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Monday, February 7, 2011

दीमक का घर

लीलाधर मंडलोई
(1)
दीमक का घर
कमाल सुन्दर
लेकिन कितना जटिल

सीखता हूँ अपनी कविता रचना

दीमक की भाषा में

(2)
रेत के सजीले घरधूले
बनाए जिन्हें हमने
बचपन में

तोड़े अपनों ने
कभी सनक में
कभी अनजाने

इस तरह जाना हमने
घरों के टूटने का सच

(3)
मेरी भाषा सपनों की सहयात्राी है
जैसे कल देखा मैंने सपना
बरस रही थी आसमान से आग
आज मेरी भाषा यह पौधा रोप रही है

(4)
यह साधारण घटना नहीं
शर्म की बात हैµराम

कि एक स्त्राी ने
प्रतिरोध में
धरती की शरण ली

(5)
इतना दुख
इतना अपमान
इतनी घृणा

मिथिला के लोग
नहीं ब्याहते अपनी बेटी
अयोध्या में



(6)
मैंने प्रार्थना को धर्म से कभी नहीं जोड़ा
जैसे कि मेरी यह प्रार्थना
हर ग़रीब को
वह सब मिले

जो उसका हक़ है

(7)
इस सृष्टि के अन्तिम जीव के लिए
सिर्फ़ प्रेम नहीं
बल्कि उसके जीवन के लिए
लड़ाई का संकल्प है जिसमें
मैं उस धर्म के साथ हूँ

(8)
भारी चट्टान के नीचे
जल है
यह उस फूल ने कहा

सुना आपने!!

(9)
वह एक हत्यारा है
सबने कहा

एक और था वहाँ
कहा जिसने
‘जन्म से नहीं’

उसने सुनी थी
हत्यारे के रोने की आवाज़

(10)
उनके बारे में
कुछ सोचो

जिन्हें देखकर
उदास हो जाता है
कवि का मन

(11)
जब मुदित हो रहे थे
नये बजट पर
लोग

एक भूखा कुत्ता
पागल की गोद में
रो रहा था

(12)
उसने जीत लिया
भूख और दुःख को
सरकार अब
घबराई हुई है

(13)
बच्चे जब भूलने लगे रिश्ते
डूबने लगे
और नयी नातेदारियों में

माँ ने फिर
सुनाना शुरू कर दी
कथा-कहानी

बच्चे और-और
सुनने की ज़िद में
लौटने लगे घर

(14)
करवटें बदलते हुए अमूमन
रात बीत जाती है

कोई एक विचार आ धमकता है भयानक
और एक बैचेन नदी का शोर
सुनाई पड़ता है रात भर
पत्नी की साँसों में

बिल्ली के रोने की आवाज़ में
एक रात और बीत जाती है

(15)
मदन महल की पहाड़ी पर
कुदरत का आश्चर्य

एक बड़ी सी असम्भव चट्टान
नीचे छोटी वाली पर टिकी हुई

मुझे याद हो आया बचपन
माँ जैसे
अब गिरी कि तब

(16)
बिक रहा है खुलेआम
‘मिडनाइट हाॅट’

मैं इस पेशे में
और शर्मसार बहोत

खरीद लेगा एक दिन वह इसे भी
क्या मैं लड़ पाउ$ँगा जबकि
सरकार कह रही है ख़ुशआमदीद

(17)
बचपन में सुनी थी
रानी दीमक की कहानी
रानी दीमक यानि रानी माँ

माँ हम सबकी भी
लेकिन रानी नहीं
न पति के राज में
न उसके बाद

उनके लिए तो
वृंदावन धाम जलता हुआ

जहाँ कृष्ण बांसुरी बजाता है

(18)
दुःख से प्यार करो
जीत होगी

इसमें छिपा है
लड़ने का अमर नुस्ख़ा

मेरे सौन्दर्यबोध के अमर पाठ

संस्मरण
मेरे सौन्दर्यबोध के अमर पाठ
लीलाधर मंडलोई

(1)
एक दाग आपको जीवन भर मनुष्य बने रहने का रास्ता दिखाता है  
कुछ याद करता हूँ तो इंद्रिया जाग उठती हैं। उनका स्मृतियों में जागना चैंकाता है। जैसे चूल्हे में गिरने के बाद जो हुआ। चूल्हे पर चाशनी उबल रही थी। मैं उस खौलती चाशनी पर। दोनों पाँव पर आ गिरी वह। मैं दर्द में चीखा। तो चीखता गया। अस्पताल में कई दिन। बाद में दाग़ जाने में महीने लगे। एक दाग़ अब भी बाक़ी। अब मैं पचपन का। जब भी आग देखता हूँ सिहर जाता हूँ। इस सिरहने में जलने की स्मृति अब भी इतनी जागृत कि ऐंद्रियता के इस दिलचस्प पहलू को जाने किन चीज़ों से जोड़कर देखता हूँ। क्या एक कवि स्मृतियों में जाकर इतना ही सिहरता है। क्या इस भय पैदा करने वाली सिहरन के जीवित बने रहने से सृजनात्मकता का कोई सम्बन्ध बनता है...? क्या मेरा इस तरह सोचना कहीं कुछ जोड़ता है? सोचता हूँ तो हर बार वह चूल्हा, वह घर, माँ, पिताजी, भाई, बहन, अस्पताल, डाॅक्टर, नर्स और बचपन के रिश्ते-नाते संग-साथ चले आते हैं। माँ-पिता के आँसू, भाई-बहन का रोना, नर्स का पट्टियाँ बदलते समय कोमल स्पर्श, बहन का सुलाना आदि। अगर यह सब बचा हुआ है तो एक कवि की पूँजी है। इस सजलता में कुछ ऐसा जरूर है कि मनुष्य जीवन की महिमा का पता चलता है। भले ही जलकर मनुष्य बनो कोई हर्ज नहीं। एक दाग़ आपको जीवन भर मनुष्य बने रहने का रास्ता दिखाता है कि आप ये सब नहीं भूलते जिसे भूल जाने से आप कुछ और होते...शायद मनुष्य नहीं।

(2)
गँध में भीगी-नहाई माँ
    माँ जब खदान से शाम गये लौटती तो पसीने के साथ कुछ और गँध होती। डीजल की गँध। टेमा में भरे गये घासलेट की गंध। वह गंध में भीगी-नहाई हुई माँ होती। मैं दौड़कर उसे चिपटने को होता और वह परे करने का यत्न करती। अनमने मन से। ताकि गँध में कहीं मैं न लिपट जाउ$ँ। लेकिन वह गँध जैसे मुझे भाती थी। माँ को मेरी इंद्रियाँ उन गंधों के साथ अधिक पहचानती थीं। कुछ ऐसा था कि माँ की साड़ियाँ बार-बार धुलने पर भी जैसे उनमें डूबी रहतीं। उनके काम पर जाने के बाद जीजी उनकी कोई एक गंध में जीवित साड़ी को खटिया पर बिछा देती। मैं उस खटिया पर साड़ी के साथ ऐसा बेफ़िक्ऱ सोता कि जैसे माँ के अंक में समाया होउ$ँ। वह गंध आज भी पीछा करती है। गाँव लौटता हूँ तो जैसे वह मुझे घेर लेती है अब भी...।
(3)
धरती से उठती सुगंध का रोग
    भयानक गर्मी। नौतपा खत्म हुआ। माँ रह-रहके आसमान तकती। बारिश के आने के इंतजार में वह जैसे कुछ और हो जाती। अपना गाँव उसे याद आता। बादलो को आसमान में उमड़ते-घुमड़ते देखकर उसकी आँखों में जैसे चमक जाग उठती। बचपन के कई दृश्य या कुछ छवियाँ हैं जिनके पुनः सजीव हो उठने के रोमांच में वह डूब जाना चाहती। वह खेतों को याद करती। हवाओं के शीतल झोंको की बाट जोहती। मैंने जब तक गाँव नहीं छोड़ा उन्हें इसी तरह आकुल देखा।
    और जब बादल घुमड़ते। ठंडी हवा दौड़ती। वह घर के पिछवाड़े बालकराम के खेत में जा खड़ी होती। जैसे ही बारिश की बूँदे गिरना शुरू होती वह खेत में बैठ जाती। भीगती रहती। और बार-बार बुलाने पर भी वहीं बनी रहती। हम देखते वह गीली हो रही मिट्टी को आस-पास पड़ी किसी लकड़ी से खोदने का काम करती। मिट्टी के साथ उसका यह खेल चलता रहता। धीरज टूटने पर मैं भी दौड़ पड़ता माँ के पास। वह मुझे भी मिट्टी खोदने को कहती। मेरे भीगने पर वह परेशान न होती। और मैं भीगने के आनंद में डूबता। खुश होता।
    पहली बारिश में भीगने की ललक से माँ के लिए कुछ बड़ा और विरल सुख नहीं था। माँ को इस तरह भीगते, मिट्टी से खेलते देख पिता जरूर मुस्कियाते थे। लेकिन माँ के भीगने और मिट्टी से इस तरह के प्रेम का रहस्य कुछ बड़े होने पर समझ आया।
    ऐसे ही दिनों में पचलावरे (गाँव) से गम्मू मामा आए थे। और उन्होंने माँ को भीगते-खेलते देखा तो हँस पड़े। जब हमने पूछा तो मामा ने बताया कि बचपन से यह ऐसा ही उ$धम करती थी। तुम्हारी माँ को पहली बारिश में भीगने से अधिक धरती से उठती उसकी सुगंध का रोग है। गाँव में भी ये ऐसे ही खेत में उतर जाती थी। और घँटो इस सुगंध में डूबी रहती थी। बारिश इसके मन के सबसे अधिक पास है। इस मौसम में वह सबसे ज्यादा खुश रहती है। बीमार नहीं होती।
    कुछ चमत्कार था कि माँ के साथ-साथ बारिश मेरे साथ जीवन में अपनी पहली सुगंध के साथ चली आई। बारिश के पहले ‘झले’ के साथ ही, मैं उस सुगंध में डूबने को व्याकुल हो उठता हूँ। मैं उसे एकदम साथ लिये यहाँ तक चला आया हूँ। आज मेरे बच्चे बारिश में भीगना पसन्द करते हैं और खूब लेकिन कृत्रिम खुश्बुओं के बीच वे धरती की सुगंध को उस तरह चीन्ह नहीं पाते। मैं अपनी माँ से इधर तक की यात्रा में उस सुगंध के चले आने पर चकित हूँ और बच्चों के भीतर से उसके खो जाने पर दुखी ...। मैं माँ को याद करता हूँ। इतना सजीव दृश्य। इतनी सजीव सुगंध...। माँ...अब भी इतनी सजीव अपनी इंद्रियों सहित...।

(4)
ख़ुशबुओं में बिलमा के
    जाने किसने माँ को सिखाया था कि रसोई के अलावा घर और पिछवाड़े में सुवास का पर्यावरण रखो। ऐसा करने से भूख बनिस्बत कम लगती है या कहें भूख से लड़ने में मदद मिलती है। सो माँ ने इस गुण को गाँठ बाँध लिया। वह हमसे शायद इसी वजह कहती कि इसे सूँघो। इसे जरूर। और इसे न सूँघा तो क्या सूँघा। तो बाड़ी में धनिया जरूर उगे। अमरुद के पेड़ हों और पके अमरुद की गंध घर के आर-पार हो। तुलसी के बिना कोई घर, घर नहीं होता। सो वह सदैव बनी रहे। इसके अलावा अजवाइन, गुलाब, अनार, मैथी, पुदीना आदि का उन्होंने कभी साथ न छोड़ा। ये गाँव के घर के अपरिहार्य अँग थे। माँ ने इनकी खुश्बुओं में बिलमाके हमें कैसे भूख के भय से दूर रखने में सफलता पाई, इसे आज समझा जा सकता है। घर में दाना न हो तो अजवाइन के पत्तों के भाप में पके व्यंजन, मैथी का ढेर सा साग भात के साथ, पुदीना की चटनी के साथ अमेरिकन लाल ज्वांर के टिक्कड़, लहसुन की तीखी चटनी के साथ पेजा, पुदीना और आम की चटनी के साथ मक्के की रोटियाँ। माँ ने समझ रखा था कि दो ही अन्तिम सत्य है स्वाद और गँध। जैसे पिता को अगर दाल में हींग की सुगंध मिल जाए तो हो सकता है घर में दो रोटी अगर उनके भोजन में कम हो तो कोई बात नहीं।
    इस तरह सुगंध-स्वाद में कह सकते हैं मूर्ख बनाते हुए माँ ने दो कौर या दो रोटी को कम करते हुए घर चलाने को गणित बखूबी सीख रखा था। हम भूख से ज्यादा सुगंध-स्वाद को करते हैं बार-बार याद। भला इसे क्या कहें? इंद्रियाँ भूख जगाती हैं। यहाँ माँ ने ऐसा क्या जादू सीखा कि भूख कम जागती थी। कदाचित सुगंध में हरदम बने रहने की वजह से। या शायद कोई और रहस्य। कम से कम मैं नहीं समझ सका। बहुत-बहुत भूख लगने पर भी उतना कभी न खा सका जितनी औरों की सामान्य भूख होती है...। मुमकिन है यह वैज्ञानिक सत्य न हो। किन्तु जिस दिन रसोई में खाना पकाने जाता हूँ और मसालों की सुगंध के बीच बनते हुए भोजन के साथ रहता हूँ उस दिन रोटी-दो-रोटी की भूख कम हो जाती है। और माँ की उस गणित को सच मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं ढूँढ पाता...। मैं सचमुच विकल्पहीन बने रहते हुए जितना जीवन बचा है, इसी भरोसे में जीना चाहता हूँ।

(5)
शेर छाप बीड़ी की गँध
    पिता क्रोध में शेर की तरह दहाड़ते थे। वे मोहनलाल हरगोविन्ददास की ‘शेर छाप बीड़ी’ पीते थे। हमें लगता यह शेर छाप बीड़ी का प्रताप है। हमारे घर में बीड़ी के धुएँ की गंध चैतरफ डोलती रहती थी। ये कुछ अजीब था कि माँ पिता को बीड़ी पीने पर टोकती थी लेकिन उसकी गंध को पसन्द करती थी। पिता की सुआपी (अंगोछा) और कुर्ते में वह गंध होती थी और शायद पसीने की भी। हमने माँ को कई दफा उन्हें सूँघते हुए देखा था। चोरी-छिपे मैं भी सूँघता और मुझे अच्छा लगता। पिता की अनुपस्थिति में इस तरह पिता के साथ रहने का एक अनोखा अनुभव बचपन में बना रहा। ऐसा भी हुआ कि पिता के घर पर न होने पर उनके बंडल से बीड़ी निकालकर चोरी से पीने की कोशिश भी की किन्तु उसे पीना कभी अच्छा न लगा। हाँ उसकी गंध ने जरूर बाँधे रखा। आज भी कोई शख़्स बीड़ी पीता हुआ मिल जाए तो मैं चुपचाप उसके पास कुछ देर के लिए खड़ा होकर गंध में डूब जाना चाहता हूँ।

(6)
वात्सल्यों के स्पर्श में डूबे वे दिन
मैं कई रोज़ बुखार में था। देसी-विदेशी दवाओं के प्रयोग रोज़ होते। कोई कहता मियादी बुखार। कोई मलेरिया। कोई कुछ और। माँ ने काम पर जाना बंद कर दिया। वह बस घर पर मेरे साथ बनी रहतीं। पट्टियाँ पानी की दिन भर बदली जातीं कि बुखार में पड़ता शरीर शीतल हो।
    उन दिनों सबसे अधिक शीतलता माँ के प्यार में मिलती। वह चूमती तो लगता हवा का सबसे शीतल झोंका घर में आके आ विराजा हो। उसके अधरों का स्पर्श अनोखी शांति देता। माथे पर, गालों पर, होठों पर, आँखों पर। ममता जैसे आत्मा सहित बहती रही हो। वात्सल्य के स्पर्शों में डूबे वे दिन आज इतने मूर्त और जीवंत हैं कि लगता है कि फिर वैसा बुखार हो। फिर माँ हो। और माँ के वे अविस्मरणीय स्पर्श। कोई सलोना वैसा स्पर्श मिल जाए अब भी, इसकी इच्छा अशेष बनी रहती है...। ऐसे स्पर्श कदाचित ढूँढता रहता हूँ मैं आकुल-व्याकुल सा...।

(7)
आँखों में सदैव कुछ खोज लेने का भाव
घर से एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर महुआर था। महुआ के पेड़ों को सघन कुंज। आम, जामुन और नीम के भी। कई तरह की जंगली झाड़ियाँ। सतपुड़ा का हरा सौन्दर्य। छोटे-छोटे से नाले जो पानी से भरे रहते। नालों में मछलियाँ। इठलाती-तैरतीं। करौंदे के छोटे-छोटे गोल मटोल फलों का गुच्छा। बेल के पेड़। हम बेलपत्रा पूजा के लिए तोड़ने हर सोमवार जाते। महुआर जो सतपुड़ा घाटी में था, उससे दोस्ती पहले पहल हुई। जैसे-जैसे बड़े होते गये जंगलों में उतरना शुरू हुआ। वहीं हमने खरगोश, हिरन, भालू यहाँ तक चीतों और लकड़बग्घों को देखा। देखने का अतीव सुख आपको भीतर तक हरा-भरा करता रहा। प्रकृति का सत्संग एक जुदा अनुभूति थी। पत्तों, फलों, पेड़ों को छूना। किसी शाखा पर बैठकर आम चूसना या जामुन खाना। जीवन का ऐसा काल जब आप ऐंद्रिक रूप से पूरी तरह जवान। फलों के गिरने की ध्वनि मात्रा से दौड़ पड़ते उस दिशा में। हवा का रूख़ पहचानते और जीव जन्तुओं की आवाज़। गाय के खास ढंग से रंभाने मात्रा से आप समझ जाते कि वह अपने बछड़े को पुकार रही। आपके ध्वनि बोध में इज़ाफा होता। आपकी अँगुलियाँ स्पर्शों से वस्तुओं को पहचान लेतीं। आपकी आँखों में सदैव कुछ खोज लेने का भाव होता। आप धूप-छाँह के अर्थ जानते और हवा का संगीत। बारिश की टप-टप करती बूँदों की हो या कि झमाझम जलवर्षा का नाद। आप प्रकृति की पाठशाला में जितना सीखते उतना न तो किताबों से, न फिल्मों से। प्रकृति का स्वभाव प्रकृति के साथ ही रहकर समझ आता। कल्पना इसमें दूर तक आपकी हम सफर नहीं होती।
आज कहने भर को महुआर है। सतपुड़ा का वैसा नैसर्गिक गाना कब का बन्द हुआ। न पेड़ उतने बचे कि हवा झूमे, न नालों में इतना पानी कि मछलियाँ इठलायें। अब बंदरों के अलावा दूसरे जानवरों का जैसा नामो निशान नहीं। लौटता हूँ जैसे उजाड़ में। बच्चों को जंगल घुमाना हो तो कहीं और का रुख करो। देखने-दिखाने, छूने-खाने का सिलसिला जैसे ख़त्म हुआ। भाई की बेटियाँ किताबों में पढ़कर जंगल के बारे में पूछती हैं और मैं उन्हें किसी दिन ले जाने का वादा कर चुपा जाता हूँ। बच्चों ने क्या कुछ खोया है यह जानकर मैं अपने पोरों, तलुओं में छूट गई गुदगुदी, आँखों में बचे रह गये रोमांच और कानों में शेष ध्वनियों को याद करता हूँ...। मैं बचपन के जंगल-महुआर में लौटना चाहता हूँ। जगह-जगह लिखा एक ही बोर्ड हैµ‘आगे खदान का इलाक़ा है। ब्लास्टिंग का समय है। कृपया इसके आगे न जाएँ।’ और मैं ठिठकता हूँ तो जैसे फ्रीज़ हो जाता हूँ...।
(8)
पिसान से उठती सुगँध
    चक्की जैसे शब्द से आज के बच्चों का जैसे कोई वास्ता नहीं। खासकर शहरों में। वे सब सामान घर बैठे बाज़ार से पा लेते हैं। हाथ चक्की का तो वे शायद नाम भी न जानते हों। बचपन में हमने हाथ चक्की का संगीत सुना। घरर-घरर। जैसे एक लय में किसी चट्टान से उतरनी नदी की धारा का संगीत। माँ के घूमते-झूमते हाथ किसी अदृश्य लय में। एक से दाना डालना चक्की के मुख पर। दूसरे से चक्की की मूँठ पकड़कर उ$परी पाठ को घुमाना। दाने के पिसान से उठती सुगंध। चने की दाल हो अथवा गेहूँ, जब पिसता तो एक मादक उष्ण गंध घर के उस इलाक़े को घेर लेती। अन्न से उठती इस सुगंध में मन जैसे झूम उठता। सुगंध का इतना आकर्षक की आटे को मैं ऐसे ही फाँक लेता जैसे प्रसाद या पंजीरी।
    इस सुगँध का मेरे बचपन का दोस्त भुप्पी भी दीवाना था। वह गाँव वालों का दाना पिसाने का काम करता था। इससे उसे कुछ पैसा मिल जाता है। जब वह बिजली वाली चक्की पर जाता तो घंटे-दो-घंटे पिसान के बाद भी खड़ा रहता और तरह-तरह के अन्न-गेहूँ, ज्वाँर, बाजरा, मक्का के पिसते आटे की सुगंध में डूब जाता। वह ताज़ा आटे को बड़े स्वाद के साथ खाता। इस बीच किसी ने कुछ कहा तो जवाब देते समय आटे के कण उसके मुँह से निकलते और वह एकाएक मुँह बन्द कर लेता। आटा फांकते-खाते हुए उसकी आँखों में चमक सी उठती रहती। नथुने आनन्द में फड़कते। और वह एक दूसरा भुप्पी होता सुगंध में डूबा...

