांति पारदर्शी और सरल हैं। इनमें दार्शनिक वाक्यों का प्रकाश है। सिर्फ एक उदाहरणµ
मेरे लिखे में
अगर दुक्ख है
और सबका नहीं
मेरे लिखे को आग लगे (पृष्ठ 92)

‘महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने’ का ब्लर्ब महाश्वेता देवी का लिखा है। उनकी पंक्तियाँ हैंµ‘सुभाष मुखोपाध्याय से लेकर वीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती का मानना है कि महान कविता वह है जो हमारे सुख का समर्थन करे, संग्राम को साहस दे और शोक में सांत्वना दे। इस कसौटी पर मंडलोई की अनेक कविताएँ खरी उतरती हैं। कदाचित इसीलिए हिंदी कविता की समृद्ध परंपरा के वे ऐसे हिस्सेदार हैं जिनके बगैर समकालीन हिंदी कविता की मुकम्मल तस्वीर नहीं बन सकती। समकालीन हिंदी कविता का अद्यतन रूप और चरित्रा बनाने वालों में मंडलोई भी हैं।’
महाश्वेता देवी के विचारों के आलोक में बतौर उदाहरण एक काव्यांशµ
निर्वासन के बावजूद
हम आत्मनिर्वासित नहीं
पृथ्वी को अपना घर समझने वाले
असंख्य लोग हैं और बेआवाज नहीं
इनमें बोलता है मुल्क
और मुल्क को हराना
इतना आसान नहीं
कुल मिलकार यह कहना समीचीन होगा कि लीलाधर मंडलोई समकालीन कविता में एक ऐसा नाम है जिनका लिखा परम्परा की शक्ति, आधुनिकता की समझ और नवसाम्राज्यवाद के खतरों से रूबरू होता हुआ, सृष्टि को अपनी निजी भाषा और मुहावरे में मूर्त करता है। यह रास्ता संघर्ष और जोखिम का है और मंडलोई उसी पर चलते हैं, जो इधर विरल होता जा रहा है।

जिस तरह घुलती है काया

(1)

उन दो कासनी पत्तियों के बीच
उगता एक गुलाब है
अपनी पंखुड़ियों में बंद
बहुत कोमल
कि जिसपे होंठ मेरे

मैं अपने होठों को
कहाँ रखूँ
किसे चूमूँ
गुलाब बेइंतहा खूबसूरत है
मैं खोलता हूँ पत्तियाँ जो सांवली घनेरी

इनके भीतर उतरकर देखता हूँ
रोशन जहाँ इक
वहाँ मेरे होठ पहले से धरे

मैं घबराया इस असमंजस में
मैं अपनी देह से खोये
वो होठ ढूँढता हूँ, हारता हूँ

(2)

जिस तरह घुलती है काया
घुल न सकी

रूह में कुछ और था
एक हो न सके

(3)

तुम जिस्म में डूबी
मैं रूह में अपनी

ये जिस्म
रूह के पानी में अवाक डूब गया

(4)

मेरी निगाह से देखो
नज़र है ये तुम्हारी

मैं कोई और नहीं
कि दिखाई न दूँ

(5)

खिल उठे
देह पर दो सांवले गुलाब
इनका आस्वाद अनोखा इतना
कि सारे अल्फाज़ सिफर

मैं हार गया लिखते हुए
अब लिखना क्या?

(6)

समंदर समो लेता है
नदी को अपने भीतर

तुम नदी होते-होते खो गई
मैं इंतजार करते हुए

(7)

कभी हाज़िर हो हम
कभी गै़रहाज़िर

बस इसी तरह
ये उम्र फ़ना होती रही

(8)

मेरी रूह में
तुम
तुम्हारी परछाईं
और उसकी रोशनी

इतनी पाक
कि ख़ुदा की नेमत

मैं तुझमें डूब गया
ख़ुदा मुझे अब माफ़ करे!

