ओम निश्चल: एक नागरिक के रूप में व्यवस्था पर कब गुस्सा आता है?
लीलाधर मंडलोई: व्यवस्था का स्थायी रंग स्याह है। वहाँ किसी के लिए सकारात्मक निर्णयों की स्पेस बनिस्बत कम है। पहुँच और अनुनय-विनय के शिल्प का ओहदा नियम-कानून से बड़ा है। आम-आदमी के पक्ष में संघर्ष के बावजूद न्याय का प्रतिशत कम हैं। मैंने खुद कइयों के पक्ष में लड़ाई की। सफलता कम मिली। सफलता के द्वार बन्द होने में वक्त नहीं लगता। यहाँ लोग अँधेरों के साथ किसी अवसाद में रोमांस अधिक करते हैं।
जब इस व्यवस्था में परिवर्तन की नागरिक कोशिशें हारने लगती हैं। मैं गुस्से से अधिक अपनी असहायता पर शर्मिंदा होता हूँ। महात्मा गांधी का कथन हैµ”क्रोध के शमन के बाद, आप जो कार्य करते हैं, उसी में फल मिलता है।“ तो मैं हारने के बावजूद जुटा रहता हूँ।
ओम निश्चल: आपके नियमित पठन-पाठन में क्या कुछ होता है?
लीलाधर मंडलोई: समय का टोटा है पठन-पाठन के लिए किन्तु मैं अव्यवस्थाओं में भी एक व्यवस्थित समय निकाल लेता हूँ। मसलन रात नौ बजे घर लौटने के बाद 10 से 12 बजे के बीच पढ़ता हूँ। सुबह एक-दो घंटे के लिए पुनः लिखता हूँ या मन न हो तो पढ़ता हूँ। शनिवार-रविवार को कम से कम चार-पाँच घंटे पढ़ने-लिखने के होते हैं। मन उ$बता है तो संगीत सुनता हूँ ‘रिचार्जिंग’ के लिए या परिवार के साथ गप्प मारता हूँ। कभी ब्रेक में सब्जी बनाता हूँ।
मैं पठन-पाठन में सभी विषय शामिल करता हूँ। कविता, कहानी, उपन्यास के अलावा मेरा बल लोक-आदिवासी साहित्य, इतिहास, समाज शास्त्रा और देश-विदेश के प्रकृति विषयक साहित्य में रुचि रहती है। विश्व का कालजयी साहित्य तो पढ़ता ही हूँ। मुझे आत्मकथाएँ और जीवनियाँ पढ़ता बहुत भाता है। साथ ही मीडिया और फिल्म विषयक शोध साहित्य भी चाव से पढ़ता हूँ। भारतीय भाषाओं के अनुवादों को अनिवार्य रूप से पाठ में शामिल करता हूँ। तो इतना कुछ ही किस्त-किस्त जिंदगी है पठन-पाठन की। हादी आज़मी ने हम जैसे साहित्य रोगियों के लिए कहा हैµ
”लगाकर शम्मा से लौ खाक कितने हो चुके लेकिन
ये परवाने अभी तक रोशनी की बात करते हैं।“
ओम निश्चल: कभी मन हुआ कि कविता तो बहुत कर ली, अब कहानी की ओर लौटे या कोई उपन्यास लिखें। क्योंकि कहानी की भाषा तो बखूबी आपके पास है?
लीलाधर मंडलोई: मेरे कई मित्रा अक्सर कहते हैं कि तुम्हारे भीतर कथा व उपन्यास लिखने की सारी सामग्री है। भाषा से जैसे उन्हें बड़ी उम्मीद है। शायद जो गद्य लिखा उसमें कुछ कण उन्हें दीखते हों। मैंने तीन साल-पहले कुछ कोशिश भी की। लेकिन संतोष नहीं हुआ। अरुण प्रकाश जी ने ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में एक कहानी छापी भी। प्रतिक्रियाएँ भी ठीक-ठाक थी। लेकिन लगता है मुझे व्याकरण और शिल्प ठीक-ठाक पकड़ में नहीं आ रहा। मुझे एक ‘टेक आॅफ प्वाइंट’ जैसा चाहता हूँ मिल नहीं पा रहा।
गद्य में डायरी, संस्मरण और निबंध मेरी प्रकृति के अधिक करीब लगते हैं इनमें मन रमता है। इंद्रियाँ जागती है। मेरी कहीं कै़द स्मृतियाँ-अनुभव एकाएक मेज पर आ विराजती है। फिलहाल जिंदगी का तमाशा जिन विधाओं में आ रहा है, उतने से ही गुजारा चला रहा हूँ। मानस रंजन महापात्रा, उड़िया कवि उपन्यासकार की एक कविता ‘हे सड़क’। उसमें वे कहते हैंµसड़क के इस पार से। जाना होगा मुझे उस पार। तुम मेरे साथ रहो। तो इन विधाओं के साथ उस पर जाउ$ँगा तो शायद जो अब तक टुकड़ों-टुकड़ों में जो लिखा है उसमें से शायद कोई राह निकले।
ओम निश्चल: इधर कहानी में क्या कुछ पढ़ा जो स्मृति में धारण करने योग्य हो?