(9)
गोबरी रंग के सुख छुई के साथ
बचपन में हम गोबर उठाने जाते। एक लोहे का तसला होता या बांस की सघन टोकरी। गोबर लाने के दो कारण थे। घर के पीछे उपले थोपना और कच्चे घर की धरती को लीपना। शुरू में कुछ दिन गोबर उठाने में जुगुप्सा भाव बना रहा। लेकिन धीरे-धीरे ताजे़ गोबर की गंध मन को भाने लगी। हम माँ के साथ उपले थापते और बाल्टी में गोबर का पानी मिलाके घर के भीतरी कमरों की ज़मीन को लीपते। लीपना एक कला है यह हमने माँ से जाना। गोबर का रंग लिपाई में सब जगह एक सा होना चाहिए। इस तरह गोबर की लिपाई करते हुए, हमने गोबरी रंग के सुख को जाना। आँखों को यह इतना भाया कि एक आत्मीय बिम्ब की तरह बस गया। रंग के अलावा उसकी गँध ने चेतना पर कब्जा कर लिया। लिपाई के बाद जब वह सूखकर अपने रंग और गंध का साम्राज्य फैला देता। घर सचमुच का घर हो उठता और बाहर जाने का मन न होता।
कच्चे घरों में पुताई की एक और गंध का वास होता है। जमीन की लिपाई तो गोबर से होती थी। दीवारों को छुई से पोता जाता था। आज के समय में इसे पुताई वाले चूने का विकल्प कहा जा सकता है। छुई की छोटी-मोटी प्राकृतिक खदानें होती हैं। किन्तु पूरी तरह सफ़ेद छुई की मिट्टी मिलना संयाग से ही होता था। मिट्टी कोमल और चिकनी होे। कंकड़ न हों। इसकी छनाई घर में कठिन होती है। अतः उम्दा मिट्टी की तलाश में हम टेकरियों-पहाड़ियों की शरण में जाते थे। मिट्टी को पहचानने में रज्जो ने हमारी बड़ी मदद की। वह इस मामले में होशियार थी। उसे छुई मिट्टी का स्वाद प्रिय था। वह उसे चुपके-चुपके खाती पाई जाती थी। इसलिए स्वाद का धर्म जान लेने के कारण वह उसे खोज निकालती थी। हम छुई मिट्टी को खोदते, बोरी में भरते और सिर पर उठाये घर लौटकर माँ को अचंभित कर देते।
घर की धरती तो गोबर से चमक उठी। अब दीवारों की बारी। छुई पानी में भिगोई जाती। पोतने के लायक कुछ पतली की जाती। फिर कपड़े के पोतने से स्टूल या कुर्सी पर खड़े होकर पोतने के आनन्द में डूब जाते। नन्हे हाथ एक बड़ी दीवार को पोतकर जीत लेने का स्वप्न देखते। नीचे के हिस्से हमारे हाथ पड़ते। उ$पर माँ के। घर की दीवारें लगभग सफेदी में नहाकर हँसने लगती। आँखों को अपने ही घर का यह मौलिक सौंदर्य भला लगता। एक सुकून। सुन्दरता का। गँध का। शायद इसी तरह हमने घर को सुन्दर बनाते हुए दुनिया के सुन्दर होने की कामना की। हम आज भी इसी प्रार्थना में डूबे हैं।




(10)
नीम से उतरती पाहुनी हवा
पिता का प्रिय पेड़ नीम था। गाँव में एक विशाल नीम के पेड़ तले उनके दोस्तों की जमघट होती थी। खासकर गर्मी के दिनों में ये जमघट नियमित हुआ करती थीं। नीम के पड़े से आलिंगन कर बहती हवा प्राणदायी हुआ करती थी। और खदान में काम करने वाले मजूरों के लिए तो नीम वरदान थी। कहते हैं जितना शुद्ध पर्यावरण अकेला नीम करता है शायद दूसरे पेड़ नहीं। एक और तथ्य कि वैसाख और जेठ की गर्मी की तीव्रता के बीच ही नीम की पत्तियाँ युवा होती हैं। वे गर्मी की तीव्रता को सोखकर ठंडी हवा के झोंके उपहारस्वरूप सौंपती हैं। कहना न होगा कि उन दिनों में न बिजती होती थी, न पंखें। दरवाजे-खिड़कियाँ खुला रखो और नीम से उतरती पाहुनी हवा को घर में बगर जाने दो। हवा समूचे ममत्व के साथ नींद की दुनिया में यात्रा कराने को प्रस्तुत हुआ करती थी। पिताजी के कुछ साथी तो पेड़ के नीचे ही सो जाया करते थे। आज के जमाने में पेड़ के इस दुलार को कौन समझाता है। अब कहाँ फुर्सत और चिन्ता कि कोई नीम आपको पुकारे और आप इसकी छाँह में हो लें। पिता कहा करते थे जो सुख पिता के कँधे पर सवार होने और माँ के आँचल में छुप जाने में मिलता है वही अनुभूति नीम की छाँह में। नीम के पड़े में संगीत का खजाना है। कोयल की कुहुक और चिड़ियों के कंठ से सुबह शाम फूटती रागनियाँ यही पेड़ देता है। चिड़ियाँ यदि अपने सुबह-शाम का ठिकाना इस पेड़ को बनाती हैं। तो इस रहस्य और महत्व को समझना चाहिए। पंछियों की धमनियाँ को ऐसी हवा चाहिए जो उन्हें निरोग रख सके। ऐसा वातावरण कि वे उन्मुक्त चहक सकें। कागा को गाँव में ऐसा समीपी पेड़ कि वह जब बोले तो इसमें पाहुने के आने का संदेश हो। बच्चों के लिए ममत्व का एक ऐसा आसरा हो घर के आस-पास कि काम पर गये माता-पिता की अनुपस्थिति में वे निर्भय होकर खेल सकें। इस पेड़ के पास देने को कई आशीर्वाद हैं। दातून, कोमल पत्तियाँ कई रोगों से लड़ने के लिए छाल, चर्म रोग से मुक्ति के लिए निमोली से निकलने वाला तेल है घाव भरने के लिए, अनाज को सुरक्षित रखने के लिए इसकी पत्तियाँ हैं जो कोठार का अविभाज्य अंग। ऐसे नीम धन्वन्तरी ने हमें कुछ जरूरी आयुर्वेदिक ज्ञान से नवाजा। माँ कहा करती थी कि नीम से दोस्ती जीवन से प्रेम करने के समान है। दमड़ू कक्का नदियों के किनारे के अलावा इसे भी संस्कृति का केन्द्र मानते थे। किस्से-कहानी, गप्पगोई, गाना-बजाना, पंगत आदि इसी पेड़ के नीचे, इसकी अमर अध्यक्षता में संभव होते थे। सावन में झूले भी इसी पेड़ पर पड़ते थे और स्त्रिायों की उन्मुक्त हँसी बस्ती को भर देती थी। अगर कोई आनगाँव की नौकरी पर जाता तो बढ़े-बूढ़े आशीर्वाद देते ‘नीम सा बड़ा हो, नीम का मन पाये।’ क्या हम ‘नीम का मन’ पाने का अर्थ समझ पाये। नीम ने मेरे मन में सौंदर्य का थोड़ा सा उजाला भरा है, मैं उसे हवा के अँधड़ों से बचाए हुए हैं ताकि थोड़ा ही सही उजाले करने में जुगनू सी भूमिका निभा सकूँ।

(11)
सूर्य: बचपन का आनंददायी पाठ
पिता सुबह-सुबह स्नान के बाद सूर्य को प्रणाम करते थे। मैं उनके साथ खड़ा हो जाता। सूर्य को देखता। चाहता कि टकटकी लगाके कुछ समय तक देख सकूँ। लेकिन आँखें पनियाने लगती। सूर्य के बारे में जब मैं पिता से पूछता तो वह कहते, ‘सूर्य समय देवता है, प्रकाश देवता है, प्रकृति के भीतर और बाहर के बदलते रूप, रंग, स्वभाव में सूर्य ही है। उसी के कारण अन्न है, जल है, अग्नि है, परिवर्तन है। एक अकेले सूर्य में सृष्टि को बनाने संवारने के जितने गुण हैं उतने किसी और नक्षत्रा में नहीं। वह धरती का तारणहार है। मैं सोचता बचपन में कि सूर्य न हो तो जैसे सब कुछ रूक जाए। उसके आने पर जागने और जाने पर सोने का जो ज्ञान हुआ, इन्हीं दो आश्चर्य को समझना जैसे सोचने की प्रक्रिया में पहले-पहल प्रवेश करना है।
बचपन में सूर्य की महिमा सुनते हुए मैंने उसे जाना। प्रकाश का महत्व, ताप की गरिमा, उसकी उपस्थिति मात्रा से जीवन चक्र में गति का प्रवेश, संक्राति पर्व पर उसका सांस्कृतिक अर्थ आदि। माँ कहा करती थी बाकी देवी-देवता तो ध्यान में रहते हैं यदि कोई है जो इतना अधिक साकार तो सूर्य है और चन्द्रमा। ये दोनों जो करते हैं सामने है। बाक़ी मन की बातें हैं। अगर इन दोनों के हिसाब से चलो और बड़े-बूढ़ों की बात मानो तो स्वस्थ-प्रसन्न तो रहोगे ही। और यह कम बड़ा वरदान नहीं। जो सूर्य की सुन्दरता समझता है, चन्द्रमा उसके पास अपनी सुन्दरता लिए आ खड़ा होता है।
इन दोनों के किस्से-कहानी, महत्व, भूमिका, अवदान को समझते हुए सूर्य के सौंदर्य को जानना बचपन का आनंददायी पाठ था। मुझे लगता है भीतर अँधेरे से लड़ने की जो ताकत है और उजाले के पक्ष में खड़े रहने की प्रतिबद्धता, वह सूर्य ने दी। मैं उसका आजीवन ऋणी हूँ।

(12)
जल महिमा का गान
मैंनें पार की नदी
कागज की नाव में

बचपन की
इस कला ने
कभी डूबने न दिया
सावन के महीने में पोखर, तालाब, नदी-नाले भर उठते थे। पानी से हमारी पहचान का यह अद्भुत मौसम होता था। हम बरसते पानी में निकल पड़ते। उसे बालों, भौंहों, आँखों, होठों और देह के बाकी अंगों पर अनुभव करते। देह में अव्यक्त रोमांच की लहर दौड़ती। देह की शीतलता का गहरा आभास होता। आज भी नहाते समय पानी के वे पहले संस्मरण याद आते हैं।
पानी की गरिमा के आख्यान हमें बचपन से संस्कारों को देखते-समझते मिले। पेड़-पौधों को पानी देना, सूर्य को जल चढ़ाना, शालिगराम को पूजा के पहले नहलाना, मेहमान के आते ही पानी का लोटा लेकर पहुँचना, वर-वधु के प्रवेश पर सदी द्वारा पानी दरपना, वर-वधु का पानी की परात में अँगूठी खोजते हुए स्पर्श सुख से एक-दूसरे के करीब आना, मिट्टी की मूर्तियाँ गढ़ने के पूर्व मिट्टी को पानी से तैयार करना, कथा-भागवत में पानी से धरती पर छिड़काव कर उसे पवित्रा करना, पूजा के पूर्व पवित्रा होने के लिए पानी का प्रयोग आदि।
जीवन की सुबह पानी के स्पर्श से होती है। हाथ-मुँह धोये या नहाये बिना कोई काम शुरू होता हो, यह देखने में नहीं आता। पानी की इस महिमा को हमारे पूर्वज समझते थे। माँ कहती है देखो यह पानी, हवा और धूप है जो हमारे पास बिन-बुलाये आते हैं हमारे जीवन को संवारने। पानी आसमान से होता हुआ नदी, तालाब, पोखर, झरनों में आता है। वह समूची सृष्टि की भलाई के लिए है। पानी में परोपकार है। वह सबके कल्याण के लिए निस्वार्थ भाव से आता है। हम स्वार्थवश जाते हैं। उसका दोहन करते हैं। पवित्राता को नष्ट करते हैं। और छोड़कर चले जाते हैं। ‘बिन पानी सब सून’ का पद उनकी जुबान पर रहता था क्योंकि दूर-दराज से पानी ढोने का दर्द स्त्राी होने के नाते वह अधिक जानती थी। किसी भी यात्रा में जाती तो नदी का पानी लाने के लिए पीतल का एक ढक्कन वाला पात्रा ले जाना न भूलती जिसे वो ‘गंगाजली’ नाम से पुकारती। उसकी पूजा में जिन लोक देवी-देवता के नाम आते उसमें ‘झिरिया माता’ थी। उसे वह देवी मानती। ‘झिरिया’ अर्थात पानी का एक कुंड उनके गाँव उड़नी पिपरिया में, जो कभी न सूखा। आज भी। अकाल के दिनों में भी उसके सूखने की कोई स्मृति नहीं।
आज हम जलसंवर्धन की बात करते हैं। जल से उतना प्यार नहीं। जितना पूर्वज करते थे और आज बचे खुचे बुजुर्ग। अंदमान-निकोबार द्वीप समूह में वर्षा के संग्रहीत जल से ही गुजारा चलता है। इसलिए खारे पानी के बीच संग्रहीत मीठे जल की महिमा का गान है। वहाँ लोग प्यास का अर्थ जानते हैं। उसकी शिद्दत। वे नारियल पानी और बाँस पानी से कठिन यात्रा में अपनी प्यास बुझाते और जीवन संघर्ष में बने रहते हैं।
बचपन में पानी को लेकर घर में अनेक संवाद स्मरण में हैं। यहाँ तक पानी के झगड़े। कँुए, तालाब पर कब्जा करने के लिए लड़ाइयाँ। आँखों में पानी की कथाएँ रोने, प्रसन्न होने की। देह में सात गुना पानी का सच भी स्कूल में ही पता चला। पेड़-पौधों में पानी की उपस्थिति।
मुझे लगता है संवेदना में जल है। मैं इस जल के भरोसे चल रहा हूँ। मैं चलूँगा कि मैं चाहता हूँ जल बना रहे सृष्टि के कण-कण में...

(13)
संगीत के गुरु-गुरुमाताओं की याद
हमारे इलाके में गोंड जनजाति के लोग अच्छी संख्या में हैं। इन्हें बचपन में हम आश्चर्य से देखा करते थे। बेफ़िक्री और बेलौसपन इनके जीवन में बिखरा हुआ था। गोंड स्त्रिायों के आभूषण अभी भी स्मृति में टंके हैंµचुरिया, पटा बहुँआ, पैरी सतुवा, चुटकी तोड़ा, हमेल, ढार, ढरका, तरकी बारी, टिकुसी आदि। इन आभूषणों की चमक और ध्वनि अब भी कौंध-कौंध जाती है। पुरुष भी आभूषणों में याद आते हैंµचांदी का चूड़ा, कान का बूँदा, गले में मोहर और हाथ में अँगूठी। सजे-धजे गोंडों की निर्मल मुस्कानों में चमकती दंत पंक्तियों का सौंदर्य अब भी पीछा करता है। उनकी हँसी को हम कभी पा न सके। वे हँसते तो उनकी देह के गोदने जैसे नाचते-लगते। उनकी इस मान्यता पर मैं आज भी हैरत में हूँ कि गोदने मृत्यु के बाद आत्मा का शृंगार करते हैं यह अद्भुत कल्पना है जैसे अमर काव्य पंक्ति।
अद्भुत श्रम उनके जीवन का सामान्य गुण है। कभी न थकने वाली चेतना। दिन भर के श्रम के बाद थकान को संगीत में डुबा देने का हुनर और प्रसन्न बने रहने की जुगत कहीं और दिखाई नहीं देती। गोंडों के नृत्य-संगीत को याद करता हूँ तो देेह थिकरनों को आमंत्रित करती है। करमा, सैला, सजनी, भड़ौनी, कहरवा और सुआ नृत्यों की आज भी मधुर स्मृतियाँ हैं उनकी समूची देह ‘राग’ हो उठती थी। सजनी नृत्य की भाव मुद्राओं की अतरंगता और तल्लीनता में युवा जोड़ियों का दुनिया को भूलकर खो जाना जैसे विलक्षण बिम्ब है। दिवाली नृत्य के वाद्यों माँदल, टिमकी, सिंगबाजा, नगाड़ा, मंजीरा, खरताल, ठिसकी, चुटकी, झाँझ, बाँसुरी, अलगोझा, तमूरा, चिकारा और किंदरी के स्वर आज भी मन को घेरे हुए हैं। पाँवों की थिरकन और कंठ से उठते नाद स्वरों की गूंज-अनुगूँज में नृत्य-संगीत से प्रथम साक्षात्कार की अमिट छवियाँ हैं। गुनगुनाते नकल करते हुए धुनों को मन में अबेर लेने की कोशिश ने उनके खजाने से कुछ अब भी बचा रखा है। संगीत के प्रति जितना राग है या कान श्रवण में जितने भी पगे हैं उसके मूल में निश्छल-निष्पाप गोंड़ों के संगीत की छवियाँ हैं और श्रवण बिम्ब। कदाचित इन्होंने मेरे लिखने में बहुत कुछ ऐसा जोड़ा है जो मैं अनुभव तो करता हूँ परन्तु साफ-साफ चीन्ह नहीं पाता। संगीत के उन गुरु-गुरुमाताओं को बस याद करता हूँ। उनके चेहरे स्मृतियों में पूरी तरह साकार नहीं होते। बस वह संगीत है जो गूंजता रहता है।

मालवीय मास्साब, पातालकोट और धरती माँ
भारिया आदिवासी पातालकोट में रहते हैं। उनके छोटे-छोटे से गाँव हैं। स्कूल में 9वीं 11वीं की पढ़ाई के बीच उनसे मिलना हुआ। हमारे एक मालवीय मास्साब थे। वे तामिया में रहने चले गये थे। हम तामिया जाते और वे हमें तामिया घुमाते। पातालकोट के गाँव घुमाने भी ले जाते।
भारिया की यादें अभी भी जैसे ताजा है। छरहरे बदन। नाक चैड़ी किन्तु सुडौल। आँखें बनिस्बत छोटी। स्त्रिायों के अधार पतले। दंत पंक्तियाँ आकर्षक। श्यामवर्ण। गठा हुआ शरीर। देह चुस्त और गतिमय। भारिया पुरुष धोती, कुर्ता, बंडी व पगड़ी पहनते हैं। स्त्रिायाँ लाल रंग की सेंदरी साड़ी और पोलका धारण करता हैं। गोदने से शरीर के अंगों का विन्यास करते हैं।
भड़म, सैतम और करम-सैला उनके प्रिय नृत्य हैं। ढोल, टिमकी, झाँझ, ढोलक व बाँसुरी प्रमुख वाद्य। विशेष यह कि स्त्रिायाँ मंजीरा और चिटकुला बजाते हुए मदमस्त हो सबकुछ भूलकर नाचती गातीं। मालवीय मास्साब के सहयोग बिना उन तक पहुँचना और घुल-मिल जाना कितना कठिन था अब समझ में आता है। विद्यार्थी जीवन में घूमने सीखने की ललक होती है यह मास्साब जानते थे। उन्होंने भारियाओं के घर दिखाये। उनके देवता भीमसेन के बारे में बताया। भारिया बाघ की पूजा भी करते हैं। मास्साब ने दरवाजों पर उकेरे चित्रों से परिचय कराया। बाँस और छिंद के पत्तों से बने सूपे, टोकरियाँ और अन्य कलात्मक वस्तुएँ दिखाई। पेड़ों के छाल से बनी रस्सी देखकर हम अचंभित हुए। छूकर देखा तो मजबूती का पता चला।
सबसे अधिक जिज्ञासा उनके खाद्य पदार्थों की जानकारी पाकर जागी। हमने उन भाजियों के नाम ही नहीं सुने थे देखना तो दूर। छबई, भाड़का, मौसिया और छितावर की भाजी। मैनहर व कातुल की सब्जियाँ। कंद-मूल में नंदमाती, सेतकंद, बरहाकंद, कडुकंद, गोहलारी, ठेंगी, खटवी, भैरों, सुआरूख, बनसिंघाड़ा, महुल, मछारिया आदि। हमें वहाँ उनका एक पकवान खाने को मिला ‘ठेठरा’। आटे में महुआ मिलाकर इसे बनाया जाता है। खूब स्वादिष्ट लेकिन सख्त। महुआ और आम की बीजी की रोटी भी इनका भोजन का हिस्सा है, जो बरसात में इनका आसरा है। मछलियों का शिकार पानी उलीचकर करते हैं व पशु-पक्षियों के आखेट के लिए फंदे बनाते हैं। वनोपज में महुआ, चिंरौजी, गोंद, हर्रा, आँवला, गुल्ली, लाख आदि इनका आर्थिक आधार है जिसे हफ्ते की हाट में बेचकर जरूरती चीजें खरीद लेते हैं।
मालवीय मास्साब ने हमें ऐसे समाज के दर्शन कराये और व्यवहारिक रूप से जीवन का हिस्सा बनाया कि वह किसी स्कूली पढ़ाई से अधिक सार्थक रहा। आज स्मृतियों में जो बचा है वह देखने-सुनने और उनके बीच रहने का नतीजा है। कुछ स्वाद, कुछ सुंगधें, कुछ ध्वनियाँ, कुछ धुनें, संगीत के कुछ विरले वाद्य स्वर स्मृतियों में अब भी छूटे हैं और आदिवासी जीवन के कुछ सघन दृश्य जिसमें वनस्पतियाँ है और पेड़-पौधे। हवा के तीखे अहसास धूप की गर्म स्मृति। कितना कुछ है यादों में आवाजाही करता।
लेकिन एक स्मृति ऐसी भी कि जिसे भूलना नामुमकिन। भारियाओं की डहिया खेती। पाताल कोट की भूमि समतल नहीं है। पहाड़ पर सीढ़ीनुमा या नालीहार खेती होती है। इसमें खुरपी का उपयोग होता है। हल नहीं चलाया जाता। भारिया मानते हैं धरती माँ है। हल चलाकर उसका हृदय चीरना पाप है। बुजुर्ग आज भी हल लाने-बनाने को पाप समझते हैं। हालांकि बदलते वक्त ने परम्पराओं को बदला है लेकिन स्मृति व विश्वास में धरती आज भी माँ है।

‘एक बहुत कोमल तान’ (कविता संग्रह)

समीक्षा µ महेश कटारे
‘एक बहुत कोमल तान’ (कविता संग्रह)
कविµलीलाधर मंडलोई
प्रकाशकµअंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद


आवरण पृष्ठ से आरंभ करना जरूरी लग रहा है जो अपने रंग व दृश्य संयोजन में ही अलग तरह का लगा। पिघलती सी ऊँचाइयाँ...ऊँघती हरियाली के निर्जन में किसी की प्रतीक्षा करता अकेला घर और उसके पीछे बहती नील श्वेताभ जलराशि। भीतर पलटकर पाया कि मुखावरण पर वाॅन गाॅग की परिकल्पना है। अब एक अलग किस्म की कठिनाई दरपेश हुई कि आवरण चित्रा के संदर्भ में भीतर की कविताओं को किस तरह बांचू, जहां दृृश्य में विपुल प्रकृति है जिसके बीच एक घर मनुष्य की उपस्थिति का अहसास भी दिलाता है तथा अस्तव्यस्त उदास प्रकृति के माध्यम से यह आशंका भी पैदा करता है कि घर कहीं सूना न रह जाए। यह आशंका इसलिए भी दहशत में डालती है कि लीलाधर मंडलोई की कविताएं जीवन की तरह पढ़े जाने की कोटि में मानी जाने लगी हैं। यह भी कि मण्डलोई की कविताओं में जीवन प्रकृति से जुड़े बिना अन्य मन एक होने लगता है। आशंका को बल इसलिए भी मिलता है कि इस चरम आधुनिक तकनीकी समय में प्रकृति अब मात्रा चित्रा-स्मृति तक सीमित होने की ओर बढ़ रही है। विकास के लिए अधिकाधिक प्राकृतिक दोहन की लाभवादी अवधारणा ने मनुष्य के लालच को मान्यता प्रदान कर असीमित, आक्रामक दोहन के द्वार खोल दिए। पौर्वात्य दर्शन में मनुष्य के उध्र्वरेतस विकास की अवधारणा है जिसके तहत वह प्रकृति के। सामने याचक बनकर खड़ा हो अपनायापन, सुख व समृद्धि मांगता है और आवश्यकता भर ही लेता है। साम्राज्यवादी सोच ने मनुष्य को स्वामी होने का पाठ सिखाया जिसमें वह प्रकृति से सहचर या याचक भांति मांगता नहीं वरन् छीनता है। वहां के साहित्य में ऐसे साहसी लुटेरों को ‘हीरो’ का दर्ज़ा दिया जाता रहा है। पर प्रकृति के सहने की भी एक सीमा है। मनुष्य का अवांछित, अनियंत्रित प्रकृति-दोहन स्वयं मनुष्य के लिए ही भस्मासुर की भूमिका निभाने को तत्पर हैµ
कहां से आती है इतनी
कार्बन मोनोक्साइड
कि बर्फ पिघलती है
समय से पहले
        धंसकते हैं पहाड़ धीरे-धीरे
        धीरे-धीरे खत्म होता है जीवन।            (कार्बन मोनोक्साइड)
यूं ही नहीं कि इन कविताओं में पहाड़, नदी, झरने, बादल, पक्षी, वनस्पति, पेड़, वर्षा, गर्मी सर्दी तथा बीमार सा बसंत लौट-लौट कर आता है। शहरों, महानगरों की बड़ी, व्यस्त, संपन्न व शायद सुखी भी एक ऐसी दुनिया है जिसे बदलती ऋतुओं, मौसमों का पता मीडिया के जरिये लगता है और इसमें कह उठते हैंµअच्छा! एक दिन हमें मौसम भी मनाना चाहिए। वह संख्या भी करोड़ों से ऊपर जा पहुंची है जो नहीं जानती कि जिस आटे की वह ब्रेड, रोटी सेण्डविच खाते हैं उस गेहूं का पौधा कैसा होता है। देश के भाग्य के निर्णायक वर्ग से आने वाली अगली पीढ़ी दूध के लिए डेअरियों को पहचानती है...गाय भैंस बकरी को नहीं। ‘जिसने पहचान लिया,’ तितलियां जैसी कविताएं हमें स्मृति-लोप की उसी बुनावट के निकट ले पहुंचती हैं। हम प्रकृति, वनस्पतियों के प्रति निरंतर संवेदन शून्य होते जा रहे हैंµ
बगीचे की शोभा और बात
अपनी बाड़ में इसका प्राकृतिक ढंग से फैलना
आपको मंजूर नहीं
        आपका माली आपका हर हुक़्म बजा लाता है
        लो उसने बाहर झांकती डालियों की काट-छांट शुरू कर दी
        टहनियों से बह रहा हैµदूधिया रक्त।           (कनेर और आप)
आज के आदमी ने तो अपनी संतान को भी अपनी इच्छानुसार ढालना शुरू कर दिया है और खुश हो रहे हैं। वन समाप्त होते हैं, उससे पहले वन्य जीवµ
अब किन वनों में होंगे वे
या कि उन्हें उठा लिया
चिड़ियाघरों,
मदारियों ने
कहीं मार तो नहीं दिया
शिकारियों ने।
इन पंक्तियों में कोई त्रास कौंधता है कि हमारी जाॅब-आंकाक्षी संतानें चिड़ियाघरों, मदारियों के हत्थे पड़ती जा रही है, ये शिकारी उनका मनुष्यत्व मारकर मशीन में बदलते हैं। वे विजयी अभिमान अपनी दर्दमनीय लिप्सा में प्रकृति पर वार करने में जुटे है। क्षत-विक्षत धरती की सूखती नदियां, गुम होते प्रपात, मिटते पहाड़, गड़बड़ाता ऋतु-चक्र मनुष्य के इसी लोभी-प्रहार का परिणाम है। अब समझ और संभल जाना चाहिए कि आहत प्रकृति अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करने लगी है। ग्लोबल वार्मिग, सुनामी, नये-नये रोग, महामारियां, जीवन के मूल आधार वायु, जल का प्रदूषण और कमी। प्रकृति पलटवार को सन्नद्ध दिखने लगी है। उसकी मात्रा एक छोटी सी करवट आदमी की अहंसिक्त श्रेष्ठता को अतल में डुबाकर इस जीव की जाति के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। (क्या पता फिर कोई एलियन जाति विलुप्त होती मानव जाति के संरक्षण का उपाय करे।) प्रकृति के इस प्रतिवार को पुश्किन ने ‘उदासीन प्रकृति की शाश्वत दीप्ति’ कहा है। टाॅमस माल्थस ने ‘अवांछित का अस्वीकार’ बताया है। महानगरों में दिनोदिन आकाश की और ऊंचे उठते गगनचुंबी भवनों के चलते यह निहायत सामान्य अनुभव हुआ है कि जो लोग पेड़ों से ऊंचे मकानों में रहते हैं उनकी संवेदनशीलता कम हो जाती है।
इन कविताओं में मां हैµप्रकृति के साथ घुलीमिली, उसका हिस्सा, उसका एक रूप। दोनों इस तरह जुड़ी है कि कवि के लिए इन्हें अलग-अलग कर देखना संभव नहीं लगताµ
मां हमें अक्सर बताती
कि पेड़-पौधों से प्रेम करो
उनमें मनुष्य सरीखा जीवन है। (छुईमुई)
बहुत सीधी बात है कि मात्रा मनुष्य से ही जीवन नहीं चल सकता। कवि की ‘मां’ बंगले के लाॅन में बैठ सुखद स्मृतियां चुभलाती विज्ञापनी मां नहीं है। संग्रह में एक छोटी सी कविता हैµ ‘त्यौहार का दिन’µ
‘आज त्यौहार का दिन है
आज मां घबराई हुई है’
इन पंक्तियों के साथ ही एकाएक ‘ईदगाह’ कहानी की दादी अमीना और बालक हामिद का स्मरण हो आता है। दादी जिसमें अभावों के बीच जीने की आदत और जूझने का संकल्प है तथा हामिद जिसमें अभावों के होते हुए भी आशा का प्रकाश है। इसलिए इन कविताओं में मां के दूध से उतरते जीवन का प्रकाश दिखाई देता है। इस प्रकाश वृृत्त में सुख-दुख के साथी दोस्त हैं, रचनाकार कलाकार हैं तथा विडंबना आत्मानुभव भीµ
‘यह क्या हो गया है मुझे
कि हर वक़्त इतना सावधान
बोलने में
लिखने में
खड़े होने और बैठने तक में
        इतना डर कैसे चला आया’  (सावधान)