(9)

केबड़े की गंध लाफ़ानी
उठती है बदन से

इसमें तुम्हारा नहीं
धरती का होना है सुखद

तुम धरती हुईं
फिर गंध धरती की
कि केवड़े सी मादक अब

तुम्हें मालूम कब
मैं इसमें डूबा हुआ

मेरे इस डूबने में
उस पार जाने की इबारत है

मैं इक नाव में हूँ
जो हवा में तैरती है

झुका लेता था उठा सिर

इतना पत्थर दिल ज़माना होगा
        मुझे मालुम न था
दस-बारस बरस का मैं
        मांजने का काम करता था
धुले हुए बर्तन लगाके झूठ सकरन
        पटक दिए जाते थे फिर-फिर
        या फिर कम चमक का बहाना
उन दिनों राख थी बस जिसे महीन छाने बिना
        रेखाएँ उछर आती थीं उन पर
        और फिर काम करना मुहाल
बावजूद इन तमाम हालातों के
        न होता था कोई चारा
        कि इतना सख़्तजान होना था
        कि सी लेना था ज़ुबान जबरन
        सुनते हुए झिड़कियाँ, गाली-गलौच
        और तमाचे नन्हें गालों पर
फ़िक्र में माँ-पिता थे जिन तक
        शिकायत हो जाने का डर
        कि जो आला इंसान थे
        मुसीबत में
        जो ख़ाक से उठकर बने थे
सो यह सोचता कि गुस्सा बर्फ़ हो
        झुका लेता था उठा सिर
        और साफ़ बर्तन को
        दुबारा
        मांजने चमकाने लगता था

चरवाहा मन

खो गयी एक धुन
    बचपन की
सारा मधुर धुन
बंधा था जिसमें मेरा मन
    कहूँ चरवाहा मन

गया वो श्याम रंग
कि जिसमें लाज की पोशाक तज
    कोयला तोड़ता था
हारों-पहारों से बना अटल विश्वास
    अब कांपता है
जबकि उन दिनों कुछ न था घर में
    यहाँ तक दो जून की रोटी
और यही मन धेनु-शिशु सा
    जंगल नाप जाता था
था इतना पक्का कि अंतड़ियाँ सूखने पर
रगों में दौड़ता था ख़ून
    बसैती हवा सा
कितने अपमान
कितनी जिल्लतें थीं रोज़
तिस पर भिड़ जाता था उन सबसे
जिनकी तिजोरियों में
    बंद थी घर की ख़ुशी
पिता की मूँछे
माँ का गर्वीला मस्तक
बहन का सुहाग

और भाई का मँहगा इलाज़ कि वो पागल था
इधर अब नौकरी ऐसी कि हूँ सरकारी नौकर
बँधा इक इस सहारे से
और इतनी जिम्मेदारियाँ
    हलकान-परेशान मैं
    उठता हूँ लड़ने को
    तो बस पाँव हो जाता
छोड़कर सबको बेभरोसे लौटना कितना कठिन
अँधेरा है घना और सभी रास्ते ग़ायब
    दुश्मनों के अट्टहास में डूबी रात
वही चरवाहा मन
वही सादा मधुर धुन
जो आती है लोट ऐसे में
उससे इस रात को दिन किये
    जीता हूँ फिर
इतना बेढब, इतना बेउम्मीद और तवील है यह
    लिए खुद्दारी और
    बचाए रीढ़ अपनी
    चलता हूँ जो इस रास्ते पे
    तो वह बोल उठता है
    कि ना उम्मीद न हो...
    रूह की पाकीज़गी में रह
    रूह की गर्मी है जवाब हर मुसीबत का

मैं हर बरस लौटता हूँ


(1)

बिन चाहते
हम खड़े हैं
किनारों पर
बीच में नदी बह रही है

(2)

पहनी हुई वर्दी
उतारकर
कहा उसने
आज मैं छुट्टी लूँगा

आज मैं गोली नहीं चलाऊँगा

(3)

मैं हर बरस लौटता हूँ
धरती के इस टुकड़े पर
जहाँ ईंट के भट्टे लगे हैं

पहलेे यहाँ मेरा खेत था

(4)