लीलाधर मंडलोई: अरविन्द कुमार सिंह की ‘बलि’, हरि भटनागर की ‘माई’, अजित हर्षे की ‘प्रेम सपना और मृत्यु’, उदय प्रकाश की ‘मोहन दास’, पंखुरी सिन्हा की ‘कोई भी दिन’, राजेन्द्र दानी की ‘महानगर’µये कहानियाँ मैंने पढ़ी है।
ओम निश्चल: और उपन्यासों में µपिछले एक-दो साल के भीतर?
लीलाधर मंडलोई: नासिरा शर्मा का ‘कुईंया जान’, असगर वजाहत का ‘कैसी आगि लगाई’, विष्णु नागर का ‘दिन रात’, भगवान दास मोरवाल का ‘.............’ और अजय नावरिया का ‘..............’
ओम निश्चल: जहाँ आप हैं, वहाँ से कभी पीछे मुड़ कर देखते हैं?
लीलाधर मंडलोई: अनीता वर्मा मेरे प्रिय कवियों की फेहरिस्त में हैं। उन्होंने अपने गिरते स्वास्थ्य के बावजूद अतीत की स्मृतियों को बहुत सटीक ढंग से कविता में व्याख्यायित किया है। पंक्तियाँ मुझे प्रिय इसलिए भी हैं कि स्मृतियों को लेकर मेरे भी मन कुछ ऐसा ही हैµकुछ पंक्तियाँµ
हर समय वही उपस्थित जो दिखाई नहीं देता
अदृश्य सबसे अधिक है
धुँधला ही सबसे ज्यादा साफ
उसी में बची है देखने की सबसे ज्यादा कोशिश
दूर की चीजें बहुत पास हैं
जैसे तारे जिनकी रोशनी में चमकती यह खिड़की
दूरी एक महीन डोर है
जिसे मैं थामे रहती हूँ
खिंचती हुई चली आती हूँ तारों तक
µतो मैं पीछे देखता हूँ। कुछ सामान झोली में भर लेता हूँ और आगे की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ
डाॅ. ओम निश्चल
जी-1/506 ए, उत्तम नगर,
नई दिल्ली-110059
फोन: 09955774115
लीलाधर मंडलोई
ए-2492, नेताजी नगर,
नई दिल्ली
फोन: 011-26888277
लीलाधर मंडलोई: व्यवस्था का स्थायी रंग स्याह है। वहाँ किसी के लिए सकारात्मक निर्णयों की स्पेस बनिस्बत कम है। पहुँच और अनुनय-विनय के शिल्प का ओहदा नियम-कानून से बड़ा है। आम-आदमी के पक्ष में संघर्ष के बावजूद न्याय का प्रतिशत कम हैं। मैंने खुद कइयों के पक्ष में लड़ाई की। सफलता कम मिली। सफलता के द्वार बन्द होने में वक्त नहीं लगता। यहाँ लोग अँधेरों के साथ किसी अवसाद में रोमांस अधिक करते हैं।
जब इस व्यवस्था में परिवर्तन की नागरिक कोशिशें हारने लगती हैं। मैं गुस्से से अधिक अपनी असहायता पर शर्मिंदा होता हूँ। महात्मा गांधी का कथन हैµ”क्रोध के शमन के बाद, आप जो कार्य करते हैं, उसी में फल मिलता है।“ तो मैं हारने के बावजूद जुटा रहता हूँ।
ओम निश्चल: आपके नियमित पठन-पाठन में क्या कुछ होता है?
लीलाधर मंडलोई: समय का टोटा है पठन-पाठन के लिए किन्तु मैं अव्यवस्थाओं में भी एक व्यवस्थित समय निकाल लेता हूँ। मसलन रात नौ बजे घर लौटने के बाद 10 से 12 बजे के बीच पढ़ता हूँ। सुबह एक-दो घंटे के लिए पुनः लिखता हूँ या मन न हो तो पढ़ता हूँ। शनिवार-रविवार को कम से कम चार-पाँच घंटे पढ़ने-लिखने के होते हैं। मन उ$बता है तो संगीत सुनता हूँ ‘रिचार्जिंग’ के लिए या परिवार के साथ गप्प मारता हूँ। कभी ब्रेक में सब्जी बनाता हूँ।
मैं पठन-पाठन में सभी विषय शामिल करता हूँ। कविता, कहानी, उपन्यास के अलावा मेरा बल लोक-आदिवासी साहित्य, इतिहास, समाज शास्त्रा और देश-विदेश के प्रकृति विषयक साहित्य में रुचि रहती है। विश्व का कालजयी साहित्य तो पढ़ता ही हूँ। मुझे आत्मकथाएँ और जीवनियाँ पढ़ता बहुत भाता है। साथ ही मीडिया और फिल्म विषयक शोध साहित्य भी चाव से पढ़ता हूँ। भारतीय भाषाओं के अनुवादों को अनिवार्य रूप से पाठ में शामिल करता हूँ। तो इतना कुछ ही किस्त-किस्त जिंदगी है पठन-पाठन की। हादी आज़मी ने हम जैसे साहित्य रोगियों के लिए कहा हैµ
”लगाकर शम्मा से लौ खाक कितने हो चुके लेकिन
ये परवाने अभी तक रोशनी की बात करते हैं।“
ओम निश्चल: कभी मन हुआ कि कविता तो बहुत कर ली, अब कहानी की ओर लौटे या कोई उपन्यास लिखें। क्योंकि कहानी की भाषा तो बखूबी आपके पास है?