मैं सूत हूं
इस तरह नीच कुल का
....
मैं कारीगर
मैं रथकार
मैं कवि
...
...
अपमान और हत्या को स्मरण करता
मैं सिर्फ चुप हूं
मेरा चुप होना हार जाना नहीं है। (सूत)
कविता का मोर्चा यहां तीन जगह खुला हैµएक प्रकृति को बचाने अर्थात्् प्रकारांतर से पूरी सभ्यता को बचाने का। दूसरा सांस्कृतिक दायित्व का मोर्चा जहां किसी भी रचनाकार को लड़ना ही पड़ता है। तीसरा ‘स्व’ अस्तित्व व सम्मान का। इस प्रकार ‘एक बहुत कोमल तान’ की कविताएं व्यक्तिगत अनुभव से सामाजिक अनुभव तक सेतु बनती कविताएं हैµअर्थ संकेत में विस्तार और व्यापकता सहेजती हुई। यहां कवि ने सहज सौन्दर्य के अमीप्सित प्रतिमान भी गढ़े हैं। वृक्ष व मां के सायुज्य की कविता हैµअरंडी। मुझे नहीं लगता कि भद्र नागरी सौन्दर्य बोध में अरंडी को कहीं जगह मिली हो। सुन्दर तो इस वृक्ष को ग्राम-जीवन में भी नहीं माना गया पर स्थान बहुत निकट का मिला है क्योंकि यह बहु उपयोगी है। अरंडी के बीज का तेल स्वयं औषधि होने के साथ अनेक औषधियों से मिल उत्प्रेरक का काम करता है। चोट लगने अथवा सूजन पर इसी के पत्ते पर इसी का तेल चुपड़ गुनगुना बांधा जाता है पुल्टिश चढ़ाई जाती है। पीलिया की अक्सीर दवा है अरंडी। तेल से धूमरहित प्रकाश किया जाता है। लकड़ी या तने से छप्पर छाये जाते हैं। कविता रेखांकित करती है कि सौन्दर्य आकर्षक रूप रंग में नहीं उस गुण में निहित है जो अधिकाधिक लोगों के काम आ सके हैं।
µमां कहती कि वह मनुष्य सेवा में निमग्न
एक दुर्लभ उदाहरण है दुनिया में
वह अब याद करती थी उसे
बिछड़े भाई की तरह
और ढूंढती फिरती थी हर उस शहर में
जहां-जहां मेरा तबादला हुआ।  (अरंडी)
आत्मासक्ति से मुक्त सौन्दर्य लोक (मंगल) से जुड़ता है। लोक ने शास्त्राीय सौन्दर्य को सराहा अवश्य है पर अपनाने के लिए जीवन-सापेक्ष सौन्दर्य प्रतिमान गढ़े हैं। अतः यहां कला उल्लास, अवसाद, अनुताय औदार्य की सहज अभिव्यक्ति बनकर दूब की तरह उमगती हैµरोपे जाने पर दूब में ओप नहीं आता।
संग्रह की कुछ छोटी छोटी कविताएं इतनी बेधक हैं कि मण्टो की कहानियों की तरह मष्तिक में किसी कील सी गड़ जाती हैंµ
मैंने देखा
वो कत्ल
मैं गूंगा
मैं सर झुकाए चलता हूं (गूंगा)
बस इतनी सी है यह कविता जो आज के समय की पोच मानसिकता को उघाड़कर रख देती है। क्या यह पूरी कविता, बड़ी या उससे भी कुछ अधिक नहीं है? एक अन्य कविता हैµ‘और रात में’ जिसमें एक अकेली विधवा स्त्राी रातभर स्वयं को अपने दुख की आंच में तपाकर दुनियावी संघर्ष के लिए खुद को तैयार करती हैµ
घर के पिछवाड़े एक झोपड़ी
वहां एक परछाईं है
जो रात गए रोती है
        वह तो एक बेवा की झोपड़ी
        जो तेज-तर्रार बहुत
        इतनी कि उसकी मर्दानगी के किस्से बहुत। (और रात में)
संग्रह में कुछ लंबी कविताएं भी हैµइस तरह पहली बार, चिट्ठियां, स्वाद के अनंतिम शिखर पर, वह एक कलंदर (वेणुगोपाल के लिए) स्मृतियां माला के धागे की तरह संग्रह में ओर से छोर पैठी हैं जो कवि को प्रायः लोक की ओर ले जाती हैं जहां वह ‘कविता के लिए कच्चा माल’ अबेरता है। क्या इसलिए कि अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा खजाना हर लोकभाषा में मौजूद होता है। लोकभाषा कभी मरती नहीं। अपने आप में संशोधन करती रहती है इसलिए बड़े रचनाकारों में हमें लोक मुहावरे की समृद्धि मिलती है।
किसी कवि की कविता को हम उसके जीवन, परिवेश, विरासत, अतीत तथा समकालीन स्थितियों की समग्रता में एक अंश की तरह परखते हैं। वह अंश नहीं जिसे विरासत ने बांधकर निष्क्रिय बना दिया हो। (रचनाकार मृत संसार का उत्तराधिकारी नहीं है) कोई जिम्मेदारी कवि स्मृति व अतीत का उपयोग न सिर्फ अतीत ही बदलने बल्कि वर्तमान को भी बदलने के लिए करता है। ‘एक बहुत कोमल तान’ की कविताओं का मर्म जीवन के साथ तौल, कसकर ही परखा जा सकता है। कवि ने कटु संघर्षों के दौरान स्वयं को नये सांचे में ढालते हुए कविता को पाथेय की तरह चुना है जिसमें पारिवारिक प्रेम से आलोकित कविताएं भी अपनी गहरी सादगी के साथ उपस्थित हैंµवेदना बीच इच्छा शक्ति की भांति। भारतीय श्रमिक के जीवन से नाभि नाल बद्ध ये कविताएं प्रतिभा को व्यर्थ-संघर्ष की वेदी पर चढ़ाने वाले इस समय में ‘एक बहुत कोमल तान’ बचाने का संकल्प लेती हुई यह संकेत भी देती हैं कि निरंकुशता कितनी ही क्रूर, आक्रामक क्यों न हो उससे लड़ने के साधनों व इच्छाओं का अभाव नहीं है।
प्रसंगवश यह ज़िक्र जरूरी है कि लीलाधर मंडलोई के दो और संग्रह हैं ‘लिखे में दुक्ख’ और ‘महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने’। ये क्रमशः राधाकृष्ण और मेधा बुक्स से प्रकाशित हैं। दोनों संग्रह इस अर्थ में विशिष्ट हैं कि भाषा फाॅर्म और कहने के स्तर पर कविताएँ निजता मौलिकता के धरातल पर जोखिम उठाती हैं। ‘लिखे में दुक्ख’ मैं दो से चैदह पंक्तियों वाली कविताएँ लघु सघन स्वरूप में हैं और सूक्ति की काया में। ये कविताएँ भाषा को इधर के समकालीन सायास भार से मुक्त करती हैं। अत्यंत संप्रेषणीय। स्मृति में रह जाने वाली। ‘क्वोटोबेल क्वोक्टस’ की भांति पारदर्शी और सरल हैं। इनमें दार्शनिक वाक्यों का प्रकाश है। सिर्फ एक उदाहरणµ
मेरे लिखे में
अगर दुक्ख है
और सबका नहीं
मेरे लिखे को आग लगे (पृष्ठ 92)

‘महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने’ का ब्लर्ब महाश्वेता देवी का लिखा है। उनकी पंक्तियाँ हैंµ‘सुभाष मुखोपाध्याय से लेकर वीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती का मानना है कि महान कविता वह है जो हमारे सुख का समर्थन करे, संग्राम को साहस दे और शोक में सांत्वना दे। इस कसौटी पर मंडलोई की अनेक कविताएँ खरी उतरती हैं। कदाचित इसीलिए हिंदी कविता की समृद्ध परंपरा के वे ऐसे हिस्सेदार हैं जिनके बगैर समकालीन हिंदी कविता की मुकम्मल तस्वीर नहीं बन सकती। समकालीन हिंदी कविता का अद्यतन रूप और चरित्रा बनाने वालों में मंडलोई भी हैं।’
महाश्वेता देवी के विचारों के आलोक में बतौर उदाहरण एक काव्यांशµ
निर्वासन के बावजूद
हम आत्मनिर्वासित नहीं
पृथ्वी को अपना घर समझने वाले
असंख्य लोग हैं और बेआवाज नहीं
इनमें बोलता है मुल्क
और मुल्क को हराना
इतना आसान नहीं
कुल मिलकार यह कहना समीचीन होगा कि लीलाधर मंडलोई समकालीन कविता में एक ऐसा नाम है जिनका लिखा परम्परा की शक्ति, आधुनिकता की समझ और नवसाम्राज्यवाद के खतरों से रूबरू होता हुआ, सृष्टि को अपनी निजी भाषा और मुहावरे में मूर्त करता है। यह रास्ता संघर्ष और जोखिम का है और मंडलोई उसी पर चलते हैं, जो इधर विरल होता जा रहा है।

जिस तरह घुलती है काया

(1)

उन दो कासनी पत्तियों के बीच
उगता एक गुलाब है
अपनी पंखुड़ियों में बंद
बहुत कोमल
कि जिसपे होंठ मेरे

मैं अपने होठों को
कहाँ रखूँ
किसे चूमूँ
गुलाब बेइंतहा खूबसूरत है
मैं खोलता हूँ पत्तियाँ जो सांवली घनेरी

इनके भीतर उतरकर देखता हूँ
रोशन जहाँ इक
वहाँ मेरे होठ पहले से धरे

मैं घबराया इस असमंजस में
मैं अपनी देह से खोये
वो होठ ढूँढता हूँ, हारता हूँ

(2)

जिस तरह घुलती है काया
घुल न सकी

रूह में कुछ और था
एक हो न सके

(3)

तुम जिस्म में डूबी
मैं रूह में अपनी

ये जिस्म
रूह के पानी में अवाक डूब गया

(4)

मेरी निगाह से देखो
नज़र है ये तुम्हारी

मैं कोई और नहीं
कि दिखाई न दूँ

(5)

खिल उठे
देह पर दो सांवले गुलाब
इनका आस्वाद अनोखा इतना
कि सारे अल्फाज़ सिफर

मैं हार गया लिखते हुए
अब लिखना क्या?

(6)

समंदर समो लेता है
नदी को अपने भीतर

तुम नदी होते-होते खो गई
मैं इंतजार करते हुए

(7)

कभी हाज़िर हो हम
कभी गै़रहाज़िर

बस इसी तरह
ये उम्र फ़ना होती रही

(8)

मेरी रूह में
तुम
तुम्हारी परछाईं
और उसकी रोशनी

इतनी पाक
कि ख़ुदा की नेमत

मैं तुझमें डूब गया
ख़ुदा मुझे अब माफ़ करे!

(9)

केबड़े की गंध लाफ़ानी
उठती है बदन से

इसमें तुम्हारा नहीं
धरती का होना है सुखद

तुम धरती हुईं
फिर गंध धरती की
कि केवड़े सी मादक अब

तुम्हें मालूम कब
मैं इसमें डूबा हुआ

मेरे इस डूबने में
उस पार जाने की इबारत है

मैं इक नाव में हूँ
जो हवा में तैरती है

झुका लेता था उठा सिर

इतना पत्थर दिल ज़माना होगा
        मुझे मालुम न था
दस-बारस बरस का मैं
        मांजने का काम करता था
धुले हुए बर्तन लगाके झूठ सकरन
        पटक दिए जाते थे फिर-फिर
        या फिर कम चमक का बहाना
उन दिनों राख थी बस जिसे महीन छाने बिना
        रेखाएँ उछर आती थीं उन पर
        और फिर काम करना मुहाल
बावजूद इन तमाम हालातों के
        न होता था कोई चारा
        कि इतना सख़्तजान होना था
        कि सी लेना था ज़ुबान जबरन
        सुनते हुए झिड़कियाँ, गाली-गलौच
        और तमाचे नन्हें गालों पर
फ़िक्र में माँ-पिता थे जिन तक
        शिकायत हो जाने का डर
        कि जो आला इंसान थे
        मुसीबत में
        जो ख़ाक से उठकर बने थे
सो यह सोचता कि गुस्सा बर्फ़ हो
        झुका लेता था उठा सिर
        और साफ़ बर्तन को
        दुबारा
        मांजने चमकाने लगता था

चरवाहा मन

खो गयी एक धुन
    बचपन की
सारा मधुर धुन
बंधा था जिसमें मेरा मन
    कहूँ चरवाहा मन

गया वो श्याम रंग
कि जिसमें लाज की पोशाक तज
    कोयला तोड़ता था
हारों-पहारों से बना अटल विश्वास
    अब कांपता है
जबकि उन दिनों कुछ न था घर में
    यहाँ तक दो जून की रोटी
और यही मन धेनु-शिशु सा
    जंगल नाप जाता था
था इतना पक्का कि अंतड़ियाँ सूखने पर
रगों में दौड़ता था ख़ून
    बसैती हवा सा
कितने अपमान
कितनी जिल्लतें थीं रोज़
तिस पर भिड़ जाता था उन सबसे
जिनकी तिजोरियों में
    बंद थी घर की ख़ुशी
पिता की मूँछे
माँ का गर्वीला मस्तक
बहन का सुहाग

और भाई का मँहगा इलाज़ कि वो पागल था
इधर अब नौकरी ऐसी कि हूँ सरकारी नौकर
बँधा इक इस सहारे से
और इतनी जिम्मेदारियाँ
    हलकान-परेशान मैं
    उठता हूँ लड़ने को
    तो बस पाँव हो जाता
छोड़कर सबको बेभरोसे लौटना कितना कठिन
अँधेरा है घना और सभी रास्ते ग़ायब
    दुश्मनों के अट्टहास में डूबी रात
वही चरवाहा मन
वही सादा मधुर धुन
जो आती है लोट ऐसे में
उससे इस रात को दिन किये
    जीता हूँ फिर
इतना बेढब, इतना बेउम्मीद और तवील है यह
    लिए खुद्दारी और
    बचाए रीढ़ अपनी
    चलता हूँ जो इस रास्ते पे
    तो वह बोल उठता है
    कि ना उम्मीद न हो...
    रूह की पाकीज़गी में रह
    रूह की गर्मी है जवाब हर मुसीबत का

मैं हर बरस लौटता हूँ


(1)

बिन चाहते
हम खड़े हैं
किनारों पर
बीच में नदी बह रही है

(2)

पहनी हुई वर्दी
उतारकर
कहा उसने
आज मैं छुट्टी लूँगा

आज मैं गोली नहीं चलाऊँगा

(3)

मैं हर बरस लौटता हूँ
धरती के इस टुकड़े पर
जहाँ ईंट के भट्टे लगे हैं

पहलेे यहाँ मेरा खेत था

(4)

तुम समोसे खाते हो गपागप

समोसे खाना
सिर्फ सुधीर जानता हे

उसे आती है भूख को
जीतने की कला

(5)

खाने का स्वाद
संजीव कपूर से पूछो

भूख का स्वाद
जानता था जो

अभी-अभी मरा है

(6)

मैं हिन्दी का लेखक हूँ

मेरे बच्चे अंग्रेजी पढ़ते हैं

(7)

ईश्वर क्या है
एक दुकान

कितने धर्मों से
अपना सफल व्यवसाय करता है
ईश्वर का धन्धा कभी घाटे में नहीं चलता

(8)

मैं सब्बल हूँ
मैं गैंती
फावड़ा मैं
मैं बेलचा हूँ
मैं क्रांति का हथियार हूँ

(9)

इंटक यूनियन

दलाल है?
खदाने घाटों से पट गई हैं

(10)

हड़ताल पर पाबंदी है
हड़ताल विकास के विरुद्ध है

हम जेल जाने को तैयार हैं

(11)

मैं आदिवासी खदान से निकली
मैं काली हूँ

सुंदरता की पहचान में
ईश्वर चूक गया

(12)

मेरा मूल्य है
मुझे लाया गया
मैंने नारे लगाये

नारे झूठे थे

झूठ की क़ीमत से
मैंने आज रोटी खायी

(13)

मैं चोर हूँ
हत्यारा हूँ
मैं बलात्कार में प्रवीण हूँ

मैं टिकिट प्रार्थी हूँ

(14)

युद्ध जीतने से
ख़त्म नहीं होगी
यह जाति की लड़ाई है

(15)

जहाँ-जहाँ
दुनिया में बसे हैं वे
एक सुर हैं
ब्राह्मण एक हैं दुनिया में

(16)

मैं गाँव से आया था
सब कुछ लुट जाने के बाद

उन्होंने मुझे नौकरी दी
नौकरी के पैसों में
दो जून की रोटी थी और एक सपना

मैं कभी गाँव न लौट सका

(17)

मैं स्त्राी हूँ
सौंदर्य का
अंतिम प्रतिमान

मैं प्रकृति
मैं ईश्वर की माया नहीं

(18)

मैंने गुफाओं की देह पर
रचे जो चित्रा
अब तक अमर हैं

तुम्हारे चित्रों के लिए
ईश्वर तुम्हें क्षमा करे

(19)

तुम्हारी उस बही पर
लिखा है जो
सब जानते हैं

कहाँ है तुम्हारी आत्मा की बही

यह जानने में हर बार भूल हुई
हर बार बिका एक और खेत

(20)

तरह-तरह की छेनियाँ
एक हथौड़ी
और एक जोड़ी कुशल हाथ

एक नयी दुनिया
कभी भी बनाई जा सकती है
(21)

नटिनी के पाँवों में चमत्कार है
लोग उसका
चलना नहीं

फिसलना देखना चाहते हैं

(22)

शांति के लिए,
तुम लाये कबूतर
और 21 तोपों की सलामी

कबूतर नहीं बचे
शांति के लिए कई 21 तोपे हैं

(23)

सब कुछ मिलता है
इस बाज़ार में

पानीदार मनुष्य नहीं मिलता

(24)

साड़ियों पर ढाले ये रंग
हमने वसंत से लिये

रंगों में उतरने का हुनर तुम क्या जानो

(25)

एक तरफ़ ख़जाना था
एक तरफ़ लोग

लोगों के हाथों में दरातियाँ थीं

(26)

कफ्र्यू में जब
बाहर निकलने पर
गोली मारने का हुक़्म था

एक पागल सड़क पर दौड़ रहा था
गालियाँ दे रहा था खुले-आम

(27)

बहस के लिए
एक-दूसरे में प्रतियोगिता
और यह संसद नहीं

यहाँ बकवास नहीं हो रही थी

(28)

बीर बहूटी से रक्तिम अधर

नहीं-नहीं
ये तुम्हारी लिपस्टिक से उतरा रंग नहीं

(29)

तुम्हें चाहिए
डाॅक्टर द्वारा प्रमाणित
टूथपेस्ट

मैं पुरखों द्वारा रजिस्टर्ड
दातून करता हूँ

(30)

मैं वो स्त्राी हूँ
जिसके भाग्य में
ससुराल नहीं

मैंने कोख में नाचना शुरू कर दिया था

(31)

उसका जल
दूसरे समुद्रों की तरह है

उसे ‘काला पानी’
गोरों ने बनाया।

(32)

मैं कौन हूँ
पूछा एक स्त्राी ने

कहा उसने
हँसी-ठिठोली का सामान

(33)

वह ताउम्र का
अँधकार है

वह भोर की कविता लिखती है

(34)

हमें भूख लगी थी
और प्यास

‘महुआ’ का पेड़
टप-टप करता हुआ

दौड़ कर आया हमारे पास

(35)

मैं खूँटे से बँधी
अधज कड़ी
परछाईं हूँ

मैंने गिरमा काटना1 शुरू कर दिया
1. पशुओं के गले में बाँधी जाने वाली रस्सी

(36)

स्वीकार किया मैंने
जिस दिन उसे पति

मेरी गुलामी की कथा आरम्भ हुई

(37)

यह सुरक्षा की बेड़ियाँ हैं
मैंने इन्हें पिघलाना शुरू कर दिया

(38)

मैं बटखरा हूँ
यह बाज़ार
मेरे बिना चल नहीं सकता

(39)

तुमने क्या देखे
‘आँसू’

मैंने किसान की आँखों में
बादल देखे

(40)

रूप की हाॅट में
गाये जाते हैं जो गीत

उनमें चिड़ियों के कराहने की
आवाज़ सुनाई देती है

(41)

चोरों का कोई ईमान नहीं होता
कहनात है पुरानी

हिस्से-बँटवारे में
उनका ईमान अटल है

इस पर किसी को संदेह नहीं

(42)

जानवर धोखे से मारने की
कला नहीं जानता
उसके चलाक़ी भरे आक्रमण को
जानते हैं जंगल के जीव
मनुष्य के बारे में
यह क़िस्सा आम है
कि वह हमेशा धोखे से वार करता है

(43)

हम डरते हैं जिस समंदर से
मछलियाँ
उसी से इश्क़ करती हैं

मछलियाँ
कितनी छोटी सामने उसके
यहाँ तक विशालकाय व्हेल

इश्क की कोई सीमा नहीं

(44)

खिले हुए फूलों में
पत्तों में
डूबने वालें

देखो, यह जो पत्ता झरा हैं
अभी-अभी
वसंत की आमदा के लिए
त्याग का अनुपम उदाहरण है

(45)

कुछ यादें
जीवन काल में अमर बनी रहती हैं

पिता के गुजर जाने की
धुँधली याद
अमर है

(46)

ईंट, गिट्टी ढोते हुए
बेडौल हो गया है यह तसला

कितने दिनों से
बजाना इसे बंद हुआ
एक उम्र से जैसे
माना मैंने बंद किया

(47)

दीवार नहीं चाहती
अपनी देह पर
कोई विज्ञापन
कोई झूठा पोस्टर

सूनी दीवार की आवाज़ से
ज्यादा असरदार कुछ नहीं

(48)

बाज़ार से ख़रीदी गयी उ$न से
बने स्वेटर के
एक-एक फंदे से
उभरती ख़ूबसूरती में
अनुभव है उँगलियों का

इसकी तुलना करना
अपमान है प्रेम का

(49)

चुप्पी का अर्थ
कायरता नहीं

वह स्त्राी कभी भी बोल कर
हतप्रभ कर सकती है

(50)

मेरी हँसी का रंग
स्याह है

कभी देखा आपने?