तुम समोसे खाते हो गपागप

समोसे खाना
सिर्फ सुधीर जानता हे

उसे आती है भूख को
जीतने की कला

(5)

खाने का स्वाद
संजीव कपूर से पूछो

भूख का स्वाद
जानता था जो

अभी-अभी मरा है

(6)

मैं हिन्दी का लेखक हूँ

मेरे बच्चे अंग्रेजी पढ़ते हैं

(7)

ईश्वर क्या है
एक दुकान

कितने धर्मों से
अपना सफल व्यवसाय करता है
ईश्वर का धन्धा कभी घाटे में नहीं चलता

(8)

मैं सब्बल हूँ
मैं गैंती
फावड़ा मैं
मैं बेलचा हूँ
मैं क्रांति का हथियार हूँ

(9)

इंटक यूनियन

दलाल है?
खदाने घाटों से पट गई हैं

(10)

हड़ताल पर पाबंदी है
हड़ताल विकास के विरुद्ध है

हम जेल जाने को तैयार हैं

(11)

मैं आदिवासी खदान से निकली
मैं काली हूँ

सुंदरता की पहचान में
ईश्वर चूक गया

(12)

मेरा मूल्य है
मुझे लाया गया
मैंने नारे लगाये

नारे झूठे थे

झूठ की क़ीमत से
मैंने आज रोटी खायी

(13)

मैं चोर हूँ
हत्यारा हूँ
मैं बलात्कार में प्रवीण हूँ

मैं टिकिट प्रार्थी हूँ

(14)

युद्ध जीतने से
ख़त्म नहीं होगी
यह जाति की लड़ाई है

(15)

जहाँ-जहाँ
दुनिया में बसे हैं वे
एक सुर हैं
ब्राह्मण एक हैं दुनिया में

(16)

मैं गाँव से आया था
सब कुछ लुट जाने के बाद

उन्होंने मुझे नौकरी दी
नौकरी के पैसों में
दो जून की रोटी थी और एक सपना

मैं कभी गाँव न लौट सका

(17)

मैं स्त्राी हूँ
सौंदर्य का
अंतिम प्रतिमान

मैं प्रकृति
मैं ईश्वर की माया नहीं

(18)

मैंने गुफाओं की देह पर
रचे जो चित्रा
अब तक अमर हैं

तुम्हारे चित्रों के लिए
ईश्वर तुम्हें क्षमा करे

(19)

तुम्हारी उस बही पर
लिखा है जो
सब जानते हैं

कहाँ है तुम्हारी आत्मा की बही

यह जानने में हर बार भूल हुई
हर बार बिका एक और खेत

(20)

तरह-तरह की छेनियाँ
एक हथौड़ी
और एक जोड़ी कुशल हाथ

एक नयी दुनिया
कभी भी बनाई जा सकती है
(21)

नटिनी के पाँवों में चमत्कार है
लोग उसका
चलना नहीं

फिसलना देखना चाहते हैं

(22)

शांति के लिए,
तुम लाये कबूतर
और 21 तोपों की सलामी

कबूतर नहीं बचे
शांति के लिए कई 21 तोपे हैं

(23)

सब कुछ मिलता है
इस बाज़ार में

पानीदार मनुष्य नहीं मिलता

(24)

साड़ियों पर ढाले ये रंग
हमने वसंत से लिये

रंगों में उतरने का हुनर तुम क्या जानो

(25)

एक तरफ़ ख़जाना था
एक तरफ़ लोग

लोगों के हाथों में दरातियाँ थीं

(26)

कफ्र्यू में जब
बाहर निकलने पर
गोली मारने का हुक़्म था

एक पागल सड़क पर दौड़ रहा था
गालियाँ दे रहा था खुले-आम

(27)

बहस के लिए
एक-दूसरे में प्रतियोगिता
और यह संसद नहीं

यहाँ बकवास नहीं हो रही थी

(28)

बीर बहूटी से रक्तिम अधर

नहीं-नहीं
ये तुम्हारी लिपस्टिक से उतरा रंग नहीं

(29)