लीलाधर मंडलोई: मेरे कई मित्रा अक्सर कहते हैं कि तुम्हारे भीतर कथा व उपन्यास लिखने की सारी सामग्री है। भाषा से जैसे उन्हें बड़ी उम्मीद है। शायद जो गद्य लिखा उसमें कुछ कण उन्हें दीखते हों। मैंने तीन साल-पहले कुछ कोशिश भी की। लेकिन संतोष नहीं हुआ। अरुण प्रकाश जी ने ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में एक कहानी छापी भी। प्रतिक्रियाएँ भी ठीक-ठाक थी। लेकिन लगता है मुझे व्याकरण और शिल्प ठीक-ठाक पकड़ में नहीं आ रहा। मुझे एक ‘टेक आॅफ प्वाइंट’ जैसा चाहता हूँ मिल नहीं पा रहा।
गद्य में डायरी, संस्मरण और निबंध मेरी प्रकृति के अधिक करीब लगते हैं इनमें मन रमता है। इंद्रियाँ जागती है। मेरी कहीं कै़द स्मृतियाँ-अनुभव एकाएक मेज पर आ विराजती है। फिलहाल जिंदगी का तमाशा जिन विधाओं में आ रहा है, उतने से ही गुजारा चला रहा हूँ। मानस रंजन महापात्रा, उड़िया कवि उपन्यासकार की एक कविता ‘हे सड़क’। उसमें वे कहते हैंµसड़क के इस पार से। जाना होगा मुझे उस पार। तुम मेरे साथ रहो। तो इन विधाओं के साथ उस पर जाउ$ँगा तो शायद जो अब तक टुकड़ों-टुकड़ों में जो लिखा है उसमें से शायद कोई राह निकले।
ओम निश्चल: इधर कहानी में क्या कुछ पढ़ा जो स्मृति में धारण करने योग्य हो?
लीलाधर मंडलोई: अरविन्द कुमार सिंह की ‘बलि’, हरि भटनागर की ‘माई’, अजित हर्षे की ‘प्रेम सपना और मृत्यु’, उदय प्रकाश की ‘मोहन दास’, पंखुरी सिन्हा की ‘कोई भी दिन’, राजेन्द्र दानी की ‘महानगर’µये कहानियाँ मैंने पढ़ी है।
ओम निश्चल: और उपन्यासों में µपिछले एक-दो साल के भीतर?
लीलाधर मंडलोई: नासिरा शर्मा का ‘कुईंया जान’, असगर वजाहत का ‘कैसी आगि लगाई’, विष्णु नागर का ‘दिन रात’, भगवान दास मोरवाल का ‘.............’ और अजय नावरिया का ‘..............’
ओम निश्चल: जहाँ आप हैं, वहाँ से कभी पीछे मुड़ कर देखते हैं?
लीलाधर मंडलोई: अनीता वर्मा मेरे प्रिय कवियों की फेहरिस्त में हैं। उन्होंने अपने गिरते स्वास्थ्य के बावजूद अतीत की स्मृतियों को बहुत सटीक ढंग से कविता में व्याख्यायित किया है। पंक्तियाँ मुझे प्रिय इसलिए भी हैं कि स्मृतियों को लेकर मेरे भी मन कुछ ऐसा ही हैµकुछ पंक्तियाँµ
हर समय वही उपस्थित जो दिखाई नहीं देता
अदृश्य सबसे अधिक है
धुँधला ही सबसे ज्यादा साफ
उसी में बची है देखने की सबसे ज्यादा कोशिश
दूर की चीजें बहुत पास हैं
जैसे तारे जिनकी रोशनी में चमकती यह खिड़की
दूरी एक महीन डोर है
जिसे मैं थामे रहती हूँ
खिंचती हुई चली आती हूँ तारों तक
µतो मैं पीछे देखता हूँ। कुछ सामान झोली में भर लेता हूँ और आगे की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ
डाॅ. ओम निश्चल
जी-1/506 ए, उत्तम नगर,
नई दिल्ली-110059
फोन: 09955774115
लीलाधर मंडलोई
ए-2492, नेताजी नगर,
नई दिल्ली
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