(51)

बाज़ार एक जाल है
हम उनकी मकड़ी नहीं
हम मुक्ति के गायक हैं
बाज़ार हमसे डरता है

आत्मा पर इस बोझ को लिए मैं

आत्मा पर इस बोझ को लिए मैं
लीलाधर मंडलोई
   
वह हम सबसे अधिक सुन्दर था और मासूम गेहुँआ रंग। लंबोत्तरा। बड़ी-बड़ी आँखें। उसकी मुस्कान को देखते हुए कृष्ण याद आते। उसे घर का हर सदस्य अपनी गोद में रखना चाहता। एक झोपड़ी में उसका जन्म, एक आश्चर्य मिश्रित आनंद था। इतने सुन्दर-सलोने बच्चे बड़े घरों में पैदा होते हैं, ऐसा तब हम सोचा करते थे। हमारे इलाके में गुजराती बाबुओं की एक काॅलोनी थी पक्के मकानों वाली। इस कालोनी में जहां एक तरफ बड़े बाबू और अफसर रहते थे तो दूसरी तरफ बंगलों की कतार थी जिसमें खदान के मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर आदि रहते थे। उन बंगलों में हमने गोरी स्त्रिायों और सुंदर बच्चों को टहलते हुए देखा। यदि हमारे इस भाई को उन बंगलों के लाॅन में छोड़ दिया जाता तो वह उन सबसे अधिक सुंदर व आकर्षक लगता।
हमारे इस भाई को हम घर में मुन्ना पुकारते। राशि का नाम हुआ ओम प्रकाश। वह बहुत कम रोता। लेकिन हँसने-मुस्कुराने की कोई सीमा न थी। माँ उसके आने से बहुत खुश थी। पिता की मूँछें कुछ और उ$ँची हो गयी थीं। जीजी के लिए मानो वह खेल का सामान था। वह घर में जब होती तो उसकी होकर रह जाती। स्कूल के बाद हमारे समय को भी उसने काफी हद तक चुरा लिया था। हमारे दोस्त भी उससे मिलने आ आते। देखा जाए तो झोपड़ी में पैदा होने के बाद भी वह राजदुलारा था।
समय को उन दिनों पँख लगे थे। देखते-देखते वह तीन साल का हो गया। दीखने में और अधिक आकर्षक। आँखों का आकार कुछ और बड़ा हो गया था। होंठ अब अधिक उभर आए थे। उनका रंग सुर्ख था। वह घुटने के बल दौड़ने लगा था। उसकी चपलता देखते बनती। वह सबके पीछे घुटनों पर भागता रहता। उसकी हँसी में पूरा माहौल डूबा रहता। हम चाहते कि उसमें बाकी नैसर्गिक सौंदर्य भी खिल उठे। जैसे उसका बोलना। लोग कहते उसकी बक (वाणी) अभी नहीं फूटी। वह सिर्फ एक शब्द बोल पाताµमाँ।
वह चार के बाद पाँच साल का हो गया। लेकिन बोलना शुरू नहीं हुआ। सभी परेशान। जामई तहसील में एक डाॅक्टर था। सरनेम शायद भट्टाचार्य। वहाँ उसे ले गये। उसने दवाइयाँ दी। फीस वसूल की कई बार। कोई फायदा नहीं। माँ ने अब चुपके-चुपके रोना शुरू कर दिया। बस्ती के लोग उसे बौरा (गूँगा) पुकारने लगे। इसी तरह एक साल तरह-तरह के इलाज में बीत गया। इस बीतने में शामिल था घर की खुशी का बीतना। सभी की हँसी का बीतना। वह बोल नहीं पाता, यह एक भयावह आघात था। माँ उसके सभी काम में ज्यादा वक्त लगाने लगी। नहलाना-धुलाना शौच आदि। वह कभी भी, कहीं भी पेशाब कर लेता। पाखाना भी कपड़ों में कर देता। शुरू-शुरू में इस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। लगा जैसे यह सामान्य बात हो। समय के साथ यह ठीक हो जाएगा, इस उम्मीद में दिन सरकते गये। लेकिन जब यह रोज का काम होने लगा तो मानो पूरे घर पर चिंता के बादल। यही बातचीत कि कहीं यह मँद बुद्धि तो नहीं। फिर उसके स्वभाव और हरकतों को पढ़ा जाने लगा। जैसे उसका अनवरत् मुस्कुराना। जिस मुस्कान पर सभी न्यौछावर थे, उससे एक खीझ सी होने लगी। ‘मुन्ना’ शब्द जब कोई उचारता, वह पलटता और मुस्कुराने लगता। वह लगभग झपटके आता और पाँवों से चिपट जाता। पहले उसके चिपटने में आनन्द की अनुभूति होती और इधर एक खीझ जो चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती थी। वह अब भी गोद में बैठने को ललकता-झपटता लेकिन लोग किनाराकशी करते कहीं वह पेशाब न कर दे। उसके चेहरे पर अब उसकी अनदेखी का दर्द झलकने लगा था। उसके संसार से बाहर के लोग अब दूर हो रहे थे और घर के चंद लोगों के बीच उसका होना था जिसमें अनदेखी, उपेक्षा और दूरी का बनता एक अनचाहा माहौल था। वह अब घर को कुछ चीजों का हो गया था जिसमें बर्तन थे जिन्हें वह बजाया करता। सांकल जिसे वह खड़खड़ाता। अपने गले से अजीब सी आवाजें निकालता और उनमें खोया रहता। अपनी सुध-बुध खो देने की विकट स्थिति में वह अपनी पेशाब से छप-छप की आवाज के साथ खेलता। एक किशोर होते बच्चे को इस स्थिति में संभालना अब एक दुष्कर कार्य था। माँ-पिता काम पर जाते समय, अब बाहर से दरवाजा बंद करने लगे ताकि वह सड़क पर निकलकर किसी गाड़ी से टकरा न जाए। हम घर पर उसके साथ अब एक कठिन समय बिताते। वह चाकू, फावड़ा, गेंती कुछ मिल पाने पर जमीन खोदने लगता। रोज कुछ-न-कुछ खुदा हुआ सामने होता। वह कुछ न कुछ ध्वनियाँ या
आवाजें  अपने पास चाहता। अगर किसी बोलने की आवाज सुनाई न देती तो वह बैचेन हो जाता। उसकी मुस्कान अब मुरझा रही थी। उसके हँसने में अब रोने की आवाजें अधिक थीं और इतनी मर्मभेदी कि हम बाज-दफा रो पड़ते और उसे बहलाने का यत्न करते। वह घर में माँ के अलावा सबसे भीतर ही भीतर दूर जा रहा था। हमारे भीतर ममता और वात्सल्य की भावना में जो कभी आ चुकी थी, उसे वह पहचान रहा था। इसलिए वह माँ के लौटने की प्रतीक्षा करता। माँ के आने पर उसका जीवन एक फूल की हँसी सा खिल उठता। उसके आने पर उसके उत्साह, प्रेम और आनंद को देखकर हमें माँ के होने का ईश्वरत्व पता चलता। कोयले के खदान सी निकली काली घुस्स माँ की आवाज पर ऐसे भागता-लगता मानो कमान से छूटा तीर। वे माँ-बेटे के मिलन के दृश्य ऐसे थे कि जिन्हें मैंने न कहीं पढ़ा, न किसी फिल्म में देखा। एक गहरा मौन, डबडबाती आँखें, आँखों में ऐसा उत्कट प्रेम, अधरांे की थरथराहट, गले का रुँधना, साँसों की आवाज, बेसाख्ता बेटे को अंक में भरने और चूमने का दृश्य और कोयले की धूल से अटेचेहरे पर आँसुओं की बहती बेतरतीब धार...वह प्रेम का कोई ऐसा अमर दृश्य था जिसे हजारों बार देखने के बावजूद, न उसे पूरी तरह लिखा जा सकता है, न फिल्माया जा सकता है...केवल वही क्षण थे जब भाई का गूँगा, मँद बुद्धि होना माँ शायद भूल जाती थी...वह बस एक दैवीय स्त्राी की तरह लगती थी तब...। बाद में आँसू पोंछती हुई उसे साथ में लिए पिछवाड़े जाती हुई, कब वह एक घरेलू स्त्राी में तब्दील हो जाती थी पता ही नहीं चलता था...



केदार की प्रगतिशील ऐंद्रिकता का लोक-आलोक 2

वीरगाथा काल के बाद भाषा बोलचाल के समीप आती है और दिल्ली के अमीर खुसरौ और तिरहुत के विद्यापति भाषा को असल बोलचाल का रंग प्रदान करते हैं। इनके यहाँ भी शृंगार का भाव और प्रेम (मूल्य रूप में) देखते बनते हैंµ
            (1)
    मोरा जोबना नवेलदा भयो है गुलाल।
    कैसे गर दीनी कक्ष मोरी माला।।
                    (खुसरौ)
            (2)
    सूनि सेज पिय खालई रे
    पिय बिनु बिन घर मोए आजि।
    विनति करहु सुसहेलिन रे
    मोहि देहि अगिहर साजि।।
                (विद्यापति)

    केदार जी की प्रेम कविताओं को लेकर प्रारम्भ में कई तरह से दबी-छुपी ढंग की चर्चा हुई। जिसमंे आलोचना का भाव था। इस लेख में केदार जी की विशिष्ट ऐंद्रिकता या सौंदर्य चेतना पर अपनी बात को रखने के पूर्व मैं परंपरा से कुछ पाने का यत्न कर रहा हूँ। संस्कृत साहित्य के बाद हिंदी साहित्य का इतिहास भी हमें बताता है कि ‘काम चेतना’ कवि के लिए अनिवार्य धातु की तरह है। डाॅ. राम विलास शर्मा परंपरा के आलोक में ही उन्हें ‘काम चेतना का आंचलिक कवि’ कहते हैं। यह चेतना ही उन्हें प्रेम, प्रकृति और सामाजिक यथार्थ को कविता में लाने के लिए प्रेरित करती है।
    पूर्व मध्यकाल की निर्गुण और सगुण धारा में भी प्रेम और शृंगार के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं। वे अध्यात्म के आवरण में हैं, पर उनकी व्याख्या में उसे कोमल हृदय से आती अभिव्यक्ति है, उसे पढ़ा जा सकता है। विशेषतः प्रेम मार्गी (सूफी) शाखा में मंझन का जिक्र ज़रूरी है जिसने ‘मधुमालती’ की रचना की। इसमें राजकुमार मनोहर और राजकुमारी मधुमालती के प्रेम का वर्णन है। ‘पदमावत्’ के पूर्व मधुमालती की कथा कई कवि करते हैं। ‘उसमान’ की ‘चित्रावली’ का एक चित्रा हैंµ‘मधुमालती होई रूप देखावा। प्रेम मनोहर होई तहँ आवा।।’ ‘मधुमालती’ पर केंद्रित एक प्रेम कहानी दक्षिण के शायर नसरती ने भी (संवत 1700) दक्खिनी उर्दू में ‘गुलशने इश्क़’ के नाम से लिखा। मलिक मोहम्मद जायसी का ‘पदमावत’ पाठकों के ध्यान में होगा। रतनसेन और पद्मिनी की प्रेम कथा। जायसी पद्मिनी का रूप वर्णन कुछ इस तरह करते हैंµ
    ‘सरवर तीर पद्मिनी आई। खोंपा छोरि कंस मुकलाई।।
    ससि मुख, अंग मलयगिरि बासा। नागिन झां दिलीन्ह चहुँपासा।।’

    इसके साथ ही यह सौंदर्य चेतना साहित्य में आगे प्रवाहित मिलती हैं। कुछ उदाहरणों से इसके महत्व को समझा जा सकता हैµ

                (1)
    अपने मंजु रूप वह दारा। रूपगर्विता जगत मंसारा।।
    प्रीतम प्रेम भाई वह नारी। प्रेमगार्विता भई पियारी।।
                            (नूर मुहम्मद)
            (2)
    प्रिय हँसि रस-रस कुचुकि खोलें।
    चमकि निवारतिपा निलाड़िली, मुरक-मुरक मुख बौलें।।
आचार्य कृपानिवास (कृपानिवास सं. 1901) पदावली से
            (3)
    इंदु बदन नरगिस नयन संबलवारे वार।
    उर कुंकुम, को किलबयन, जेहिल लखि लाजत मार।।
                            (मनोहर कविµअकबर के दरबार से)
            (4)
    रूंदन को रंग फीको लगै, झलके अति अंगिनि गोराई।
    आँखिन में अलसाबि, चितौन में मंजु बिलासन की सरसाई।।
                            (मतिराम: रीतिकालीन कवि)
            (5)
    अमिय हलाहल, मदभरे, सेत स्याम रतनार।
    जियत, मरत, झुकि-झुकि परत, जेहि चितवत एक बार।
                            (रसलीन: अंगदर्पण से)
आगे हम कृष्ण भक्ति शाखा में राधाकृष्ण के प्रेम में शृंगार की मनोरम और उन्माद का किसी पंक्तियाँ कविता में पाते हैं। डाॅ. राम विलास शर्मा केदार नाथ अग्रवाल की कविता में आंचलिक प्रकृति से देशकाल की व्यापक भावनाओं में सूरदास की ब्रज से जुड़ी भावनाओं का जिक्र करते हुए, उनकी काम चेतना का उल्लेख करते हैं। इसी युग में मीरा के पद का स्मरण हो आता हैµ‘बसौ मेरे नैनन में नंदलाल/ मोहनि मूरति, साँवरि सूरति, नैना बने रसाल।’ यह प्रेम के साथ शृंगार भाव की मनोहर अभिव्यक्ति ही है। हिन्दी साहित्य के कालों में वर्णित इन भावों को हम आगे भी अनेक रूपों में पाते हैं। कुछ उदाहरण देखने में आते हैं जिनसे परंपरा का पता चलता हैµ
            (1)
    तरुनि लसति प्रकासतें मालति लसति सुबास
    गोरस गोरस देतनहिं, गोरस चहति हुलास।
                    (हरिनाथµ‘अलंकार दर्पण’ से)
            (2)
    छाजत छबीले छिति छहरि छरा के छोर,
    भोर उठिआई केलि मंदिर के द्वार पर,
    एक पग भीतर औ एक देहड़ी पर धरे
    एक कर कंज, एक कर है दिवार पर।
                    (पदमाकर)
            (3)
    प्रेमरंग-पगे जगमग जगे जामिनी के
    जीवन की जोति जगी जोर उमगत हैं।
    मदन के माते मतवारे ऐसे घूमत हैं
    झूमत हैं झुकि-झुकि झेंप उधरत हैं
                    (आलम)

केदार की प्रगतिशील ऐंद्रिकता का लोक-आलोक

केदार की प्रगतिशील ऐंद्रिकता का लोक-आलोक

लीलाधर मंडलोई

केदारनाथ अग्रवाल मेरे प्रिय कवियों में हैं। जब मैं कविता की दुनिया में आया तो वे मेरे सामने थे। 1982 में आकाशवाणी छतरपुर में मेरा तबादला हुआ। तब बाँदा प्रसारण और कवरेज की दृष्टि से आकाशवाणी छतरपुर की सीमा में आता था। बाँदा जाकर उन्हें रिकार्ड और बातचीत करने के अवसर मिले। अपने जीवन में हरिशंकर परसाई के बाद वे पहले बड़े लेखक थे जिनका सानिध्य प्राप्त हुआ। प्रमोद पांडेय के साथ केदार जी की कविताओं को समझने का दौर चला। वे भी केदार जी की कविताओं के दीवाने थे। मैं भी संग-साथ बना रहने से, केदार जी के काव्यजगत में प्रवेश कर सका। तब मेरे प्रवेश का रास्ता बुंदेलखंड की प्रकृति और चीन्हा हुआ वस्तुजगत था। साथ ही बुंदेली भाषा और उसका साहित्य। यदि आकाशवाणी में नौकरी करना है तो ‘स्थानीयता’ सबसे बड़ी कुंजी है। आपको वहाँ के पुराने और नये लेखकों के साहित्य से अनिवार्य रूप से परिचित होना होगा। इस तरह मेरे पाठ में पदमाकर, जगनिक, इंसुरी, गंगाधर व्यास, खयालीराम आदि आए। लोकनाट्य की विधाएं थीं, लोक कथाएं और लोकगीत। बुंदेली भाषा थी और उसका ओज, उसकी दीप्ति। बुंदेलखंडी लोग थे अपनी चारित्रिक विशिष्टताओं के साथ। अपने व्यक्तित्व के अनेक रंगों में। नदी और पहाड़ थे। उनका सौंदर्य था। इन सबसे बनी एक समझ थी जो केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं तक पहुँचने का रास्ता देती थी। इस रास्ते एक सीमित दुनिया उजागर हो सकती थी। उनकी कविताओं के साथ कोई विरला ही एकाएक समझदार हो सकता है। दरअसल जब हम यह जान पाते हैं कि प्रेम उनका जीवन मूल्य है और सौंदर्य उनके काव्य में केंद्रीय तत्व, तब आपको और पीछे लौटना पड़ता है। अर्थात परंपरा में। उनकी कविताओं को उत्स से जानने के लिए आपको आदिकाल की दीर्घ परंपरा का थोड़ा बहुत ज्ञान जरूरी है जिसमें शृंगार, धर्म और नीति विषय के दोहे हैं। राज्याश्रित कवि और चारण राजसभाओं में इन विषयों पर दोहे सुनाया करते थे। अपभ्रंश में शृंगारिक दोहों को देखा जा सकता हैµ
    पिय संगनि कउ निद्दड़ी? पियहो परक्खहो केंन।
    भई बिन्निवि विन्नासिया, निंदन ऐंव नटेंव।।
    अर्थात प्रिय के मिलन में नींद कहाँ और प्रिय की अनुपस्थिति में भी? मैं दोनों से नींद को खोकर जीने को अभिशप्त हूँ। यह दोहा हेमचंद्र का बताया जाता है जिन्होंने ‘सिद्ध हेमचंद्र शब्दानुशासन’ जैसा व्याकरण ग्रंथ लिखा। इसी तरह सोमप्रभसूरि का दोहा हैµ
    बाँह बिछोड़ बिजिह तुंह हउँ तेवदूँ का दोसु।
    हिअय ट्ठिय जई नीसरहि, जाणउ$ँ मुंज रसोसु।।
    (अर्थात बाँह छुड़ाकर जाता है वैसे मैं भी जाती हूँ लेकिन मन से यदि निकल या निकाल सके तो मैं जानूँ कि ‘मुंज’ (प्रेमी रूठा है।) इसके बाद देश भाषा काव्य (रासौ साहित्य) में भी फुटकर रूप से ‘शृंगार’ साहित्य का हिस्सा बनता है। अर्थात कवियों की सौंदर्य चेतना में शृंगार एक अनिवार्य तत्व की तरह मौजूद रहा।

Friday, February 4, 2011

लज्जा

लज्जा

यक एक सीधी सरल बात है कि
तुम नहीं चाहते मुझे

मेरे लिए यह लज्जा की बात है
जबकि तुम मेरे इतने अभिन्न

मैं निःशब्द हूँ एक वृक्ष की तरह
इसका मतलब यह नहीं कि
मैं नहीं हो सकता तुम्हारी तरह

होना तुम्हारी तरह एक लज्जा की बात है

शेयर

जीवन के कुछ ऐसे शेयर थे
बाजार में
जो घाटे के थे लेकिन
खरीदे मैंने

लाभ के लिए नहीं दौड़ा मैं
मैं कंगाल हुआ और खुश हूँ
मेरे शेयर सबसे कीमती थे

मेहर


मेहर
इत्यादि
मेरे पास यह दिन है इत्यादि की तरह
मेरे पास यह रोटी हे इत्यादि की तरह
मेरे पास यह दोस्त है इत्यादि की तरह
मेरे पास यह बाजार है इत्यादि की तरह
मेरे पास यह पूंजी है इत्यादि की तरह
मेरे पास यह जीवन है इत्यादि की तरह

इतना अधिक जीने-मरने के बाद
मैं हूँ इत्यादि की तरह इस दुनिया में।

Tuesday, February 1, 2011

कवि के साथ बैठकी

कवि के साथ बैठकी
मैं अपने सरोकारों को कविता में दर्ज कर रहा हूँ
कवि लीलाधर मंडलोई से ओम निश्चल की बातचीत


मुक्तिबोध की जिस पदावली से लीलाधर मंडलोई ने अपने तीन साल पहले आए कविता संग्रह ‘काल बाँका तिरछा’ का नामकरण किया है, वह इस अर्थ में उनके कल्पनाशील कवित्व को चरितार्थ करता है कि यहाँ मुक्तिबोध की तरह ही जीवन की तलछट में समाएँ सौन्दर्यशास्त्रा को अपने अनुभव के आकाश में उतारने की भरसक चेष्टा दिखती है। मंडलोई ने अपने लेखकीय जीवन की वर्णमाला अभावों और संघर्षों की पाठशाला से सीखी है, इसलिए उनकी कविताओं में जनजातियों के बे-आवाज उल्लास के साथ-साथ हाशिए पर फेंके गए समाज के आत्मसंघर्ष को सेंट्रल स्प्रेड देने की कोशिश मिलती है। घर घर घूमा, रात बिरात और मगर एक आवाज़ तथा काल बाँका तिरछा की कविताएँ इसे समय की बाँक पर रचे गए समाज विमर्श में बदल देती हैं। वस्तुनिष्ठता और संवेदना के सहमेल से रचे इस काव्यात्मक विमर्श में दुनिया-जहान के दुखों की साँवली छाया कवि के अंतःकरण को कचोटती है। इसलिए उसके इस कहे में भी एक अप्रत्यक्ष संताप दर्ज़ है जो उसके सरोकारांे को संजीदा और अर्थवान बनाता है। मैंने एक कुबड़े यथार्थ को दिया कंधा इस देश मेंµकहना उस यथार्थ को जानना और पाना है, जिस पर समय की अपार धूल अँटी है।
    ‘दिल का किस्सा’ में खुद मंडलोई ने अपनी प्रारंभिक जीवन यात्रा को जिन खदानों, श्रमिकों और ठेकेदारों के बीच गुज़रते देखा है उसकी थकी, ठहरी और उदास खनक से ही यह संग्रह शुरू होता है। खखरे का टोप मंडलोई के जेहन में समाई यादों का एक पाश्र्व चित्रा है, जिसे कैनवास पर उतारते हुए वे पैंतीस साल पहले के यथार्थ की गहरी खाई में उतर जाते हैं, और याद करते हैंµवह जगह जहाँ बचपन में ढोई उन्होंने मिट्टी, कुँवर ठेकेदार ने दिए रोज़नदारी में दस आने। भूले हुए अतीत का ही एक और पन्ना खोलती हैµ‘पुकारते तासे की डगर’ शीर्षक कविता, जहाँ वे रुच्चा, कत्वारू और सुक्का के बेटे-बेटियों का अता-पता पूछते हैं, पर कोई सुराग नहीं मिलता। अलबत्ता एकाध को उनकी पहचान जरूर कौंधती हैµआप तो गुढी वाले लछमन के बेटे हैं न। यानी लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई, जिनकी अक्षय कीर्ति को क़ायम रखने के लिए मंडलोई ने उनके नाम पर एक युवा पुरस्कार का विधान भी किया है। पर इसी बीच कहीं से उभरता तासे (मृत्यु के समय बजने वाला शोक वाद्य) का रुदन उन्हें शोकार्त कर देता है। कठचंदन, बकौली और मौलश्री के भव्य अतीत की तुलना में भले ही मंडलोई का अतीत एक कुबड़े यथार्थ का ही पर्याय हो, पर वहाँ निश्चय ही जीवन की साझा उजास है।
    दिव्य, भव्य और देदीप्यमान जीवन की सुखद और निरुद्यमी दिनचर्या से अलग रोज़-ब-रोज़ के संघर्षशील जीवन और नियति से मुठभेड़ करती अस्मिताओं की विनिर्मितियाँ मंडलोई के कवि-मन को अपनी मार्मिकता से सींचती हैं। वे गरबीली गरीबी में साँस लेते मानव की अस्तित्व-हीनता की उस दुर्लभ अनुभूतियों से रु-ब-रु होते हैं, जिनसे गुज़रते हुए सुचिक्कन जीवन शैली के अभ्यस्त कवियों को संकोच होता है। वे कविता को सुभाषितों और उद्धरणीयता में बदलने की बजाय क़िस्सागोई की प्रचलित सरणि अपनाते हुए नैरेटिव का एक ऐसा शिल्प अख्तियार करते हैं जो उनकी जीवन-दृष्टि को प्रखर और समावेशी बनाता है।
    कविताओं के बीच फैली-बिखरी कवि-चिंता पर ध्यान दें तो वह सरकारी आँकड़ों के इस छद्म से वाकिफ है जो यह बताता है कि कालाहांडी में पानी बरस रहा है जरूरत से अधिक और फसलें लहलहा रही हैं हर बरसµउन्हें क्षोभ होता है कि वह कविता या एक टिप्पणी भर लिख कर अपनी भूमिका से संतुष्ट हो जाता है जो कि बुद्धिजीवियों के लिए एक आसान विकल्प है। याद आती है राजेश जोशी की वह कविता जो यह जताती है कि जब तक अपील जारी होती है, उसकी ज़रूरत ख़त्म हो चुकी होती है। एक कविता में कवि ठूँठ की तरफ पाँव बढ़ाते हुए सोचता है कि सूख चुका बहुत अधिक जहाँ/पक्षी जल के अलावा चाहिए होना मनुष्य जल कुछ। वह कन्हर-कान्हा अभयारण्य में नर और मादा चीता की जिस अद्भुत मिथुन मुद्रा का अवलोकन करता है, वह नरेश सक्सेना के शब्दों मेंµस्पेस की संपूर्णता में समाहित एक निजी स्पेस है। सृष्टि के इस अपूर्व दृश्य को पहाड़ी पर आरूढ़ होते सूर्य बिम्ब की तरह महसूसता कवि अपने भीतर की आत्महीनता के अंधकार से तुलना करता है और यह कहने में संकोच नहीं करता किµमैंने उस रोज अपना अंधकार देखा। कवि का यह अहं-विसर्जन न केवल प्रकृति के पक्ष में है, बल्कि यह प्रकृति के साथ कवि का मनुहार है। इसी तरह नई सड़क (किताबों की मंडी) पर किताब मिल जाने के बाद गाँव से आई एक स्त्राी की ‘कोमल खिस्स हँसी’ पर कवि न्योछावर हो उठता हैµवह हँसी निश्चय ही नगर-कन्याओं की नकली मुस्कानों के मुकाबले नैसर्गिक है।
    कवि के सरोकारों का तेज अन्य जिन कविताओं में प्रखर है, उनमें कुछ चोखेलाल-सीरीज़ की कविताएँ हैं जो आम आदमी का प्रातिनिधिक चरित्रा है, मृत्यु का भय, कस्तूरी, पराजयों के बीच, अनुपस्थिति, मैं इतना अपढ़ जितनी सरकार, उन पर न कोई कैमरा, आपको क्यूँ नहीं दीखता, झाँकने को है एक अजन्मा फूल और अमर कोली प्रमुख हैं। ‘मृत्यु का भय’ से अचानक धूमिल की वह कविता कौंधती है जिसमें नौकरी छूटने वाले व्यक्ति की पीड़ा बयान है। ‘कस्तूरी’ में एक स्त्राी की संभावनाओं का दुखद अंत ही नहीं है, मानवीय सभ्यता की हिलती हुई शहतीरों पर प्रहार भी है। पर इन सब कविताओं के कथ्य के पीछे कवि की एक अंतर्दृष्टि सक्रिय है, जिसका संकेत पराजयों के बीच में मिलता है। यह कविता जैसे कवि का अपना मेनीफेस्टो है, जहाँ वह मुखर और प्रखर होते हुए कहता हैµईश्वर के भरोसे छोड़ नहीं सकता मैं यह दुनिया। उसके लिए छोटी-सी चींटी भी उम्मीद का दूसरा  नाम है। वह कौल उठाता हैµमुमकिन है टूट पड़े कानून का कहर/कम से कम मैं एक ऐसा समाचार तो बन ही सकता हूँ/कि बंद पलकों में एक सही हरकत दर्ज हो/ बंद कपाटों में ऐसी हलचल कि सोचना शुरू होµअचरज नहीं कि ये पंक्तियाँ हमें दुष्यंत कुमार की याद दिलाती हैµमेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

