(1)
उन दो कासनी पत्तियों के बीच
उगता एक गुलाब है
अपनी पंखुड़ियों में बंद
बहुत कोमल
कि जिसपे होंठ मेरे
मैं अपने होठों को
कहाँ रखूँ
किसे चूमूँ
गुलाब बेइंतहा खूबसूरत है
मैं खोलता हूँ पत्तियाँ जो सांवली घनेरी
इनके भीतर उतरकर देखता हूँ
रोशन जहाँ इक
वहाँ मेरे होठ पहले से धरे
मैं घबराया इस असमंजस में
मैं अपनी देह से खोये
वो होठ ढूँढता हूँ, हारता हूँ
(2)
जिस तरह घुलती है काया
घुल न सकी
रूह में कुछ और था
एक हो न सके
(3)
तुम जिस्म में डूबी
मैं रूह में अपनी
ये जिस्म
रूह के पानी में अवाक डूब गया
(4)
मेरी निगाह से देखो
नज़र है ये तुम्हारी
मैं कोई और नहीं
कि दिखाई न दूँ
(5)
खिल उठे
देह पर दो सांवले गुलाब
इनका आस्वाद अनोखा इतना
कि सारे अल्फाज़ सिफर
मैं हार गया लिखते हुए
अब लिखना क्या?
(6)
समंदर समो लेता है
नदी को अपने भीतर
तुम नदी होते-होते खो गई
मैं इंतजार करते हुए
(7)
कभी हाज़िर हो हम
कभी गै़रहाज़िर
बस इसी तरह
ये उम्र फ़ना होती रही
(8)
मेरी रूह में
तुम
तुम्हारी परछाईं
और उसकी रोशनी
इतनी पाक
कि ख़ुदा की नेमत
मैं तुझमें डूब गया
ख़ुदा मुझे अब माफ़ करे!
(9)
केबड़े की गंध लाफ़ानी
उठती है बदन से
इसमें तुम्हारा नहीं
धरती का होना है सुखद
तुम धरती हुईं
फिर गंध धरती की
कि केवड़े सी मादक अब
तुम्हें मालूम कब
मैं इसमें डूबा हुआ
मेरे इस डूबने में
उस पार जाने की इबारत है
मैं इक नाव में हूँ
जो हवा में तैरती है
झुका लेता था उठा सिर
इतना पत्थर दिल ज़माना होगा
मुझे मालुम न था
दस-बारस बरस का मैं
मांजने का काम करता था
धुले हुए बर्तन लगाके झूठ सकरन
पटक दिए जाते थे फिर-फिर
या फिर कम चमक का बहाना
उन दिनों राख थी बस जिसे महीन छाने बिना
रेखाएँ उछर आती थीं उन पर
और फिर काम करना मुहाल
बावजूद इन तमाम हालातों के
न होता था कोई चारा
कि इतना सख़्तजान होना था
कि सी लेना था ज़ुबान जबरन
सुनते हुए झिड़कियाँ, गाली-गलौच
और तमाचे नन्हें गालों पर
फ़िक्र में माँ-पिता थे जिन तक
शिकायत हो जाने का डर
कि जो आला इंसान थे
मुसीबत में
जो ख़ाक से उठकर बने थे
सो यह सोचता कि गुस्सा बर्फ़ हो
झुका लेता था उठा सिर
और साफ़ बर्तन को
दुबारा
मांजने चमकाने लगता था
चरवाहा मन
खो गयी एक धुन
बचपन की
सारा मधुर धुन
बंधा था जिसमें मेरा मन
कहूँ चरवाहा मन
गया वो श्याम रंग
कि जिसमें लाज की पोशाक तज
कोयला तोड़ता था
हारों-पहारों से बना अटल विश्वास
अब कांपता है
जबकि उन दिनों कुछ न था घर में
यहाँ तक दो जून की रोटी
और यही मन धेनु-शिशु सा
जंगल नाप जाता था
था इतना पक्का कि अंतड़ियाँ सूखने पर
रगों में दौड़ता था ख़ून
बसैती हवा सा
कितने अपमान
कितनी जिल्लतें थीं रोज़
तिस पर भिड़ जाता था उन सबसे
जिनकी तिजोरियों में
बंद थी घर की ख़ुशी
पिता की मूँछे
माँ का गर्वीला मस्तक
बहन का सुहाग
और भाई का मँहगा इलाज़ कि वो पागल था
इधर अब नौकरी ऐसी कि हूँ सरकारी नौकर
बँधा इक इस सहारे से
और इतनी जिम्मेदारियाँ
हलकान-परेशान मैं
उठता हूँ लड़ने को
तो बस पाँव हो जाता
छोड़कर सबको बेभरोसे लौटना कितना कठिन
अँधेरा है घना और सभी रास्ते ग़ायब
दुश्मनों के अट्टहास में डूबी रात
वही चरवाहा मन
वही सादा मधुर धुन
जो आती है लोट ऐसे में
उससे इस रात को दिन किये
जीता हूँ फिर
इतना बेढब, इतना बेउम्मीद और तवील है यह
लिए खुद्दारी और
बचाए रीढ़ अपनी
चलता हूँ जो इस रास्ते पे
तो वह बोल उठता है
कि ना उम्मीद न हो...