तुम्हें चाहिए
डाॅक्टर द्वारा प्रमाणित
टूथपेस्ट

मैं पुरखों द्वारा रजिस्टर्ड
दातून करता हूँ

(30)

मैं वो स्त्राी हूँ
जिसके भाग्य में
ससुराल नहीं

मैंने कोख में नाचना शुरू कर दिया था

(31)

उसका जल
दूसरे समुद्रों की तरह है

उसे ‘काला पानी’
गोरों ने बनाया।

(32)

मैं कौन हूँ
पूछा एक स्त्राी ने

कहा उसने
हँसी-ठिठोली का सामान

(33)

वह ताउम्र का
अँधकार है

वह भोर की कविता लिखती है

(34)

हमें भूख लगी थी
और प्यास

‘महुआ’ का पेड़
टप-टप करता हुआ

दौड़ कर आया हमारे पास

(35)

मैं खूँटे से बँधी
अधज कड़ी
परछाईं हूँ

मैंने गिरमा काटना1 शुरू कर दिया
1. पशुओं के गले में बाँधी जाने वाली रस्सी

(36)

स्वीकार किया मैंने
जिस दिन उसे पति

मेरी गुलामी की कथा आरम्भ हुई

(37)

यह सुरक्षा की बेड़ियाँ हैं
मैंने इन्हें पिघलाना शुरू कर दिया

(38)

मैं बटखरा हूँ
यह बाज़ार
मेरे बिना चल नहीं सकता

(39)

तुमने क्या देखे
‘आँसू’

मैंने किसान की आँखों में
बादल देखे

(40)

रूप की हाॅट में
गाये जाते हैं जो गीत

उनमें चिड़ियों के कराहने की
आवाज़ सुनाई देती है

(41)

चोरों का कोई ईमान नहीं होता
कहनात है पुरानी

हिस्से-बँटवारे में
उनका ईमान अटल है

इस पर किसी को संदेह नहीं

(42)

जानवर धोखे से मारने की
कला नहीं जानता
उसके चलाक़ी भरे आक्रमण को
जानते हैं जंगल के जीव
मनुष्य के बारे में
यह क़िस्सा आम है
कि वह हमेशा धोखे से वार करता है

(43)

हम डरते हैं जिस समंदर से
मछलियाँ
उसी से इश्क़ करती हैं

मछलियाँ
कितनी छोटी सामने उसके
यहाँ तक विशालकाय व्हेल

इश्क की कोई सीमा नहीं

(44)

खिले हुए फूलों में
पत्तों में
डूबने वालें

देखो, यह जो पत्ता झरा हैं
अभी-अभी
वसंत की आमदा के लिए
त्याग का अनुपम उदाहरण है

(45)

कुछ यादें
जीवन काल में अमर बनी रहती हैं

पिता के गुजर जाने की
धुँधली याद
अमर है

(46)

ईंट, गिट्टी ढोते हुए
बेडौल हो गया है यह तसला

कितने दिनों से
बजाना इसे बंद हुआ
एक उम्र से जैसे
माना मैंने बंद किया

(47)

दीवार नहीं चाहती
अपनी देह पर
कोई विज्ञापन
कोई झूठा पोस्टर

सूनी दीवार की आवाज़ से
ज्यादा असरदार कुछ नहीं

(48)

बाज़ार से ख़रीदी गयी उ$न से
बने स्वेटर के
एक-एक फंदे से
उभरती ख़ूबसूरती में
अनुभव है उँगलियों का

इसकी तुलना करना
अपमान है प्रेम का

(49)

चुप्पी का अर्थ
कायरता नहीं

वह स्त्राी कभी भी बोल कर
हतप्रभ कर सकती है

(50)

मेरी हँसी का रंग
स्याह है

कभी देखा आपने?

(51)

बाज़ार एक जाल है
हम उनकी मकड़ी नहीं
हम मुक्ति के गायक हैं
बाज़ार हमसे डरता है