    मंडलोई की कविता में भावुकता के विनियोग के मुकाबले तथ्यात्मकता का निवेश ज्यादा है। अनुपस्थिति में भी उपस्थिति बहुत कुछ को भाँप लेने की उनकी कविता अनुपस्थिति कुँवर नारायण के काफ्का के प्राहा में शीर्षक कविता के साथ-साथ पढ़ी जा सकती है। कुँवर जी जहाँ कहते हैं: एक उपस्थित से कहीं ज्यादा उपस्थिति हो सकती है कभी-कभी उसकी अनुपस्थिति, मंडलोई अनुपस्थिति की भयंकरता का अहसास दिलाते हुए कहते हैं, ‘मुझे होना चाहिए था संसद में/मेरी अनुपस्थिति से अब वहाँ अपराधी/अनुपस्थिति का शाप इतना भयानक/मंदिर में इन दिनों कब्जा शैतानों का।’ उनके सामने भूख से लड़ने के लिए जारी शताधिक कल्याणकारी योजनाओं की हक़ीकत है। भूखों की पहुँच से बाहर बहते पैसे से मनाए जाते अकाल-उत्सव हैंµऔर ऐसे बुद्धजीवी जो महज एक टिप्पणी लिख कर ही अपनी भूमिका से संतुष्ट हो जाते हैं। अनेक मानवीय उपस्थितियाँ कवि को कैमरे के फोकस से बाहर नज़र आती हैं जब वह देखता हैµमृत्यु सिर्फ उपभोक्ता ख़बर है दृश्य में/पहुँचती नहीं उन तक जो कभी भी तोड़ सकते हैं/ अपनी आखिरी साँस अटकी जो उम्मीद में कहीं (उन पर कोई कैमरा)

    मंडलोई के काव्यात्मक गुस्से की भंगिमाएँ देखनी हों तोµ‘आपको क्यूँ नहीं दीखता’ और ‘अमर कोली’ जैसी कविताएँ जरूर पढ़नी चाहिए। तबेले में पशुवत जीवन जीते हुए मवेशियों के हालात का चित्रा खींचते हुए मंडलोई ने दुधारू पशुओं के प्रति क्रूरता का मार्मिक उदाहरण कविता के रूप में रखा है जो हमारी उत्तर आधुनिक हो रही सभ्यता की अचूक स्वार्थपरता का तीखा उदाहरण है। आश्चर्य है कि इस दुधारू-बाजारू सभ्यता में जहाँ प्राणि-प्रजातियाँ दिनों दिन लुप्त हो रही हैं, हमने अपने पालतू पशुओं को ही व्यापारिक हितों की बलिवेदी पर चढ़ा दिया है। इसी तरह अमर कोली की आत्महत्या का रूपक रचते हुए मंडलोई ने हमारे समय की मानवीय क्रूरताओं और संकीर्णताओं का जिस लहजे में खुलासा किया है, उससे यह पता लगता है कि मनुष्य मनुष्य के ही विरुद्ध किन-किन स्तरों पर व्यूह-रचना में निमग्न है।
    मंडलोई की काव्य भाषा कविता की प्रचलित सौन्दर्याभिरुचि से थोड़ा अलग है। वह कई बार अनगढ़- सी दिखती और ऐसे स्थानिक शब्दों के प्रति अपनेपन का रवैया अपनाती है, जिसे देखकर सुगढ़ शिल्प के ख्वाहिशमंद पाठकों को किंचित भिन्न काव्यास्वाद का बोध हो सकता है। पर उनकी कविता में आंतरिक संगति और संगीत का सहकार उत्तरोत्तर प्रगाढ़ हुआ है जिसकी भावात्मक वेध्यता से बिंधे बिना नहीं रहा जा सकता। कविताओं के अलावा मंडलोई की शख्सियत के कई और पहलू हैं। उन्होंने आदिवासियों की लोककथाओं का संग्रह किया है। अंडमान निकोबार के आदिवासियों के बारे में विश्वसनीय जानकारियों वाले लेख लिखे हैं। हिन्दी के अनेक सुपरिचित लेखकों, कलाकारों पर फिल्में बनायी हैं तथा बीच बीच में मिले अवकाश के क्षणों में वे कविता, कहानी, उपन्यास व आत्मकथाओं, जीवनियों के सुधी पाठक भी रहे हैं। ‘कविता का तिर्यक’ समकालीन कविता पर उनकी संजीदा टिप्पणियों का संकलन है तथा ‘दानापानी’ उनकी डायरी जो अभी हाल ही में छप कर आयी है। शायरी और शायरों की सोहबत में रहकर मंडलोई ने अपनी भाषा को लगातार माँजा है। अचरज नहीं कि चुपके-चुपके मंडलोई ने अपनी शायरी का भी कोई संकलन तैयार कर रखा हो। क्योंकि वे मीडिया के आदमी हैं और मीडिया का आदमी हर फन में दखल रखता है।
    मंडलोई मंडी हाउस में बैठते रहे हैं, इन दिनों आकाशवाणी निदेशालय में है जहाँ की व्यस्तताएँ अपार हैं। बैठकों और बैठकबाजियों के बीच ही उनका दिन गुजरता है। ऐसे में एक और बैठकी का स्पेस बना पाना संभव न था, किन्तु कमलाप्रसाद जी के इसरार के आगे हमारी और मंडलोई की एक न चली। लिहाजा यह बातचीतµजो पूरी बातचीत का एक लघु संस्करण है।

ओम निश्चल: सुना है, कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पैदा हुए हैं, पर तिथि अज्ञात है। आपके भीतर का जो लीलाभाव है, उसका सम्बन्ध क्या कहीं कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पैदा होने से तो नहीं है?
लीलाधर मंडलोई: एक कलाकार के भीतर यदि लीलाभाव नहीं है तो यह उसके जीवन की त्रासद घटना होगी। मैंने इस भाव को विकट परिस्थितियों में भी सदैव बचाया है। मेरे पिता के एक दोस्त थे चोखेलाल। उनका हर अच्छी-बुरी और मारक से मारक स्थिति में यही जुमला होता थाµ‘नाट फिकर चोखेलाल’ तो कुछ गाँव-खेड़े की मौज-मस्ती का नैसर्गिक स्वभाव हमें मिला और कुछ इस जुमले के चमत्कार ने बचाये रखा। एक सबसे अहम बात। मेरे माता-पिता शाॅ वेलेस और एन.एच.ओझा की प्राइवेट कोयला खानों में आजीवन रोज़नदारी वाले मजूर रहे सो फाका मस्ती का आलम कभी ख़त्म नहीं हुआ। माँ तब भी मस्ती में गाती थी। पिता भी मानस मंडली और आल्हा में मस्त रहते थे। इन दोनों की जिं़दादिली हमें विरासत में मिली। उनके लोकगीतों, आल्हा गायन और कबीर, रविदास, दादूदयाल, तुलसी, ईसुरी आदि के पदों में जो निर्गुण रंग था, वह मुझे भी थोड़ा-सा वरदानस्वरूप मिला।
    ओम भाई, एक बात और। हम बुनकर होने की वजह से कबीर के वंशज कहे जाते हैं। हम (भाई-बहन) तो नहीं माँ, पिता, काका, मामा आदि इसी काम में लगे रहे थे। सो हमें कबीर साहब के जीवन-संघर्ष से बड़ा सबक मिला। इस तरह के औघड़पन और साफ़गोई के साथ संकटों में जीना हमारी मूल पूंजी है। इसे आप लीलाभाव भी कह सकते हैं क्योंकि मैंने कृष्ण के जीवन के अहम आयामों को थोड़ा-बहुत चुराने की कोशिश भी की है किन्तु असफल ही रहा। तो लीलाभाव यदि वह कहीं है भी तो उसमें मेरा किया-धरा कम है। उन सबकी वजह से अधिक है जिनका मैंने ज़िक्र किया। जन्माष्टमी के दिन जन्म एक संयोग ही होगा।

ओम निश्चल: अभी-अभी ‘कादंबिनी’  में प्रकाशित ‘हमारी पाठशाला’ जिो दृश्य और चित्रा आपने अपने बचपन की पाठशाला के उकेरे हैं, आज भी चालीस-पचास बरस के पहले के ग्रामीण भारत की पाठशालाएं ऐसी ही हुआ करती थीं। वही स्लेट, तख्ती, खड़िया, मिट्टी-धूल से सनी टाट-पट्टियां और दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों के प्रति ऐसी ही दीन हीन दृष्टियां। इस माहौल में, भेदभाव के इस वातावरण के विरुद्ध मन के कोरे स्लेट पर जो इबारतें लिख गयीं, उनका निहितार्थ क्या होता था?
लीलाधर मंडलोई: मेरी एक कविता हैµ‘दुक्ख से प्यार करो जीत होगी। इसमें छिपा है लड़ने का अमर नुस्खा।’ सो बचपन की स्मृतियों के भेदभाव को लेकर जो लगभग सनातन सत्य है यदि उसकी ‘कंडीशनिंग’ में फंस जाओ तो लड़ने की शक्ति एकायामी हो जाती है। इसका ट्रांसफर्मेशन अधिकतर घृणा और सतही विद्रोह में होता है। ‘हमारी पाठशाला’ के कुछ हिस्सों में ऐसे संकेत हैं किन्तु उन तत्वों को रचनात्मक दिशा माँ और पिता के धीरज और सीख ने दी। मुझे लगता है वह एक बेहतर रास्ता था, जिससे हम भाइयों और बहनों ने जीवन में संघर्ष करते हुए अपने को और परिवार को बदलने में तवज्जो दी। कहना न होगा कि इसके परिणाम काफी हद तक अनुकूल रहे। और भी कई हम सरीखे थे, जो साथ-साथ चले। कह सकते हैं कि यह एक सामूहिक चेतना थी। हमारे साथ हुए भेदभाव को लेकर यदि हम कंडीशंड हो जाते तो जीवन-भर उथलेपन से बाहर निकलने का रास्ता बंद हो जाता। मैंने संघर्ष के वैकल्पिक द्वार हमेशा खुले रखे। मुझे माँ की एक ‘कहनात’ सदैव याद आती रहीµ‘छै मइना की नई, बारा मइना की सोच के चलने हे।’ तो उनकी कहनात में आए ‘बारह महीनो’ का उल्लेख दरअसल दीर्घगामी काल के अर्थ में है। हमने माँ की इस ‘कहनात’ को हृदय में अंकित कर लिया। जो कुछ भी है उसमें देखा जाए तो उस आयु में समझ के स्तर पर हमारा अपना शायद कुछ न था।

ब्वायलर में बचपन

ओम निश्चल: इमारत की बुलंदी के प्रभामंडल में नींव का नेपथ्य ओझल ही रहता है, लेकिन जब बात ब्वायलर में बचपन से शुरू होकर कोयला खदानों के गहरे अंधेरे विवर में जाकर कहीं गुम हो जाती हो तो उसे कुरेदने में एक घाव को कुरेदने जैसा क्षोभ होता है: बतर्ज़, मेरे दिल की राख कुरेद मत। फिर भी बचपन में जो संग्राम आपने लड़ा, जीवन को बचाकर इतनी दूर ले जाएµवह बचपन, वह संघर्षµवह नींव आखर जहाँ आप कहते हैं, तमाम साजिशें बेमुरव्वत-बेधड़क। वह कुछ बन दिखाएगा ऐसा कि नई दुनिया की जन्मकथा में उसके नींव आखर होंगे। ...मैं जानता हूँ, बचपन में ले जाना आसान नहीं है। फिर भी बचपन की याद दिलाना चाहता हूँ।
लीलाधर मंडलोई: रसूल हमजात़ोव अपने लेखन में अबूतालिब की कहावतोंµपदों का बार-बार स्मरण करते हैं। ‘मेरा-दाग़िस्तान’ के शुरूआत में उनका एक पद हैµ‘अगर तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे, तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसाएगा।’ यह किताब कालेज के ज़माने में मेरे हाथ पड़ी और मैंने अतीत की कटु स्मृतियों से प्यार करते हुए, उनका भविष्य के लिए विश्लेषण शुरु कर दिया। बचपन ने मुझे लड़ने-जूझने की जिजीविषा प्रदान की और ताकत, उनसे मुझे कुछ चीजें़ उपहारस्वरूप मिल गईं। पहली चीज़ थी मनुष्य बने रहने का वरदान, दूसरी चीज थी अभावों में आनन्द ढूँढ लेने की तरक़ीबें और तीसरी भविष्य के सपने। मैं बार-बार उसमें लौटता हूँ सिर्फ़ अपने अतीत के उत्खनन से उ$र्जा बटोरने नहीं बल्कि उन अनेक लोगों के अतीत से कुछ और-और पाने के लिए जिनका संघर्ष शायद हमसे अधिक विकट था। मैंने जो ‘ब्वायलर में बचपन’ लिखा उसमें मुझ सरीखे और दोस्त थे परसादी, जुग्गू, भुप्पी, मेरे बड़े भाई आदि। तो मेरा वह संस्मरण ‘हम’ की बात करता है ‘मैं’ की नहीं। हमारा बचपन अमूल्य धरोहर है। वह अमोल है। हम भाग्यशाली हैं कि हमें ऐसा बचपन मिला। उस जीवन के अनेक संस्मरण हैं। अनगिनत आलोकित कण। इस तरह की स्मृतियों में जाते हुए कई लेखक या तो हकलाने लगते हैं या चालाक ढंग से ग्लोरीफाई करते हैं। मैं इस मामले में खासा सेलफिश हूँ। मैं उन स्मृतियों की पूंजी का निवेश जीवन के अनेक रूपों में करता हूँ। इस ख़जाने के खाली होने से, मैं बहुत भयभीत होता हूँ। मैं मानता हूँ ऐसा जीवन न दुबारा मिलता है, न उसे अंतिम रूप से प्रकाशित किया जा सकता है। सो इस पर मैं गर्व से भर उठता हूँ। और मेरी इतनी कूव्वत कहाँ कि ऐसे अद्भुत जीवन के बारे में चाहकर भी समग्र रूप से यदि गान भी करना चाहू तो कर सकूं।

ओम निश्चल: उपेक्षा और घृणा की कचोट मन को इतना दग्ध कर जाती है कि कुछ लोग जीवन-भर उसकी आंच में तपते रहते हैं। उनकी आत्मकथाओं में जीवन अदहन की तरह उबलता रहता है। इसके उलट आपकी आत्मकथा बहुत धीमे से इन चीजों की ओर इशारा तो करती है, उसी में डूब नहीं जाती। क्या अतीत-व्यतीत के प्रति यह आपका क्षमा भाव है या गतम् न शोचामि कृतम् न मन्येµकी शास्त्रोक्ति का अनुधावन?
लीलाधर मंडलोई: मेरे अभिन्न मित्रा है महेश कटारे। कथाकार, नाटककार और उपन्यासकार। मेरे जीवन की एक बड़ी विपदा में, मुझे उनके घर की छत का आसरा और स्नेह मिला। मेरे संस्मरण पढ़ने के बाद उन्होंने कहा अगर यह किताब आई तो इसका एक ही शीर्षक हो सकता हैµ‘न दैन्यं न पलायनम्’ तो मैंने यह बात गाँठ की तरह बाँध ली। मुझे स्वभावतः ‘दीनता के बखान’ में उसे ‘सेलेबल प्रोडक्ट’ बनाने की गंध आती है। लेखक बनिया नहीं कि हर चीज़ की क़ीमत वसूलता फिरे। सच की अभिव्यक्ति के तरीके़ से पता चलता है कि लेखक क्या होना चाहता हैं लेखक या फिर बनिया? एक व्यापक और दीर्घकालीन लड़ाई के लिए अदहन की तरह उबलना एक तरह से धीरे-धीरे व्यतीत होना है। और ‘क्षमा’ किसके प्रति? सत्ता, व्यवस्था, धर्म या ऐसी ही अन्य किसी सत्ता के प्रति? तो एक लेखक अपनी लड़ाई प्रत्यक्ष हथियारों से नहीं लड़ता। उसके हथियार यदि साफ़-साफ़ दिख जाएं तो यकीनन वह हार जाएगा। सो लेखकों की परंपरा में रहना है तो लड़ाई उसी शिल्प में होगी जिसमें दुनिया के वरिष्ठ लेखकों ने लड़ी। जीत होती है या हार, इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। मेरी एक कविता हैµ‘चक्रव्यूह में घिरने के बाद। सिवाय मक़सद के कुछ और याद नहीं रहता। कोई भी मृत्यु अकारथ नहीं।’

ओम निश्चल: यह जो आपकी बनावट है, आपकी मैत्राी है, आपकी सुघरता है, उसके पीछे ज़रूर ऐसी कोई शक्ति रही है, ताकत रही है, दुआ रही है, जिसने आपको प्यार से सींचा और संवारा है। इतना प्यार, दुलार कि अतीत की पाठशाला में नंगी जमीन पर बिठाये जाने की याद करते हुए भी आपका चेहरा उपेक्षा और बदले की भावना से तमतमा नहीं उठता बल्कि करुणा की पवित्रा ओस में भींग उठता है। आज जो आपकी कविताएँ और डायरी के हिस्से ओस से भीगे हुए-से लगते हैं, वह किस गुरुकुल की दीक्षा का प्रतिफल हैं?
लीलाधर मंडलोई: दरअसल हमने अच्छी और स्थायी बातों, संस्कारों, परंपराओं या कहें सांस्कृतिक विरासत को भूलने में महारत हासिल कर ली है। यदि ऐसा कुछ याद में रह भी जाता है तो अमूर्त और धुँधला। आपके प्रश्न के मर्म तक पहुँचने की चेष्टा में मुझे अपना सतपुड़ा, अपना गाँव, अपनी बस्ती, अपनी नदी, अपनी बरसात, अपना बसंत, अपने लोग, अपनी खदानें, अपना स्कूल, बचपन के दोस्त और वे तमाम नातेदार अधिक याद आते हैं जो या तो दिवंगत हैं या जीवन की संध्या में हैं। और इस अमर सरमाये के बरक्स उपेक्षा और प्रतिकार के क़िस्से नगण्य हैं। मैं उन पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदियों, पहाड़ियों, मजूरों-आदिवासियों के अविस्मरणीय साहचर्य का क्या मोल लिखूँ जो कुबेर के ख़जाने के सामने अनमोल है। मेरे लिखे में इन्हीं सबके प्रति आभार है। अगर वह करुणा की पवित्रा ओस-सी लगती है तो इसमें अपनी किसी भी भूमिका को मैं अस्वीकार करता हूँ। जो कर्ज़ इस आत्मा पर है उसका यह शायद छोटा-सा हिस्सा है जो सतह पर दीखता है। उनके उपकारों के प्रकाशन के लिए सात जनम कम पड़ेंगे। मैं चुन-चुनकर प्राथमिकता के आधार पर लिखने का यत्न करता हूँ और अनलिखे पर अपराध बोध में शर्म से डूब-डूब जाता हूँ। मुझे मीर साहब का एक शेर इस संदर्भ में बहुत याद आता है:
        इक चश्म मुन्तज़िर है कि देखे है कब से राह
        जूँ ज़ख़्म तेरी दूरी में नासूर हो गया
    तो जो और जिन पर नहीं लिख सका, उनका दर्द सालने से अधिक टीसता है कि उनके दुख मुझसे बड़े और नाक़ाबिले बरदाश्त थे यकीनन।

माँ की रसोई

ओम निश्चल: विष्णु नागर ने आपके बचपन का एक क़िस्सा मुझे सुनाया था कि कैसे माँ की बनायी हुई कोई रसेदार चीज़ आपको इतनी पसन्द आयी कि माँ से आप पूछ बैठे थे कि माँ यह क्या चीज है। और तब माँ ने आपको जो बतलाया था, उसे जानकर आप स्तब्ध रह गये थे। दैन्य का कोई भी दूसरा वृत्तांत इस वृत्तांत के आगे फीका जान पड़ता है। आज संपन्नता में सांस लेते और सुस्वादु व्यंजनों का आस्वाद लेते हुए क्या आपको माँ की वह रसोई याद है?
लीलाधर मंडलोई: भाई विष्णु नागर जिस क़िस्से की तरफ़ इशारा कर रहे हैं वह ‘कादम्बिनी’ में ही छपा था। अभाव के दुर्लभ आनंद की कथा थी वह। दैन्य के ऐसे अनेक वृत्तांत है। माँ का उन दुर्दिनों में भी विश्वास डिगा न था। घर में अन्न का एक दाना न होने पर बहुत कुछ था जो प्रकृति ने उपहार में दे रखा था: मसलन महुआ, रेठू, जंगली भाजियाँ, आम, अमरूद, जामुन, चिरौंजी आदि। हमने बड़े आनंद से एक लंबे समय तक और खासकर बरसात के दिनों में जब काम नहीं मिलता था, महुए की रोटियाँ और चीले खाए। जंगली बेर और जामुन ने हमें अपार खुशी से नवाज़ा। अमरूद के पेड़ घर के पिछवाड़े ही माँ के हाथों लगे थे। और हाँ! अनार का पेड़। कुछ भाजियाँ भी बाड़ी में उगती रहती थीं। तो अभाव जो पैसों का था उससे और भूख से लड़ने की तरक़ीबें माँ ने खोज ली थीं। अगर ‘अन्नपूर्णा’ कहीं हो सकती है इस सृष्टि में तो वह माँ थी।
    ‘माँ की रसोई’ की यह परंपरा अभी तक घर में जीवित है। तबादलों में भौतिक रसोई उखड़ती है उसका जादू नहीं। हमारी हर रसोई बदलते घरों के साथ माँ की उपस्थिति में बनी। पत्नी ने भी कठिन समय देखा और हर विपरीत समय में अपनी और मेरी माँ के संस्कारों को केन्द्र में रखा। हमारे जीवन में जो भी सुस्वादु व्यंजन हैं वे दो माताओं की कृपा से हैं। उनकी उपस्थिति पार्थिव है। हमारी रसोई बाज़ार की बंधक कभी नहीं रही।
    µऔर सच कहूँ ओम जी, मैं उन्हें दैन्य के वृत्तांत में शामिल नहीं करता। वे संघर्ष के वृत्तांत है और लिखने का अभिप्राय यह कि इन्हें पढ़कर नाउम्मीदी और पराजय की जगह उम्मीद और जीत का रास्ता खुले। मैं मानता हूँ कि सबसे बुरे दिनों में सबसे उजले समय की पदचाप होती है जिसे हम सुन नहीं पाते। एक बात और। माँ की रसोई में जब जो कुछ आया, आप जानते हैं गाँव में ऐसे दिनों की ख़बर हवा की तरह फैलती है। दुनिया में ऐसे में कुछ लोग खड़े रहते हैं और अपना पेट काटकर दूसरों को खिलाते हैं। मुझे शीन काफ़ निज़ाम का एक दोहा निःसंगता और साथ रहने से संदर्भ में हमेशा याद आता हैµ
    ”हम ‘कबीर’ कलिकाल के, खड़े हैं खाली हाथ,
    संग किसी के हम नहीं, और हम सबके साथ।“

ओम निश्चल: माँ के भीतर लोकगीतों की करुणा थी तो बाप के भीतर कबीर की अक्खड़ता और खदान मालिकों के प्रति ग़ुस्सा। माँ के गीतों को सुनकर कविता के अंकुर फूटे तो बाप का गु़स्सा भी, आपने लिखा है कि, कब मेरे भीतर आ बैठा पता न चला। पर आपके हंसमुख चेहरे से तो पता नहीं चलता कि गु़स्सा कहाँ भूमिगत है। पिता की यह सीख कि कठिन दिनों में कुछ भी त्याज्य नहीं होता, इसे कितना अमल में लाते हैं?
लीलाधर मंडलोई: प्रेम और क्रोध किसी भी जीवन में अहम स्थान रखते हैं बशर्ते वे रचनात्मक हों। ज्ञानरंजन जी की कहानियों में गु़स्सा या कहें क्रोध एक प्रमुख धातु है। क्या इस धातु की इससे बड़ी कोई रचनात्मक उपलब्धि सम्भव थी। एक ऐसा गद्य जिसमें तेजाब से अधिक तीव्रता है। परसाई जी के अनेक निबन्धों में करुणा पर सवार यह क्रोध देखा जा सकता है। वरिष्ठ कवि नागार्जुन और धूमिल की कविताओं में अनेक ऐसे क्रोध के प्रसंग आते हैं। तो मैं समझता हूँ दोनों ही जीवन और रचना के लिए अनिवार्य है।
    आपने गाँव में इस क्रोध को लेकर कई मुहावरे सुने होंगे जैसेµ‘तेरी ठठरी बँध जाए’, ‘तेरे मुँह में आग लगे,’ ‘तू अपनी बीबी का मरा हुआ चेहरा देखे’, ‘अल्लाह करे तेरी जबान सूख जाए’, ‘तू अपने घर का पता भूल जाए’, ‘तेरे घर में कुत्ते मूतें’ आदि। ये सब आवेश और गु़स्से की सहज अभिव्यक्तियाँ है। शायद तात्कालिक ग़ुस्से को बहा देने की कोशिशें। हक़ीकतन इनमें सचमुच के अमंगल के लिए शाप नहीं है, न इरादतन किसी के जीवन को नष्ट करने की कार्रवाई। तो हम सब लोगों का क्रोध रचनात्मक होता है, होना चाहिए।
    और पिता की सीख जो हम परिवार वालों को मिली वरदान है। कठिन दिनों के अँधेरों को पार करने में उसने टेमा-ढिबरी से आगे मशाल की भूमिका निभाई। अब उसके आलोक में दुख से भी दोस्ती की जा सकती है। मजे़-मजे़ रहा जा सकता है। मेरी कविता की ही पंक्तियाँ जो माता-पिता के संघर्ष से आईं, आपको बताता हूँµ
    एक लोटा
    एक डोरी
    एक अँगोछा
    एक पोटली
    एक कंबल
    एक लाठी
    अब कोई भी यात्रा कठिन नहीं

ओम निश्चल: अभी हाल में सुना कि आप उन कोयला खदानों में गए और मजदूरों के बीच रहे भी। कोयला खदानों में काम करने वालों का जीवन क्या कुछ सुविधाजनक हुआ है?
लीलाधर मंडलोई: अभी हाल की यात्रा से एक लंबे अंतराल या फिर मातृभूमि के प्रति उपेक्षा का बोध होता है। मैं साल में एक-दो बार और कभी इससे अधिक बार जाता रहता हूँ। दरअसल लौटना एक पर्यटकीय अनुभव हो तो मुझ पर बिजली गिरे। मेरे बार-बार लौटने की कथा में मूलतः शक्ति संचय और जड़ों से जुड़े रहने का भाव है। मैंने एक छोटी सी कविता लिखी है जो मेरे लौटने के कमिटमेंट को खोलती हैµ‘अगर कविता में/न आये मेरी मातृभूमि/मैं कवि नहीं।’
    अब प्रश्न का दूसरा बिन्दु हैµ‘कोयला खदानों में काम करने वालों का जीवन क्या कुछ सुविधाजनक हुआ है?’ तो यदि यह आप तनख्वाह के संबंध में पूछ रहे हैं तो हाँ! और यदि जीवन-स्तर और सुविधाओं मसलन शिक्षा, सेहत, पर्यावरण, जल सुविधा, बिजली और सामाजिक कल्याण के बारे में तो यकीनन नहीं। बस उसका आकर्षक भ्रम है जो आधुनिक जादुई मिथक में तब्दील हो रहा है। बकौल निदा फाजली, ‘चाँद में कैसे हुई कै़द किसी घर की खुशी। ये कहानी किसी मस्जिद की अज़ाँ से सुनिये...’