रूह की पाकीज़गी में रह
रूह की गर्मी है जवाब हर मुसीबत का
उन दो कासनी पत्तियों के बीच
उगता एक गुलाब है
अपनी पंखुड़ियों में बंद
बहुत कोमल
कि जिसपे होंठ मेरे
मैं अपने होठों को
कहाँ रखूँ
किसे चूमूँ
गुलाब बेइंतहा खूबसूरत है
मैं खोलता हूँ पत्तियाँ जो सांवली घनेरी
इनके भीतर उतरकर देखता हूँ
रोशन जहाँ इक
वहाँ मेरे होठ पहले से धरे
मैं घबराया इस असमंजस में
मैं अपनी देह से खोये
वो होठ ढूँढता हूँ, हारता हूँ
(2)
जिस तरह घुलती है काया
घुल न सकी
रूह में कुछ और था
एक हो न सके
(3)
तुम जिस्म में डूबी
मैं रूह में अपनी
ये जिस्म
रूह के पानी में अवाक डूब गया
(4)
मेरी निगाह से देखो
नज़र है ये तुम्हारी
मैं कोई और नहीं
कि दिखाई न दूँ
(5)
खिल उठे
देह पर दो सांवले गुलाब
इनका आस्वाद अनोखा इतना
कि सारे अल्फाज़ सिफर
मैं हार गया लिखते हुए
अब लिखना क्या?
(6)
समंदर समो लेता है
नदी को अपने भीतर
तुम नदी होते-होते खो गई
मैं इंतजार करते हुए
(7)
कभी हाज़िर हो हम
कभी गै़रहाज़िर
बस इसी तरह
ये उम्र फ़ना होती रही
(8)
मेरी रूह में
तुम
तुम्हारी परछाईं
और उसकी रोशनी
इतनी पाक
कि ख़ुदा की नेमत
मैं तुझमें डूब गया
ख़ुदा मुझे अब माफ़ करे!
(9)
केबड़े की गंध लाफ़ानी
उठती है बदन से
इसमें तुम्हारा नहीं
धरती का होना है सुखद
तुम धरती हुईं
फिर गंध धरती की
कि केवड़े सी मादक अब
तुम्हें मालूम कब
मैं इसमें डूबा हुआ
मेरे इस डूबने में
उस पार जाने की इबारत है
मैं इक नाव में हूँ
जो हवा में तैरती है
झुका लेता था उठा सिर
इतना पत्थर दिल ज़माना होगा
मुझे मालुम न था
दस-बारस बरस का मैं
मांजने का काम करता था
धुले हुए बर्तन लगाके झूठ सकरन
पटक दिए जाते थे फिर-फिर
या फिर कम चमक का बहाना
उन दिनों राख थी बस जिसे महीन छाने बिना
रेखाएँ उछर आती थीं उन पर
और फिर काम करना मुहाल
बावजूद इन तमाम हालातों के
न होता था कोई चारा
कि इतना सख़्तजान होना था
कि सी लेना था ज़ुबान जबरन
सुनते हुए झिड़कियाँ, गाली-गलौच
और तमाचे नन्हें गालों पर
फ़िक्र में माँ-पिता थे जिन तक
शिकायत हो जाने का डर
कि जो आला इंसान थे
मुसीबत में
जो ख़ाक से उठकर बने थे
सो यह सोचता कि गुस्सा बर्फ़ हो
झुका लेता था उठा सिर
और साफ़ बर्तन को
दुबारा
मांजने चमकाने लगता था
चरवाहा मन
खो गयी एक धुन
बचपन की
सारा मधुर धुन
बंधा था जिसमें मेरा मन
कहूँ चरवाहा मन
गया वो श्याम रंग
कि जिसमें लाज की पोशाक तज
कोयला तोड़ता था
हारों-पहारों से बना अटल विश्वास
अब कांपता है
जबकि उन दिनों कुछ न था घर में
यहाँ तक दो जून की रोटी
और यही मन धेनु-शिशु सा
जंगल नाप जाता था
था इतना पक्का कि अंतड़ियाँ सूखने पर
रगों में दौड़ता था ख़ून
बसैती हवा सा
कितने अपमान
कितनी जिल्लतें थीं रोज़
तिस पर भिड़ जाता था उन सबसे
जिनकी तिजोरियों में
बंद थी घर की ख़ुशी
पिता की मूँछे
माँ का गर्वीला मस्तक
बहन का सुहाग
और भाई का मँहगा इलाज़ कि वो पागल था
इधर अब नौकरी ऐसी कि हूँ सरकारी नौकर
बँधा इक इस सहारे से
और इतनी जिम्मेदारियाँ
हलकान-परेशान मैं
उठता हूँ लड़ने को
तो बस पाँव हो जाता
छोड़कर सबको बेभरोसे लौटना कितना कठिन
अँधेरा है घना और सभी रास्ते ग़ायब
दुश्मनों के अट्टहास में डूबी रात
वही चरवाहा मन
वही सादा मधुर धुन
जो आती है लोट ऐसे में
उससे इस रात को दिन किये
जीता हूँ फिर
इतना बेढब, इतना बेउम्मीद और तवील है यह
लिए खुद्दारी और
बचाए रीढ़ अपनी
चलता हूँ जो इस रास्ते पे
तो वह बोल उठता है
कि ना उम्मीद न हो...
रूह की पाकीज़गी में रह
रूह की गर्मी है जवाब हर मुसीबत का
No comments:
Post a Comment