ओम निश्चल: ‘दिल का क़िस्सा’ में आपने भाषा में खोने का दुख लिखा है। आपका बचपन का दोस्त जो बाद में चिट्ठीरसा हो जाता है, उससे मिलने पर आपकी 21 बरस पहले की लिखी चिट्ठी दिखायी तो लगा आप प्रश्नों के कठघरे में हैं। अहसास हुआ कि जैसे आपके भीतर का कोई कोना मर चुका है और इस बात का क्षोभ कि बरसों हो गए तमाम लोगों, दोस्तों, रिश्तेदारों का ख़त लिखे हुए और फोन पर बतियाते हुए जैसे कृत्रिम भाषा में बोलने का अहसास होता है। इस आत्मीयता के विस्थापित होते जाने की क्या वजह है?
लीलाधर मंडलोई: ओम जी, ‘दिल का क़िस्सा’ का वह सजीव यथार्थ मैं न लिखता, अगर दुनियादार और चालाक होता। लेकिन इसकी अंतिम पंक्तियों की तरफ ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगाµ‘मैंने याद किया कि कितने अभिन्न लोगों को मैंने चिट्ठियाँ नहीं लिखीं, मैंने बहुत से दोस्तों, नातेदारों को सम्बन्ध, भाषा और उसके इतिहास में खो दिया। घर लौटा तो फोन बज रहा था, जिसे छूते हुए झिझक हुई। फिर मैं बतियाने लगा। वह एक कृत्रिम भाषा थी जिसमें मैं बोल रहा था।’ इन पंक्तियों को लिखते हुए जो मैंने समझा वह अपने अपराध बोध का ऐलानिया स्वीकार है। मैं सचमुच बहुत शर्मसार हूँ। लेकिन बेवफ़ा और ग़द्दार नहीं। यह मैं ही हूँ जो बार-बार उन तक लौटता हूँ देर-सबेर। मैं ही पहुँचता हूँ कि मुझे लगता है नौकरी की जबरन घेराबंदी के बाहर मुझे वहाँ वहाँ होना चाहिए। मेरी इस कोशिश में मुहम्मद अल्वी का एक शेर हैµ
    मैंने आँखों से जेब भर ली है
    देखता हूँ कहाँ छुपेगा तू
    तो भाई! यह मैं हूँ जो खोजते हुए जाता हूँ। मैं उनका मनो विज्ञान समझता हूँ। वे नहीं आ सकते मेरे पास। मुझे जाना है। मैं जाता हूँ। मेरे विलम्ब के लिए वे मुझे माफ़ करें।

भोपाल न होता तो...

ओम निश्चल: बुनियादी तालीम के बाद जब कुछ बड़े हुए और भोपाल आना हुआ तो जिल्लत की जिं़दगी में कितना बदलाव आया। दोस्तों का आपके प्रति क्या रूख रहा?
लीलाधर मंडलोई: भोपाल आने की पूर्वकथा को एक लय में गूंथना ज़रूरी है। परिवार की माली हालत हमेशा खस्ता रही। कह सकते हैं पढ़ने का ख़र्च उठाना कठिन था। एक बहन और तीन भाई की पढ़ाई । फिर भी पाँचवी तक पेड़ों के नीचे। पाँचवी से आठवी तक एक जर्जर इमारत के साये में। उसके बाद गाँव से 9-10 किमी.दूर बड़कुई के मिशन स्कूल के लिए 9 से 11वीं तक पैदल चलने की कथा, पढ़ाई जारी रखने का संघर्ष। स्कूल और घर के बीच एक नदी, बरसात में जिसे पार करने के फेर में, डूबते बचा। लेकिन मन था घबराया नहीं। ये पढ़ाई भी कला संकाय में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।
    आगे पढ़ाई के लिए संकट थे। लेकिन पढ़ाई के श्रेष्ठ ट्रैक रिकार्ड की वजह से कई लोगों का दबाव था कि मेरी पढ़ाई जारी रहे। उन दिनों पिता अस्वस्थ थे। नौकरी छूट गई थी। उनके दमा, फिर लकवे ने सब बोझ माँ पर डाल दिया। मँझले भाई पढ़ाई छोड़ गाडरवारा में जीजाजी के पास टेलरिंग सीख कर लौटे ही थे। और एक छोटी सी दुकान खोल ली, जिसके जमने में कितना समय लगना था, मालूम नहीं। भाभी की वजह से बड़े भाई, जो खदान में नौकरी करते थे, अलग हो चुके थे। इन्हीं स्थितियों के बीच मँझले भाई ने जिम्मेदारी उठाई और रीजनल काॅलेज भोपाल के बी.ए.बी.एड (अंग्रेजी साहित्य) के इंटरव्यू के लिए जबरन गाड़ी में धकेल दिया। मैंने तब तक छिंदवाड़ा नहीं देखा था। मेरे पास एक झोला था। एक जोड़ी गाँव के मोची से खरीदी चप्पल। एक पैंट-कमीज और कुल जमा सोलह रुपये। अजानी जगह का सफर। रेलवे स्टेशन से काॅलेज तक कोई 20 किमी. की पैदल यात्रा। इंटरव्यू। सफलता। साथ में 75 रु. की स्कालरशिप।
    भोपाल में इस तरह गाँव का एक अंग्रेजी न जानने वाला बुद्धू अंग्रेजी-साहित्य की पढ़ाई के लिए रोते हुए घर छोड़ जा निकला। गाँव जहाँ संस्कृति की प्रारंभिक भूमि थी तो भोपाल सभ्यता की धरती बन उठी।


ओम निश्चल: यह न पूछूँगा कि भोपाल ने आपको क्या दिया। क्योंकि आप तो लिख ही चुके हैं कि अगर जीवन में भोपाल न होता तो मैं वह भी न होता जो आज हूँ। शहर हमें बहुत कुछ देते हैंµभाषा, मूल्य, संस्कृति, कला की समझ और प्यार। किसी और शहर ने फिर इतना कुछ दिया कि उसका ऋण अपने उ$पर महसूस होता हो।
लीलाधर मंडलोई: भोपाल ने पहला उपहार अंग्रेज़ी के साथ हिन्दी और उर्दू को जानने का दिया। बाद में कला और साहित्य को अर्जित करने का संस्कार। मेरे लेखक होने का बीजारोपण भोपाल में हुआ। सो उसे मैं अपनी बड़ी माँ का दर्ज़ा देता हूँ। भोपाल में मुझे वरिष्ठ लेखकों की छाया मिली। मनोहर और शिवचरण जैसे दोस्त। और मनोहर के परिवार का इतना स्नेह कि सात जनम ऋण चुकाने में कम पड़ें। भोपाल का तालाब और श्यामला हिल्स मेरे संबंधी से अधिक सगे बने। क्या नहीं मिला।
    मीर साहब को याद करते हुए कह सकता हूँµ
    ”आस्ताँ पर तिरे ही गुज़री उम्र
    इसी दरवाजे के गदा हैं हम“   

ओम निश्चल: कभी इस बात का क्षोभ रहा है कि मैं एक मजूदर परिवार में क्यों पैदा हुआ जहाँ दू-जून की रोटी भी ठीक से मयस्सर नहीं होती, और अक्सर देखने वालों की दृष्टियाँ भी मलिन और दुष्ट हुआ करती हैं।?
लीलाधर मंडलोई: मजूर परिवार में पैदा होने पर मुझे गर्व है।

ओम निश्चल: ‘दानापानी’ में आपने लिखा है कि संसार एक यातनाघर है। फरेबकारी से भरा हुआ। जीवन उसके भीतर क़ैद है, लड़ता हुआ। वहाँ धूप, सड़क, हवा, पानी, साँस लेने के लिए निरंतर जद्दोजहद है। यही मनुष्य का यथार्थ है। अपने संस्मरणों में आप अक्सर अमूर्तन में चले जाते हैं जैसे संस्मरणों को कविता के चोले में बदल रहे हों। यातनाओं और फरेबकारी से भरे हुए किन दिनों की यादें हैं ये?
लीलाधर मंडलोई: ये यादें दिल्ली की है। उन तीन सालों की जब मैं नौकरी बाहर था। यादें काव्यमय हैं। गुमनामी, पीड़ा और अपमान का दौर था। अपने को पहचानने का। तकलीफों से भरे समय को पाटने का। उस समय मैंने ‘लोहे के स्वाद’ जैसी प्रियतम कविता लिखी। ‘दिल का क़िस्सा’ जैसी किताब। और ‘मगर एक आवाज़’ जैसा संग्रह। उन दिनों के लेखन को याद करता हूँ तो फ़ज़ल ताबिश की पंक्तियों की ताकत का पता चलता हैµ
    ”शर्म ऐसी भी कहाँ की शर्म है
    दिल का क़िस्सा है तो कहना चाहिए।“
    सो ‘दिल का क़िस्सा’ ही लिखा। वह पाठकों के लिए अमूर्त हो सकता है क्योंकि भाषा पोएटिक है। संदर्भ होते हुए भी संदर्भ को पाठ में पकड़ने में व्यतिक्रम होता होगा। लेखन तिलिस्म की तरह होता है। मुक्तिबोध का साहित्य मुझे आज भी पूरी तरह पकड़ में आता हो, यह दावा ठीक न होगा। उनकी कहानियाँ भी जटिल है और कविताएँ भी। आलोचना के बारे में भी यही कहना उचित होगा। शमशेर जी ने उनके बारे में लिखा हैµ‘एक उ$ँची चट्टान...। जैसे शिलाओं पर शिलाएँ। झरने कहीं विरले हों। केवल गहरी बावड़ियाँ, सूखे कुएँ, झाड़-झंखाड़। उ$ँची नीची अनंत पगडंडियाँ...जैसे मालवा का पठार और म.प्र. की उ$बड़-खाबड़ धरती, और इस धरती के आतंकमय-रहस्यमय इतिहास और उनके बीच लहू-लुहान मानव...’ तो यातना और फरेबकारी को लिखते हुए ‘स्व’ का विस्थापन कब ‘सब’ में तब्दील होकर एक बड़ा केनवस ले लेता है यह लेखक को स्वयं भी पता नहीं चलता।

ओम निश्चल: मन से तो आप भावुक क़िस्म के इंसान हैं ही, उपर से कवि भी, तो जैसा कि यह दुनिया हैµस्वार्थी और फरेबी, उसमें भावुकता के चलते बड़ा घाटा उठाना पड़ता है। इन घाटों का कभी आकलन किया है आपने?
लीलाधर मंडलोई: जहाँ तक बात घाटों के आकलन की तो मेरे प्रिय कवि मुकुट बिहारी सरोज की पंक्तियाँ सारा कल्मष धो देती हैंµ‘तय है कि ऐसे में कुछ घाटे होंगे। लेकिन हमको ये सारे घाटे कुबूल हैं। क्योंकि अपना तो यही उसूल है।’

ओम निश्चल: सोहबत से रतजगों का बड़ा महत्व होता है। कविता, शायरी, बहसें, लिखने और छपनेµइस सबका रोमांच चैन छीन लेता है। क्या ऐसे रोमांच जीवन में आए हैं, खास तौर पर भोपाल, जबलपुर और रायपुर के दिनों में।
लीलाधर मंडलोई: आवारगी और रतजगे स्वभाव में बचपन से थे। लेकिन उनकी दिशा शायद रचनात्मक कम रही हो। लेकिन भोपाल, रायपुर, जबलपुर की अलमस्ती-बदमस्ती ने परिपक्व इंसान गढ़ने में खूब मदद की। पुराने भोपाल की सोहबत उर्दू और उसके कल्चर की वजह से बहुत हद तक सूफियाना थी। पुराना भोपाल अगर अपना ले तो एक कलंदरी भाव आपको मिल जाता है। यदि वहाँ के उन दिनों के ‘पाॅवर स्ट्रक्चर’ में फँस जाता तो एक तरह का शैतानी दिल वाला भी हो सकता था। जैसे कि कई उदाहरण हम सभी जानते हैं। मालिक उनका भी भला करें।

इयम् आकाशवाणी

ओम निश्चल: नौकरी में 76 में आए और आकाशवाणी से जुड़े। यों तो बहुतेरे लिखने-पढ़ने वाले लोग रेडियो और दूरदर्शन में होते हैं और अपने अपने स्तर पर जाने पहचाने जाते है। रेडियो की दुनिया तो आखिर लिखने-पढ़ने वालों की ही दुनिया है। आकाशवाणी से एक समय कई आला शख़्सियतें जुड़ी रही हैं। इन दिनों खास तौर से हिन्दी में लिखने वालों में आप हैं, कुबेरदत्त, नंद भारद्वाज, तेजिन्दर, लक्ष्मणेन्द्र चोपड़ा, कृष्ण कल्पित, शशांक, शैलेश पंडित, अरविन्द त्रिपाठी, हृषीकेश सुलभ, राजेश रेड्डी जैसी उर्वर प्रतिभाएँ हैं। दूसरी भाषाओं में भी अनेक नामचीन लोग होंगे। किन्तु मीडिया में आज साहित्य का कितना कोना बचा है। साहित्यकार की शख्सियत आज मीडिया के लिए क्या महत्व रखती है। उसके कहे का कोई मूल्य है क्या?
लीलाधर मंडलोई: लम्बा प्रश्न है। संक्षिप्त जवाब दूँगा। दौर आते है, जाते है। अच्छा होता है काम चलाउ$ भी। आकाशवाणी ने संस्कृति के दिग्गजों की छाया में अपना रूप पाया। उसका भौगोलिक और भौतिक स्वरूप जितना बढ़ा, उसकी तुलना में सांस्कृतिक विस्तार उपस्थिति के संदर्भ में संकुचित हुआ। यह बात मैं लेखकों-कलाकारों के संदर्भ में कहूँगा। किन्तु मुझे लगता है किसी भी दौर के बड़े-बड़े से लेखक या कलाकार पहले-पहल बाल या युवा कलाकार के रूप में आकाशवाणी से ही दृश्य में आए हैं। यह क्रम अभी भी टूटा नहीं है। यह विशाल नेटवर्क कहीं न कहीं, किसी न किसी भूमिका में सबको पकड़ ही लेता है।

ओम निश्चल: क्या सोचकर आकाशवाणी से जुड़े थे। क्या यह शुद्ध रोजी-रोटी कमाने का मसला था या यह तमन्ना भी थी कि इसके जरिए अभिव्यक्ति के खतरों से भी खेलने का अवसर मिलेगा?
लीलाधर मंडलोई: मैं भी ऐसे ही पकड़ा गया था आकाशवाणी भोपाल में। इसके जादू ने मुझे खींच लिया। मैंने आर्थिक रूप से बेहतर नौकरी छोड़कर इसे थामा था। और बहुत फ़ायदे, बहुत मजे में रहा। अगर कहीं और होता तो खो जाता। आकाशवाणी ने मेरा परिचय शब्द की सत्ता से कराया। ख़ासकर बोले हुए शब्द की ताकत से। संगीत की समझ यहीं विकसित हुई। एक और बात। इतनी भाषाओं और बोलियों से साक्षात्कार और उनके ध्वनि-सौन्दर्य को जितना रेडियो की नौकरी में समझा जा सकता है उतना अन्यत्रा नहीं।

ओम निश्चल: वैसे मंडलोई जी, अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने की कोई गुंजाइश मीडिया में है भी क्या? दूरदर्शन के कार्यक्रमों के दर्शक ही कहाँ रहे अब। आकाशवाणी भी दैवयोग से कौन सुनता है अब। इसलिए अभिव्यक्ति के इन सत्तापोषित चैनलों का क्या भविष्य है। क्या ये हमारी बैंकिंग टर्मिनलाॅजी में सिक यूनिट्स बन कर नहीं रह गये हैं?
लीलाधर मंडलोई: आज मीडिया लोक सेवक नहीं है। पूँजी का वाहन है। कह सकते हैं लक्ष्मी जी का उल्लू। सब कुछ ब्रांड आश्रित। लेकिन इसी मीडिया में अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने की कूव्वत है। बनिस्बत कम लेकिन है तो सही। मीडिया कितनी सरकारें हिला और गिरा चुका है। कितने अपराधियों की धज्जियाँ उड़ा चुका है। किन-किन को इसने एक्सपोज नहीं किया। हाँ उसमें असन्तुलन और विवेकहीनता भी बहुत अधिक है। न्याय की परिभाषा को भुला देने की हद तक।

ओम निश्चल: कई लोग सिस्टम को बदलने की महत्वांकाक्षा के साथ मीडिया में आए पर वे भी मीडिया के प्रभाव में ढलते गए। मैं जानता हूँ, मनुष्य को ब्रांड में बदलते मीडिया और बाजार के घटाटोप के आप ज्यादा हिमायती नहीं क्यांेकि आप लिख ही चुके हैं, इस तरह कला भी होगी ब्रांड आश्रित एक रोज...मेरी ख़रीद में अब ज़्यादा वक़्त तो नहीं...मैं इसे लिखता हूँ अपनी घायल आत्मा के प्रायोजित सफे पर...कि यही आगत भविष्य...।’ फिर भी जानना चाहूँगा कि बराबर बाज़ारवाद के विरुद्ध ज़िरहबख़्तर पहन कर लिखते हुए भी बाज़ार और मीडिया के सम्मुख हम लाचार क्यों नज़र आते हैं?
लीलाधर मंडलोई: मीडिया के सामने लाचार होने की कथा उसके सर्वाधिक शक्तिशाली होने में छिपी है। प्रतियोगिता में अनेक चैनल आएंगे। सैकड़ों हैं ह़जार की संख्या भी कम पड़ेगी यदि रेडियो स्टेशनों की संख्या जोड़ ले तो। लेकिन ‘जो रचेगा वही बचेगा।’ यह तय है।

ओम निश्चल: आकाशवाणी में भोपाल, रायपुर, छतरपुर और जबलपुर केन्द्रों में रहने के बाद आप अंडमान निकोबार द्वीप समूह के पोर्टब्लेयर केन्द्र पर भी रहे। वहाँ के जन-जीवन और आदिवासियों-जारवा तथा एकाधिक लुप्त होती प्रजातियों यथा शोम्पेन को लेकर अपने संस्मरण भी आपने दर्ज़ किए हैं। मेरी समझ में, अंडमान में होना आपके लिए कोई अज्ञातवास नहीं था, बल्कि एक नए और विरल ढंग का प्रवास था यह। अगर पूछूँ कि अंडमान ने लीलाधर मंडलोई को क्या दिया तो क्या कहेंगे। कहीं इन वर्षों को आप अपने जीवन के सर्वोत्तम समय का बट्टेखाते में चला जाना तो नहीं मानते?
लीलाधर मंडलोई: मुझे आकाशवाणी की छाया ने लिखने-पढ़ने में संवारा है, लेखक बनाने में बड़ी भूमिका निबाही है। जहाँ-जहाँ मैं रहा, मैंने भरपूर जीवन जिया। लोग जिसे ‘काला पानी’ कहते और आज भी डरते हैं। वहाँ मैंने जीवन का स्वर्णिम काल पाया। कोई कहे मुझे लेखक उसी ने बनाया है, तो मैं हाँ कहूँगा। वहीं रहकर मैंने समुद्र और उसके पर्यावरण, न्रेगिटो और मंगोलाइटस मूल की जनजातियों पर लिखा और देश को उनकी दशा-दिशा से अवगत कराया। मैं अंदमान-निकोबार द्वीप समूह की गहरी भूमिका को, अपने निर्माण में स्वीकार करता हूँ। मैं एक मनुष्य और लेखक के रूप में उसका ऋणी हूँ।


भोपाल: मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै

ओम निश्चल: अंडमान से पुनः आप भोपाल आए। शायद आकाशवाणी में, फिर स्थानांतरित होकर दूरदर्शन में। केन्द्र निदेशक के बतौर एक लम्बी पारी खेली है आपने। भोपाल की साहित्यिक आबोहवा में तब अशोक वाजपेयी की तूती बोलती थी। कला, साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों की दुनिया लगभग उन्हीं के इर्द-गिर्द संचालित होती थी। उनके कवि-कुटुम्ब के मध्य आपका स्वागत किस तरह हुआ। हालाँकि है तो आप भी मध्यप्रदेश के ही। भोपाल-वापसी लगभग घरवापसी थी और तब तक तो अज्ञातकुलशीलता की कोटि से भी आप उ$पर उठ चुके थे। फिर भी भोपाल पहुँचने का और अशोक वाजपेयी से मिलने का अनुभव कैसा रहा।
लीलाधर मंडलोई: अशोक जी कवि-आलोचक और संस्कृतिकर्मी के अलावा सम्राट अशोक भी थेµसंस्कृति के सम्राट तो मैं क्या पिद्दी और पिद्दी का शोरबा? तब तक कोई ऐसा कवि भी न था। लिखने-पढ़ने के सफ़र में ही था। तो मैं भी बिन बुलाए मेहमान की तरह था। तो स्वागत भी उसी शिल्प में था। और सच कहूँ तो दुनिया ही मेरे लिए आश्चर्य की तरह थी। आश्चर्य इसलिए कि संस्कृति का ऐसा प्रदर्शन जीवन का पहला अनुभव था। तो अशोक जी के कवि-कुटुम्ब में होने की मुझमें कोई पात्राता नहीं थी। एक कहावत है कि पहाड़ी को दो चीजों की रक्षा करनी चाहिएµअपनी टोपी और अपने नाम की। तो मेरे पास सिर्फ टोपी थी। नाम मैं खोज रहा था। लगता है अभी भी खोज रहा हूँ।
    वैसे अशोक जी से मैंने दूर से सही बहुत सीखा है। दरअसल अशोक जी जिस कमरे में बैठकर अपने काम करते थे, वह कमरा बहुत भीतर था। उसकी चाबी कुछ ही लोगों के पास हुआ करती थी। उनके व्यस्त लेखकीय जीवन में जबरन प्रवेश मुझे अपराध की तरह लगता रहा है। वो मैं कभी कर न सका। न कभी चाहूँगा। यह ज़रूर है कि वे कई कला इलाक़ों में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उनके काम में मेरी कोई भूमिका अव्वल तो होगी नहीं लेकिन उनका किया हुआ काम आगे बढ़े, फूले-फले, यह सदिच्छा मेरी हमेशा से रही है।

ओम निश्चल: भोपाल अशोक वाजपेयी के चलते तो साहित्य का केन्द्र बिन्दु रहा ही, वहाँ पहले से ही रहते आए मंजूर एहतेशाम, फजल ताबिश,...जैसे साहित्यकारों को भी एक अलग दुनिया रही है। उज्जैन से प्रभाकर श्रोत्रिय भी तब तक आ चुके थे। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, ज्ञानरंजन, भगवत रावत, कमलाप्रसाद तथा चन्द्रकांत देवताले का भी अच्छा खासा दबदबा रहा है। दूर बैठे विनोद कुमार शुक्ल की आवाज़ सबसे अलग हुआ करती थी और आज भी है। लोग समझते हैं राजधानी फ़तह कर ली तो झंडा गाड़ दिया। भोपाल में इस साहित्यिक बिरादरी के दबदबे के बीच अपने अस्तित्व को आपने कैसे प्रमाणित किया।
लीलाधर मंडलोई: भोपाल और म. प्र. के जिन वरिष्ठ लेखकों का आपने ज़िक्र किया है उन सभी का स्नेह मुझे मिला है और भरपूर। हाँ! जो फ़तह होने का सपना देखते हैं मैं उन लोगों में कभी नहीं रहा। यह ज़रूर चाहता रहा हूँ मुझ जैसे को भी अपना लिया जाये। देर-सबेर सही यह फल मैंने चखा। मैं तृप्त हूँ। मुझे अपनी कुपात्राता के बावजूद यह सब मिला।

ओम निश्चल: भोपाल से दिल्ली आकर भोपाल से बिछड़ने का अहसास तो होता होगा...इस बेदिल दिल्ली में आकर कैसा लगता है।
लीलाधर मंडलोई: भोपाल से उखड़कर मैं यहाँ आ तो गया लेकिन जड़ें वही छूट गई। उनमें अब भी नई-नई कोंपले फूटती रहती हैं जो यहाँ मेरी कविता में चली आती हैं और मेरी कविता हरी हो उठती है और दिल्ली के निर्मम पर्यावरण से लड़ने में मदद करती है। दिल्ली अब भी मीर, ग़ालिब और अमीर खुसरो की है। यहाँ अब नामवर जी, विश्वनाथ त्रिपाठी जी, राजेन्द्र यादव जी, कृष्णा जी, मन्नू जी, चित्रा जी, कुँवरनारायण जी, मैनेजर पांडेय जी, विष्णु खरे जी, विष्णु नागर जी, उदय जी, आलोक जी, मधुसुदन जी, अरूण जी रहते हैं और पड़ोस में विष्णुचन्द्र शर्मा जी का रहवास है। तो भरी-पूरी दिल्ली है। इसमें रहते हुए कभी बुरा नहीं लगा। जाने कितनों लोगों की उपस्थिति से यह दिल्ली है। दिल्ली खट्-मिट्टी है। आपको पसंद आए न आए, यह दूसरी बात है। अब ऐसे भी लोग इस दिल्ली में है, जिनके बारे में कहा जा सकता हैµ   
    सितमगरों को सितम से नहीं मिली फुरसत
    सितमगरों ने ख़ुशी का मज़ा नहीं चखा।

दिल ढूढ़ता है फिर वही फुर्सत के चार दिन...

ओम निश्चल: अधिकार सुख बड़ा मादक होता है...पदेन श्रद्धा की गंुजलक में डूबा हुआ अपना आपा कहीं बिसर जाता है, बिसर गयो हरिनाम की तरह। अपना आपा आपने कितना सँभाल कर रखा है।
लीलाधर मंडलोई: अधिकार, सत्ता या पावर की तरफ़ जो आपका इशारा है और जिसे आप ‘मादक’ कह रहे हैं तो हमारी माँ इन चीजों को भटियारिन बुलाती थी और रहीम का दोहा सुनाती थीµ
    ”भटियारी अरु लछमी, परै प्रेम रसमाँहि
    आवत बहु आदर करै, जात न पूछै बात“
    तो इसका सच मेरा समझा हुआ है। और मैं इस पदेन गुंजलक की माया से दूर रहा हूँ। लोग तो मुझे संभला हुआ मानते हैं। व्यस्तताओं के दूसरे अर्थ निकाले जा सकते है। पर मजबूरी को एप्रिशिएट करने वाला मन हो तो संबंधों में उष्मा बनी रहती है।

ओम निश्चल: जिस जगह इन दिनों आप है, मीटिंग ही मीटिंग, सरकार के बुलावे। व्यस्तताएँ ही व्यस्तताएँ। कभी मन नहीं करता इन व्यस्तताओं की बेड़ियाँ तोड़ कर फिर वही फुर्सत की रतजगे होµमित्रों को सुनते-सुनाते रहें।
लीलाधर मंडलोई: रतजगों की दुनिया पीछे छूट गयी। दिल्ली में रतजगों के लिए निकलने की हर कोशिश रसरंजन में रिड्यूस हो जाती है। यहाँ रतजगे सिर्फ वर्तमान साहित्य की शताब्दी शंृखला के दौरान थेµविभूति जी, नामवर जी, केदार जी, असगर वजाहत जी, गोविन्द प्रसाद जी, दिनेश कुमाल शुक्ल जी आदि। अब वो अख़लाक़ की दीवानगी कहाँ?

ओम निश्चल: मंडी हाउस के शिखर से दिल्ली की दुनिया बड़ी रोमांचक लगती है। कभी सोचा था, इस जगह से दिल्ली को निहारने का सुख मिलेगा।
लीलाधर मंडलोई: दिल्ली की खूबसूरती शिखर में नहीं दीखती। दिल्ली धँसने में समझ आती है। पुरानी दिल्ली, निजामुद्दीन इलाका, दिल्ली के भीतर के गाँव, सादतपुर, पहाड़गंज जैसे कुछेक इलाकों में गाहे बगाहे निकल जाता हूँ एक दम अकेला। चुपचाप। और थोड़ी सी दिल्ली मेरे हिस्से आ जाती है कुछ कविताएँ, कुछ गद्य के टुकड़े इसी आवारगी की देन है।

ओम निश्चल: मीडिया में न होते तो कहाँ जाते।
लीलाधर मंडलोई: अध्यापन में। और कहीं नहीं। यह विकल्प न होता तो पत्राकारिता।

ओम निश्चल: बचपन में कुछ बनने का सपना था क्या। क्या उस सपने का अनुवाद यही है, जहाँ आप पहुँचे हैं।
लीलाधर मंडलोई: मैं एक लेखक की तरह मरने का ख़्वाब पाले बैठा हूँ और आप मुझे दलदली शिखर की तरफ खींच रहे हैं। माफ करें! इस भाषा को मैं भीतर-बाहर दोनों जगह से जानता हूँ। मीडिया में पहली पायदान से यहाँ तक की यात्रा में एक ही सिद्धान्त पर चला हूँ कि नौकरी मन लगाकर करो और उसे एक कपड़े की तरह घर की किसी खूँटी पर रोज़ टाँग दो और अपने कारीगर रूप में लौट जाओ। फिर लिखना-पढ़ना या नाचना-गाना। और इस व्यस्त ज़िंदगी में भी फट्टयाने का समय निकाल लेता हूँ। बेड़ियों में बँधने की मजबूरी मैंने कभी नहीं पाली। और यदि आप नौकरी के अलावा कुछ और करते है तो नौकरी आपकी प्राथमिकता के केन्द्र में सिर्फ रोजी-रोटी तक होता है। दूसरी दुनिया बड़ी है और महत्वपूर्ण। बकौल क़ैफी आज़मी मुझे भी लगता हैµ‘इक यही सोज़े निहाँ कुल मेरा सरमाया है।’

ओम निश्चल: कितनी बार लौट आया हूँ, छू कर बंद किवाड़ तुम्हारे। कई बार दूरदर्शन की देहरी से ही मिलने की चाहत के बावजूद लौटना पड़ा है। तब लगता है कि अपना दोस्त जैसे किसी कैद में है। ऐसे में मुझे मुनव्वर राणा याद आते रहे हैं बहुत जी चाहता है कैदे जाँ से हम निकल जाएँ। ऐसी कोई कचोट भीतर उठती है क्या।
लीलाधर मंडलोई: जो मेरे नसीब में वक्त का तोहफा था वह मीटिगों में बहुत खोया। खोया दोस्तों की सोहबत, आनन्द में भी। उन दिनों मैं एक ऐसा कीट था जो जाल में फँस कर छटपटाया करता था। और निकल भागना चाहता था। कई बार भागा। मस्ती की। मजे लूटे। कई बार भागने के बाद पकड़ लिया गया पुनः।

ओम निश्चल: चलो, जितना भी सुलभ हैµछान कर, निचोड कर, मिले फुर्सत के पल कहाँ और कैसे गुजारते हैं।
लीलाधर मंडलोई: बच्चों के साथ। गिने-चुने दोस्त मिल जाएँ तो भाग्य। नहीं तो एकांत में लिखना-पढ़ना। या फिर दिल्ली से बाहर भाग जाना कि कोई पकड़ न पाएँ

ओम निश्चल: बाढैं पूत पिता के धरमे, खेती उपजै अपने करमे। पिता को कभी अपना दफ्तर दिखाया, कभी लगा कि काश पिताजी यह दफ्तर देख पाते जहाँ आप इन दिनों बैठते हैं
लीलाधर मंडलोई: भाई और बच्चों को छोड़कर किसी ने मेरा दफ़्तर नहीं देखा। पिता तो, आप जानते ही है, 73 में गुज़र गये। माँ और पत्नी को कभी लगा नहीं कि देखा जाए। न मैंने कभी कहा। उनके लिए ‘घर’ से सुन्दर कुछ नहीं। और अब मैं मंडी हाउस में नहीं हूँ। यहाँ कोई शिखर नहीं, उसका भ्रम है।
    (बातचीत की योजना दरअसल अचानक बनी। एक फौजी सम्पादक की तरह कमला प्रसाद जी का आदेश। ईमेल पर सवाल। फिर पटना से आकर रूबरू संवाद। इस बीच मंडी हाउस में बैठते हुए भी मंडलोई ने यह आभास न होने दिया कि वे तो अब दूरदर्शन के इस शिखर-छाया में बैठकर तबादले के आदेश की प्रतीक्षा भर कर रहे है। रह-रहकर प्रसाद की पंक्तियाँ कौंधती.... एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह। वे एक एक कर कागज-पत्तर समेट रहे थे, अपना प्रभार सौंप रहे थे। कल लैपटाॅप वापिस किया, आज टेलीफोन सरंडर। चलते वक्त कुछ फाइलें समेटी, कुछ किताबें रखी, लगभग साथ-साथ स्थानांतरित निजी सचिव से अंतिम बार कुछ मशबरा किया, और अगले कुछ ही क्षणों बाद वे मंडी हाउस से बाहर थे। इस विदा बेला में उनके साथ मेरे अलावा कुबेर दत्त, उद्भ्रांत, मदन कश्यप भी थे तथा लिफ्ट के बाहर उनके अनेक सहयोगी अधिकारी विनत मुद्रा में प्रणाम निवेदिन कर रहे थे। दूसरे दिन वे आकाशवाणी निदेशालय पहुँच चुके थेµअपने पुराने घर। ऐसी विस्थापित मनःस्थिति में भी मंडलोई ने बातचीत में कहीं आपा नहीं खोया। कई शाम हम देर तक बैठते बतियाते रहे, वैसे ही जैसे कुछ हुआ ही नहीं...µओम निश्चल)

ओम निश्चल: यात्राएँ आपको खींचती हैंµअवकाश देती हैं। ऐसी कुछ यात्राओं की यादें जो जीवन में कुछ बेहतरीन पड़ावों की तरह गुजरी हों।
लीलाधर मंडलोई: यात्राएँ यकीनन खींचती है। ग्रेट निकोबार की समुद्री यात्रा की याद एकदम ताज़ी बनी रहती है। पूरे हफ़्ते समुद्र में रहा और आँखों से पीता रहा। पहले संग्रह में ग्रेट निकोबार की यात्रा की अनेक कविताएँ हैं और गद्य भी। यूँ तो वहाँ 2 साल यात्राओं पर रहा लेकिन ग्रेट निकोबार के अनेक संस्मरण है। यह द्वीप भारत के अंतिम छोर पर है और बहुत रोमांचक। इसी द्वीप में समुद्र में दो नदियां हैं। मगरमच्छ हैं और शोम्पेन आदिवासी हैं। सदैव प्रसन्न रहने वाले।

कविता के सम्मुख

ओम निश्चल: आज कविता के सामने फार्म का कोई संकट नहीं रहाµकविता अब किसी भी फार्म में लिखी जा सकती है, बशर्ते यह कि वह कविता हो। पर कुल मिलाकर एक जैसी होती जा रही कविता को अलगाने के लिए क्या कोई रास्ता आपको सूझता है।
लीलाधर मंडलोई: इस बात में किंचित अतिशयोक्ति का भाव है। क्योंकि फार्म का संकट कवि के लिए सदैव बना रहता है। उसके फार्म से असहमति हो सकती है। उसके अधिकार की आज़ादी से नहीं। रसूल हमजातोव ने इस संदर्भ में पाठक से हुई बातचीत का ज़िक्र किया है। वे लिखते हैंµ
    µतुम्हारी कविताएँ कविताओं जैसी नहीं लगती।
    µमेरे लिखने का ढंग ही ऐसा है।
    इस कथन के आलोक में फार्म को लेकर लेखक क्या सोचता है, इसका पता चलता है। इसी तरह कवि सुदीप बनर्जी की एक बातचीत याद आती है कि ‘मैं एक साथ कई भाषाओं में सोचता हूँ’, इस तरह सोचने के कारण मुझे लगता है कि उनका फार्म अलग तरह से खड़ा होता है। यह सच है कि किसी ख़ास फार्म की नक़ल भी एक समय में खूब होती है किन्तु नक़ल असल का विकल्प तो नहीं होती। वैसे फार्म की विविधता में यह रहस्य छुपा है कि कुछ नया आने को है।

ओम निश्चल: मुझे लगता है, कविता में कहानीµसारा पुराना काव्य कविता में आख्यान ही तो है, और कहानी में कविता, जैसा कि आज है। यह रिपोर्ताज, रेखाचित्रा, बातचीत, नाटक किसी भी फार्म में लिखी जा सकती है पर इसे क्या सभी विधाओं में मिल जाना चाहिए या एक निश्चित फार्मेट और विधा के रूप में इसे प्रोटेक्ट किये जाने की ज़रूरत है।
लीलाधर मंडलोई: हर वस्तु अपने साथ नया रूप लेकर आती है। कई बार कवि अपनी प्रयोगशीलता में कारनामा कर दिखाते हैं। यह कई कारणों से हो सकता है जैसा मैंने सुदीप जी का उदाहरण दियाµतो इस संदर्भ में राजकीय संरक्षण का कोई फार्मूला लागू नहीं किया जा सकता। इसे कवियों पर छोड़ देना युक्तिसंगत होगा।

ओम निश्चल: कविता ने अब तक शिल्प के सारे लगभग गुण-धर्म आजमा लिए हैं। तो क्या केवल कथ्य वैविध्य के भरोसे ही इसे छोड़ देना चाहिए।
लीलाधर मंडलोई: कथ्य के भरोसे कविता लिखी जा रही है। यह पूर्ण सत्य नहीं। हर पीढ़ी में कुछ तेजस्वी कवि हैं जो कथ्य के साथ बाक़ी काव्यगत परंपराओं को केन्द्र में रखकर सफर तय कर रहे हैं। मुझे मनमोहन, नरेन्द्र जैन, देवी प्रसाद मिश्र, आशुतोष दुबे, पवनकरण, मोहन कुमार डेहरिया, निरंजन श्रोत्रिय और कई नाम हैं, जो सहज याद आ रहे हैं। यह कहना भी ज़्यादती है कि कविता ने शिल्प के सारे गुण-धर्म आजमा लिए हैं। हाल ही में आपने शिल्प को लेकर देवीप्रसाद मिश्र की प्रशंसा की है तो रास्ते अभी खुले हुए हैं।

ओम निश्चल: एक कवि अपने लेखकीय विकास में कुछ पड़ाव और मोड़ पैदा करता है। उसके कुछ टर्निंग प्वाइंट्स होते हैं, पर आपकी कविता कवित्व के बावजूद फिलहाल शुरू से एक जैसी क्यों लगती हैµउसमें मोड़, टर्निंग प्वाइंट्स नहीं दिखते। जैसे कुँवर नारायण में दिखता है, केदार जी में दिखता है। ‘ज़मीन पक रही है’ के एक बड़े मोड़ के बाद ‘टालस्टाय और साइकिल’ फिर एक बड़ा टर्निंग पाइंट है उनकी कविता में। विनोद कुमार शुक्ल की कविता हर बार अपने साँचे में नई दिखती रही है। ऐसे मोड़ साठ के बाद (वय की दृष्टि से) के जगूड़ी के लेखन में दिखते हैं। मुझे नहीं लगता, जगूड़ी, साठ के उम्र के पहले की-सी कविताएँ फिर लिखना चाहेंगे। क्या इस ओर आपका ध्यान गया है।
लीलाधर मंडलोई: कविता को लेकर टर्निग प्वाइंट्स की बात आपने उठाई है और अग्रज कवियों की चर्चा की है। मुझे लगता है मेरी यात्रा अभी इस लायक़ नहीं कि उनको सामने रख कर मैं अपने बारे में कुछ कहूँ। हाँ! मित्रों को लगा कि मैंने अपने कविता को पहले-दूसरे संग्रहों के मुक़ाबले कथ्य, भाषा और फार्म के स्तर पर ‘मगर एक आवाज़’ और ‘काल बांका तिरछा’ में बदला है। यदि आपको कोई टर्निंग प्वाइंट फिलहाल दिखाई नहीं देता तो कदाचित सच ही होगा। मैं कोशिश करूँगा कि कुछ नया कर सकूँ। यह और बात है कि कुछ लेखकों को वह दिखाई देता है, जो आप नहीं देख सके।

ओम निश्चल: जैसा कि उम्र का अपना अनुभव होता है। आपकी उ$ब ही आपका नया निर्माण करती है। बताइयेगा कि आप दूसरों से कहाँ कहाँ उ$बे हैं और खुद अपनी उ$ब से कोई नया रास्ता खोजा है।
लीलाधर मंडलोई: जब मुझे उ$ब होती है तो मैं उससे कहता हूँµबहुत हुआ मुझे विचार दो। आँखे लौटा दो। कान वापस कर दो। कुछ सामान लिखने को जुटाने दो। और उ$ब मुझे छोड़कर चली जाती हैं। मैं फिर से अपनी दुनिया में लिखने पढ़ने के लिए और लौट आता हूँ। वेणुगोपाल की पंक्तियाँ हैµ‘जेल में जो आधी रात होती है वह जेल के बाहर कभी नहीं होती।’ तो उ$ब जेल की तरह है। उससे बाहर आते ही आपको रचना की मेज़ मिल जाती है।

ओम निश्चल: कवियों का काम अपने समय की रचनाशीलता को ही अग्रसर करने का नहीं होता, उनका काम आलोचना को भी एक दिशा देना है। अभी हाल ही में एक साथ दस-दस कविता पुस्तकों  (कवि ने कहा सीरोज़µकिताब घर) का लोकार्पण दिल्ली में हुआ। इनमें कम से कम पाँच-छह कवियों की भूमिकाएँ तो निश्चय ही कविता पर नए सिरे से विचार करने की कार्यसूची सामने रखती हैं। मैं समझता हूँ, अब यह विचार करने का समय आ गया है कि अपनी-अपनी भूमिकाओं के बहाने कविता क्या कोई नया पथ प्रशस्त कर रही है?
लीलाधर मंडलोई: यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। कवियों के दस संग्रह आए हैं अपनी लिखी भूमिकाओं के साथ। इसके साथ ही एक चयन मेधा से आया है। इसका शीर्षक है ‘कवि एकादश’। इसमें ग्यारह कवि हैं। कुछ कवि काॅमन हैं जैसे विजेन्द्र और ऋतुराज। तो यह एक बड़ी सर्जनात्मक घटना है। पाठकों की जानकारी के लिए पहले कवियों के नाम बताना ठीक होगा। कवि हैंµविष्णुचंद शर्मा, मलय, देवताले, विनोद कुमार शुक्ल, भगवत रावत, नरेश सक्सेना, वेणुगोपाल, सुदीप बनर्जी, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, उदय प्रकाश, विष्णु नागर, लीलाधर मंडलोई, अनामिका और मदन कश्यप। विजेन्द्र और ऋतुराज का नाम उ$पर ले चुका हूँ। तो यह एक तरह से कविता के पुनर्जागरण की तरह है। ये कवि प्रगतिशील जनवादी विचारधारा के पोषक हैं। अशोक जी ने कहा है कि इनकी दृष्टि बाँई तरफ झुकी हुई है फिर भी बहुलता के अपने मुहावरे में इसे वे एक बड़ा उत्सव मानते हैं। सभी एक दूसरे से भिन्न हैं। सभी का अपना सिग्नेचर है। कविता को लेकर उनके विचार गणित की तरह साफ़ हैं। सभी के विचारों को एक उत्तर में नहीं समेटा जा सकता। कुछ आलोकित कण बुलेट प्वाइंटस मेंµ

कविता सर्वहारा के पक्ष में गवाही है।
कविता के सौंदर्यशास्त्रा का मूल बिन्दु मनुष्य और उसका श्रम है।
कविता में उपस्थित मौन में भी जन सामान्य की तैयारी का उद्घोष है।
कविता सिर्फ संवेदना जगाने का काम नहीं करती, उसमें व्याकुल करने के गुण अधिक हैं।
कविता में आश्चर्यजनक ढंग से वैविध्यपूर्ण जगत हैं।
जीवन, प्रकृति और जगत के पुनर्सृजन के जितने मौलिक उदाहरण इन कविताओं में है अन्यत्रा नहीं।
कविताएँ स्वायत्त आवाज़ के साथ परिदृश्य में है।
कविताओं में अपराध का आत्मस्वीकार है।
इधर की कविता हिंसा और क्रूरता को समझ और संवेदना में बदलने के काम में लगी हैं।
कविता पीड़ा और क्षुब्धता में स्पंदन का रास्ता खोज रही है।
कविता अन्याय से लड़ने की ताकत अबेर रही है।
कविता में नेपथ्य से अतिवचन नहीं, भूल वचन का ही कहीं कुपाठ न हो जाए।
कविता क्रूर सच्चाई की अश्लीलता का अतिक्रमण कर रही हैं।
कविता में व्यंग्य की वक्रता एक ताकतवर गुण हैं।
कविता की सत्ता तमाम बाहरी सत्ताओं का विरोध करती है।
कविता की जड़ें पुरानी हैं लेकिन उसके पल्लव हर बार नये हैं।
कविता में भटकना टीस पहुँचाना है।
शब्दों की पुलियों से दूरियाँ कम होंगी।
कविता जीवितों की बपौती नहीं, मृतकों की भी वसंुधरा है।
आलोचक जहाँ से कविता को समझना-समझाना शुरू करते है, वहाँ तक आते-आते कविता अपना ज़रूरी काम पूरा कर चुकी होती है।
    तो यह कवियों की बातें हैं और एजेंडा भी। अब कवियों के विचारों के इस अभ्युदय से एक नयी शुरुआत होगी। ऐसा नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण और अशोक वाजपेयी ने एक स्वर में कहा है। तो इसे 2008 में आलोचकों-समीक्षकों और खुद कवियों को देखना होगा।

मत कहो आकाश में कुहरा घना है

ओम निश्चल: नए लोगों पर आपने खूब लिखा है। समकालीनों की सोहबत में तो रहते ही आए हैं। पर ‘कविता का तिर्यक’ को जितना सुतीक्ष्ण होना चाहिए था, वैसा क्यों नहीं बन सकी।
लीलाधर मंडलोई: शमशेर जी की एक विलक्षण पंक्ति हैµ‘जो कुछ मैं कह रहा हूँ वह मेरा कवि कह रहा है।’ मैंने आलोचक होने की गरज से ‘कविता का तिर्यक’ नहीं लिखी। मेरी उसमें छोटी-सी अपनी बात है। जिसमें मैंने खुलासा किया हैµ‘यह किताब एक कवि को समग्र रूप से पढ़ लेने का न कोई दावा करती है, न ही समीक्षा या आलोचना में कुछ नया जोड़ने का स्वप्न देखती है। कविता लिखने के सुख के समकक्ष मुझे कविताओं को बौद्धिक रूप से समझने का आनन्द मिला, जो मुझ सरीखे पाठक के लिए उपलब्धि है।’
    तो मैं कहूँगा कि कविता में अंतर्निहित सौन्दर्य तक पहुँचने के लिए, मैं कविता या अन्य विधाओं पर लिखता रहा हूँ। अगर आप ग़ौर से देखेंगे तो बहुतेरी जगह वे निबंध हैं और उनमें एक अलग ढंग का लालित्य भी है। ‘सुतीक्ष्ण’ का अर्थ आपने जिस संदर्भ में किया है वह उचित ही होगा। लेकिन मैंने आलोचक होने के लिए नहीं लिखा। इस संदर्भ में शमशेर जी मेरे आदर्श रहे हैं। जिस हद तक नये लोगों के साथ तीखा होना चाहिए, हुआ भी हूँ लेकिन ‘सुतीक्ष्ण’ नहीं। हालांकि ‘तीक्ष्ण’ के आगे ‘सु’ लगाकर आपने मेरी मुश्किल हल कर दी है।

ओम निश्चल: अपने वक्तव्यों में, आलोचनाओं में निर्भयता अशोक वाजपेयी में भी है, नामवर जी में भी। निर्भयता विष्णु खरे में भी हैµवे कविता के बहुत सटीक भाष्यकार है और नाराजगी की परवाह भी नहीं करते। पर कभी-कभी जब वे हिसाब चुकता करने के अंदाज में आ जाते हैं तो उनका आलोचक दैन्य और कुंठा से भर उठता है। ऐसी आलोचना का विकास क्यों नहीं हो सका जो अपने अनुशीलन में कथावाचन की भूमिका न अपनाए, निर्मम हो तथा पाठ के निहितार्थ को बेलाग सामने ला सके।
लीलाधर मंडलोई: इसका उत्तर नामवर जी, अशोक जी और विष्णु खरे दें तो अच्छा है।

ओम निश्चल: आलोचना में ब्लर्ब के गुण समाहित हो रहे हैं। (ब्लर्ब आपने भी खूब लिखे हैं, विष्णु खरे और मंगलेश डबराल के बाद) इस संकट से निपटने के क्या रास्ते हैं।
लीलाधर मंडलोई: ब्लर्ब लेखन को मैं संकट से नहीं जोड़ता। उसके बहाने एक नयी किताब से गु़ज़रने के आनन्द को मैं खोना नहीं चाहता। ब्लर्ब लिखने के बहाने मैं समृद्ध हुआ हूँ और कुछ मेरा गद्य भी सुधरा हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी जी और विष्णु खरे जी का ब्लर्ब लिखते हुए, मुझे बड़ा आनन्द मिला। कम समय मिलने के बावजूद रात-रात भर पढ़कर, नोट्स बनाकर, मैंने ये ब्लर्ब लिखे थे। ब्लर्ब में किसी राजनीति, किसी व्यवसाय की गंध को मैं नहीं देख पाता। मैं लिखता हूँ। यह परवाह नहीं करता कि वह आलोचना है या कुछ और। मैं तो अपनी भाषा में ईमानदारी से कुछ कहता हूँ।

ओम निश्चल: मंडलोई जी, कवियों को अक्सर गुमान होता है कि कदाचित वे ही कविता के समझदार उपभोक्ता और पाठक हैंµआलोचक भी। उनके कहे की वैधता है। आलोचकों का काम सतही है। पर इन्हीं कवियों ने, आपसी बतकहियों के अलावा, कभी इस बात को मजबूती से रखा कि कौन-सी कविता कविता नहीं है और किन शर्तों को पूरा कर कोई कविता अच्छी कविता बनती है? क्या सारा अपयश मूड़े-माथे लेने का काम आलोचकों का ही है? आज तो जरा-सा यह लिख देने से कि अमुक कवि को आखिरकार अपने पाठकों की परवाह क्यों नहीं होनी चाहिए, वह कवि रूठ जाता है।
लीलाधर मंडलोई: ओम भाई, कवियों पर आपका इतना ग़ुस्सा क्यों? मानवीय कमजोरियाँ हर किसी में होती है। यह तो इतिहास में छुपा नहीं। क्या आत्ममुग्धता-आत्मश्लाघा के शिकार कथाकार, नाटककार, उपन्यासकार और आलोचक नहीं। वैसे जिन कवियों की तरफ आपका इशारा है उन्हें मैं जान पाता तो कुछ कहना उचित होता। अंदाज़न किसी के बारे में कुछ बोलना न्यायपूर्ण नहीं होगा।

ओम निश्चल: मैंने कभी कहा था, ‘दिल का किस्सा’ अपने समूचे स्थापत्य में आपकी कविताओं पर भारी पड़ता है। उसमें आपने अपने अंतकरण की सीवनें उधेड़ कर रख दी हैं। लेकिन यह बात भी मैं जब कहता हूँ तो आपको कदाचित लगे कि आपके कवि की उपेक्षा में यह बात कही जा रही है। फिर कहूँ कि ‘दाना पानी’ का गद्य तो कविता के फार्म में ही है। और भाई फिर ये डायरी-अंश भी आपकी कविताओं की चमक को कहीं कहीं निष्प्रभ कर देते हैंै। तो क्या बुरा कहता हूँ मैं। उठा ले और देख ले कोईµ‘दुख का पेटेंट’, ‘पाठक की आँख’ और ‘अंदाजे-सुखन’ तो शायद यही कहे जो मैं कह रहा हूँ। क्यों! बुरा लगा आपको?
लीलाधर मंडलोई: मेरे गद्य को लेकर अच्छी बातों के लिए अशेष आभार। एक बार कुछ भी लिखने के बाद वह ‘पब्लिक डोमेन’ में आ जाता है। तो पाठकों की राय सर-माथे पर। वैसे मैं यही कहूँगा कि आखिर यह कवि का ही गद्य है। अगर कवि न होता तो ऐसा गद्य भी कहाँ लिख पाता। मेरी कोशिश सिर्फ़ इतनी है कि मैं भाषा में सृष्टि को रचने का यत्न कर रहा हूँ कविता में भी और गद्य में भी। मुझे बुरा लगा हो ऐसा आपके संज्ञान में कब आया। यह भी कभी मैंने दावा नहीं किया कि मैं अच्छा कवि हूँ। हाँ! मेरे बहुतेरे पाठक गद्य की तुलना में कविता अधिक पसन्द करते हैं।

ओम निश्चल: मंडलोई जी, आलोचना-चर्चा को अभी मैंने विराम नहीं दिया है। यह सच है कि आलोचना में पस्ती का आलम है, पर इसमें व्याप्त गत्यवरोध को तोड़ने के प्रयत्न ही कहाँ हुए हैं? यहाँ तो उड़ती हुई पतंगों को काटने की व्यग्रता रहती है। देखें तो कायदे से कविता की आत्मा में प्रवेश करने वाले आलोचक कितने हैं? सत्तर के दशक के कवियों में धूमिल के बाद गंभीरता से किस पर काम हुआ है। जगूड़ी के कई संग्रहों पर एक कायदे की समीक्षा तक नहीं आई। विष्णु खरे भले ही आदमी कैसे हों, कविता में उनका जवाब नहीं। एक अलग किस्म की प्रजाति है वह। पर तत्वतः उन पर बात करने वाले लोग कहाँ हैं। कैलाश वाजपेयी को अध्यात्म के खाते में डाल कर छुट्टी पा ली गयी है, जबकि गए दशकों में उनके कई संग्रह आए। ‘भविष्य घट रहा है’ और ‘हवा में हस्ताक्षर’ कितने अनूठे संग्रह हैं। ऋतुराज पर कोई बड़ा काम नहीं हुआ। मलय को असाध्यवीणा मानकर भविष्य के हवाले कर दिया गया है। अभी ओम भारती ने ‘देखते न देखते’ पर मुक्त मन से लिखा है। ज्ञानेन्द्रपति ने अभिधा के सर्वोत्तम गुणसूत्रा को जिस खूबी से अपनी कविताओं में व्यक्त किया है, उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं है। उन्हें अकादेमी पुरस्कार न मिलता तो वे दिल्ली की दुरभिसंधियों के बीच ओझल ही रहते, उन पर कोई ठीक-ठाक विश्लेषण कहाँ हुआ है, जहाँ से विमर्श की नई राहें खुलती हो। अरुण कमल की नई उठान पर ठीक से लिखा जाना बाकी है। मैं पैराफ्रेजिंग की बात नहीं कर रहा। कविता के तात्विक विमर्श की बात कर रहा हूँ। क्या ऐसे विमर्श की जरूरत आप नहीं समझते। इसके लिए आलोचक आगे नहीं आते तो क्यों न ऐसी शुरुआत कवियों में से ही कोई करे?
लीलाधर मंडलोई: आलोचना तो बंधु, आलोचकों से भी रूठ गयी हैं। आज समीक्षाएँ लिखी जाती है दबाव में और एक किताब बन जाती है। ऐसा आलोचकों ने किया तो कवियों के लिए भी रास्ते खुल गये। फिर एक बात और, यदि कवि-कवियों पर लिखता है तो उस पर भी आपत्ति। यह आपत्ति कवियों की तरफ से पहले आती है। इस पर मुझे ताज्जुब है।

ओम निश्चल: अच्छा बताइये, आलोचकों की पिछली पीढ़ियों में और मौजूदा पीढ़ी में एक से एक कद्दावर लोग हैं, कविता की समझ को आगे बढ़ाने में और महत्वपूर्ण को एक हद तक रेखांकित करने में किन-किनका काम आपको उल्लेखनीय लगता है।
लीलाधर मंडलोई: आज आलोचना की सख़्त दरकार है। कविता का ही नहीं अन्य विधाओं में भी आलोचना का यही हाल है। हर युग अपने आलोचक लाता रहा है, उम्मीद है ऐसा फिर होगा। एक हमारे मित्रा हैं आदरणीय विजय कुमार। उन्होंने बहुत अच्छा काम शुरू किया था। उनकी किताब ‘कविता की संगत’ मेरी पसंदीदा कृति है। किन्तु उनके साथ जो कुछ हुआ, शर्म से सर झुक जाता है। यह बुरा हुआ। एक जनतांत्रिक स्पेस ज़रूरी है। ज़रूरी है असहमतियाँ। इस साहित्यिक दृश्य पर मुझे शकेब जलाली का एक शेर याद आ जाता हैµ
    ‘ये आदमी हैं कि साए हैं आदमीयत के
    गुज़र हुआ है मेरा किस उजाड़ बस्ती में’
नामवर सिंह जी, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, अशोक वाजपेयी, धनंजय वर्मा, नन्द किशोर नवल, प्रभात त्रिपाठी, प्रभाकर श्रोत्रिय, विजय कुमार, विनोद दास, रमेश दवे, वीरेन्द्र मोहन, राजेश जोशी और अरुण कमल के नाम सहज याद आते हैं। युवा कवियों में जो लोग काम कर रहे हैं उनमें पंकज चतुर्वेदी की आत्मकथा पर केन्द्रित आलोचनात्मक किताब रेखांकन योग्य मानी गयी है। पत्रिकाओं में प्रकाशित आलोचना लेखों के आधारपर वीरेन्द्र यादव और विनोद शाही का काम उल्लेखनीय है। आपका नाम जानबूझकर नहीं ले रहा।

ओम निश्चल: लेकिन फिर एक बात जो कही जानी चाहिए कि पैराफ्रेज में बदलती आलोचना में भाष्य है, कवि की पीठ पर समव्यथी हाथ है, पर जो नहीं है वह यही कि भाई यहाँ आपसे चूक हुई है, यह कविता नहीं है, यह कहने का साहस कम आलोचकों में है। क्योंकि बकौल दुष्यंत कुमारµमत कहो आकाश में कुहरा घना है/ यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
लीलाधर मंडलोई: ऐसा है इससे कोई इंकार क्यूँ करेगा। लेकिन जो अपेक्षित है वह भविष्य के गर्भ में होगा कहीं? इस तरह वेक्यूम नैसर्गिक है। बहुत उदास नहीं होना चाहिए। कभी-कभी मुझे लगता है आलोचना के साथ ही अन्य विधाओं के कमज़ोर होने में यह बात भी शामिल है कि ये समय आंदोलनविहीन है, सारे मुद्दों को बाज़ार निगल रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका को लेकर मुझे लगता है कि पूंजी के बल पर बहुत सारे महत्वपूर्ण मुद्दे चमक-धमक में दबा दिये गये। मीडिया सूचना अधिक बनकर रह गया और आम आदमी के सरोकार हाशिए पर चले गये। मीडिया में दलित, आदिवासी, गरीबी रेखा के नीचे के लोग कहाँ है? मेरी एक कविता हैµ‘आया क्रिकेट का मौसम/अख़बारों से विदा हुआ/ पन्ना खेती किसानी का/किसान विदा हुआ।’ यह गिरावट का दौर है मुद्दों के क्रमशः लुप्त होने का। समाज में जब तक एक शून्य बरपा रहेगा, धार क्रमशः कुंद होगी। संगठन कमज़ोर हो गये हैं। अब प्रलेस, जलेस, जसम आदि जुझारू संगठनों में भी तो धार नहीं रही। अधिकांश प्रतिबद्ध लोग एनजीओ में ट्रांसफर हो गये। ज़मीनी लोगों से जो बावस्तगी थी, वो कहाँ है। सिर्फ प्रलेस की सक्रियता से कुछ अधिक होगा, एकाएक उम्मीद नहीं की जा सकती। सारे संगठन कुछ पूर्वग्रहों और कट्टरताओं को छोड़कर जब तक एक नहीं होते, इस क्रूर और हिंसक समय से लड़ना असंभव होगा।

ओम निश्चल: माना कि आलोचना अपनी धार खोती जा रही है, उसका सूचकांक गिरा है। पर उस आलोचना के बारे में आपका क्या ख्याल है, कभी जिसके एक लेख की थरथराहट सालों महसूस की जाती थी। आज वह कहाँ है। उसके पन्नों पर बाकायदा सांस्कृतिक, वैचारिक युद्ध लड़े गये हैं। कितने कवियों की वह जन्मस्थली रही है। उस आलोचना के सूचकांक पर आपकी टिप्पणी? (इस प्रार्थना के साथ कि ईश्वर आपको सच कहने का साहस दे।)
लीलाधर मंडलोई: ‘आलोचना’ ही नहीं दूसरी पत्रिकाओं को भी एक वृहत्तर संदर्भ में देखना होगा। आपके कहे हुए से मेरी सीधी नाइत्तफाकी नहीं है। लेकिन उम्मीदें कहीं हैं तो इन्हीं साँस लेती पत्रिकाओं से ही हैं। ब्रेख्त ने कहा थाµ‘कठिन चीजें ही रास्ता दिखाती हैं।’ और कठिन चीजों का अस्तित्व अगर है भी तो वह साहित्य का मुद्दा बन नहीं पा रहा। कहीं लगता है कि चिंताओं में ग्लोबल मुद्दे अधिक हैं। ग्लोबल के परिप्रेक्ष्य में स्थानीय कठिन चीजों की स्पेस खत्म हो रही है। अगर हम स्थानीय नहीं तो ग्लोबल भी कैसे हो सकते हैं। इस दिशा में भी आत्ममंथन की दरकार है। भगवत रावत की कुछ पंक्तियाँ इस संदर्भ में मौजूँ हैंµ‘इतने डरे हुए हैं वे लोग कि ख़तरे को ख़तरा कहते हुए। ज़ुबान की तरह खुद लड़खड़ाने लगते हैं।’ मुझे लगता कविता में अभी भी आत्मसंघर्ष और आत्ममंथन कहीं अधिक गहरा है।

ओम निश्चल: आलोचना का फार्मेट बदलना चाहिएµयह तो सभी कहते हैं, पर इसका क्या स्वरूप हो, इस पर कभी सोचा है?
लीलाधर मंडलोई: दरअसल यह मेरा काम नहीं है। फिर भी लगता है पश्चिम के प्रभाव में हमारी आलोचना को एक चमक तो दी जा सकती है। हमारी भारतीय आलोचना की लम्बी विरासत और उसके सौंदर्यशास्त्रा को साथ लिये बगैर दूर तक नहीं जाया जा सकता। एक मौलिक फार्मेट की तरफ़ मुड़ना होगा। भारतीय जीवन से साहित्य आ सकता है तो आलोचना क्यूँ नहीं। यहाँ पाश्चात्य आलोचना की उपलब्धियों को नकारना नहीं उसे भी केन्द्र में रखकर एक रास्ता खोजना है। आचार्य शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अभी तक जीवित हैं लेकिन कितने मीडियाकर आचार्य काल-कवलित हो गये, कहने की ज़रूरत नहीं।

ओम निश्चल: आए दिन इस बात को रेखांकित किया जाता है कि अमुक कवि की कविता की व्याख्या के लिए अलग काव्यशास्त्रा की जरूरत है। ऐसी कोई कोशिश आपको हिन्दी आलोचना में दिखायी पड़ती है?
लीलाधर मंडलोई: फिलहाल तो नहीं। यह समीक्षा और टिप्पणियों का समय है। इस फार्मेट में काव्यशास्त्रा की अलग जरूरत को आजमाने की न जगह है, न अवकाश। इधर ‘आलोचना’ तो अभी ‘देव उठनी’ के समय के साथ विश्राम की मुद्रा अख़्तियार कर चुकी है।

ओम निश्चल: हिन्दी आलोचना के मानदंडों पर पश्चिमपरस्ती और अमेरिकी नव समीक्षकों की पदावलियों और अवधारणा के अनुकरण का जो आरोप लगाया जाता रहा है, खास तौर से नामवर जी के ‘कविता के नये प्रतिमान’ के सन्दर्भ में उदय प्रकाश ने यह बात उठायी थी, इससे आप कितना सहमत हैं?
लीलाधर मंडलोई: मैंने अमेरिकी नव समीक्षकों को केन्द्र में रखकर इसकी सूक्ष्म पड़ताल नहीं की है। अतः किसी काम चलाउ$ आब्जर्वेशन की आदत से बचना चाहूँगा। कुछ टिप्पणियाँ परिदृश्य में बने रहने के लिए की जाती हैं, मैं लेखक के धर्म को जानता हूँ और उसी का निर्वाह करता हूँ।

ओम निश्चल: साहित्य की समाजशास्त्राीय व्याख्या करने वाले मैनेजर पांडेय के टूल्स आपको कितने मौलिक लगते हैं?
लीलाधर मंडलोई: मैनेजर पांडेय हमारे समय के निःसंदेह बड़े आलोचक हैं। उनकी समाजशास्त्राीय व्याख्या को न केवल पसन्द करता हूँ बल्कि बहुत हद तक भारतीय आलोचना के लिए एक आलोकित रास्ता बनाने के अभियान में पाता हूँ। हाँ! वे ‘मुँह में ज़ुबान’ भी रखते हैं और ख़ूब रखते हैं।

ओम निश्चल: आलोचना में परमानन्द श्रीवास्तव आपको कहाँ खड़े दिखायी देते हैं?
लीलाधर मंडलोई: परमानन्द जी में समीक्षाभाव अधिक है। आवर्तन भी है। वे आशीर्वाद की मुद्रा में इधर कुछ ज़्यादा दिखते हैं। वे एक भले इंसान हैं। उनके इस गुण की मौलिकता का रंग जुदा है।

ओम निश्चल: यह जो आलोचना में दूसरी और तीसरी परम्परा की खोज और उसके दावे हैं, उनमें आपका कितना यकीन है। मूलतः पहली, दूसरी और तीसरी परम्परा क्या है। परम्परा का यह कैसा विभाजन है और इसका क्या औचित्य है। ‘आलोचना की तीसरी परम्परा’ पर तो आप भी बोले थे। क्या इस वर्गीकरण में राजनीतिक धड़ेबंदी का अनुकरण नहीं दिखता?
लीलाधर मंडलोई: दूसरी, तीसरी, चैथी परम्परा के शीर्षक में अनुकरण का भाव तो द्रष्टव्य है। इसमें साथ आने या लाँघने का भाव भी दीखता है। अंततः बात तो वही प्रमाणित होगी जिसे शमशेर जी कह गये हैंµ‘बात बोलेगी हम नहीं। भेद खोलेगी, बात ही।’ और वह कुछ हद तक तो खुल गयी है, कुछ भविष्य में खुल जायेगी।

ओम निश्चल: नई पीढ़ी के किन समीक्षकों में आपको यह दृष्टि दिखती है जो गतानुगतिकता और पल्लवग्राहिता के विरुद्ध चीजों को समझने का एक नया और अलग विजन रखते हों?
लीलाधर मंडलोई: युवा समीक्षक किसे कहें। हमारे दृश्य में तो 55-60 तक युवा होने का चलन है। फिर भी एक तेजस्वी समीक्षक ललित कार्तिकेय थे। उनके अपने आग्रह-दुराग्रह सख़्त थे। फिर भी उनमें एक संभावना थी। लेकिन उन्होंने अवकाश ले लिया है। ऐसा ही उदाहरण किन्तु भिन्न कि उनके आग्रह थे और वे भी अवकाश पर हैं। मेरा संकेत प्रभु जोशी की तरफ़ है। कला और साहित्य समीक्षा में उनके टूल्स एकदम अलग हैं और बहुत प्रभावी। वीरेन्द्र यादव और शंभुनाथ मुझे प्रिय और मौलिक लगते हैं। एक बड़ी सम्भावना ओम भारती में है किन्तु वे आकस्मिकता के दबाव में काम करते हैं। इधर नरेश चन्द्रकर को पढ़ा तो सम्भावना दिखी। समीक्षा-समझ मदन कश्यप में है और जितना भी पढ़ा उससे मुतास्सिर हुआ। आपकी डेमोक्रेटिक एप्रोच ने समीक्षा को एकायामी होने से बचाया है। यदि देवीप्रसाद मिश्र लिखें तो एक नयी मौलिक स्पेस सम्भव है। कुछ सकारात्मक लक्षण जितेन्द्र श्रीवास्तव, पंकज चतुर्वेदी में हैं किन्तु उत्खनन का काम पूरा होने के पहले वे उद्धरणों का अधिक सहारा लेने लगते हैंै। विस्तार की प्रवृत्ति हमेशा कारगर नहीं होती। वह भटकाव को ज़्यादा आमंत्राण देती है। एकान्त के पास भाषा है। कुछ औज़ार भी। लेकिन उन्हें पजने के लिए छोड़ना होगा। बद्रीनारायण में समाजशास्त्राीय आलोचना का तेवर मुझे आकर्षित से अधिक बाजदफ़ा चमत्कृत करता है। हाँ! इधर देवेन्द्र चैबे की समीक्षा में उम्मीद की उजास के दर्शन होते हैं। एक बेहतर संभावना और नया विकल्प खुला हुआ है। माखन लाल चतुर्वेदी की कविता की पंक्तियाँ संघर्ष के संदर्भ में हैं, आज़ादी के स्वप्न देखतीं, यहाँ भी मौजू हैंµ
    ”वह कली के गर्भ से फल रूप में अरमान आया।
    देख लो मीठा इरादा किस तरह सर तान आया।“

ओम निश्चल: एक जरूरी नाम आप भूल रहे हैंµयतीन्द्र मिश्र। देवी प्रसाद मिश्र ने अपने अप्रकाशित इंटरव्यू में कहा था, यतीन्द्र मे अवध की कूक, अवसाद और वक्रता है।
लीलाधर मंडलोई: यतीन्द्र मिश्र की आलोचना में एक खास बात मैं देखता हूँ कि वे संगीत, सिनेमा, चित्राकाल, नृत्य जैसी रूपंकर विधाओं से गहरे तक इन्टरएक्ट करते हैं। तो इन विधाओं का शास्त्राीय ज्ञान उनकी आलोचना को एक नई भाषा अर्जित करने की तरफ ले जाता है। मैं उनके ग्राफ पर यथासंभव नजर रखता हूँ।

मेरे समकालीन, मेरे सहचर

ओम निश्चल: अपने समकालीनो की कविताओं को पढ़ते-गुनते हुए क्या विचार मन में आते हैं। यह भी कि पिछली पीढ़ी के वरिष्ठ कवियों और सहचर युवा कवियों के समवेत संसार को आप किन-किन विशेषताओं के लिए याद करतें हैं?
लीलाधर मंडलोई: मैं अपने समकालीनों और अग्रजों की कविता के साथ बड़ा हुआ हूँ। आज जब सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि कुछ लोगों को अपनी तरह से याद करूँ, जो मेरे प्रिय कवि हैं। मैं बुंदेलखंड का हूँ। छतरपुर में नौकरी के दौरान आदरणीय केदारनाथ अग्रवाल से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन दिनों स्वर्गीय प्रमोद पांडे मेरे मित्रा हुआ करते थे। हम केदार जी की कविता ढूँढकर पढ़ा करते थे। उनमें मुझे बुंदेलखंड के उस इलाके की प्रकृति का सौन्दर्य, केन नदी की आभा और विस्तार तथा श्रमिक वर्ग के साहस और निर्मलता के जो सहज दर्शन हुए, उसमें मैं चमत्कृत रहा। सायास विन्यास से मुक्त हैं उनकी कविताएँ। अन्याय के विरुद्ध खुली आवाज और एकदम प्रत्यक्ष।
    इसी क्रम में मुक्तिबोध जी को याद करना चाहता हूँ। छत्तीसगढ़ में श्रीमती मुक्तिबोध से परिचय और उनके पुत्रा दिवाकर से दोस्ती ने सचमुच मुझे उर्जा दी। रायपुर में ही मैंने सिलसिलेवार मुक्तिबोध को समझने की कोशिश की। कई बार कविता में आये बीहड़ बिम्बों को समझने के लिए विभु कुमार जी से बातें की। दरअसल उनका केनवास अत्यंत विराट है। वे युग की बातें करते हैं। अद्भुत इशारे हैं सत्ता के चरित्रा को लेकर। गहरी उद्विग्नता। सतह के नीचे बहुत सी हलचलें। विचारों की दीर्घ शृंखला। आतंक और रहस्य की इमेजेस। कविता में न हारने वाले योद्धा की आइडेंटी वाली छवि। उनका जीवन किसी भी कवि के लिए आदर्श है। कवि जो मरता है पर हार नहीं मानता। अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हुए विदा होता है। ‘अँधेरे में’ की ये पंक्तियाँ मुक्तिबोध के जीवन पर सटीक हैं, मेरे जेहन में जब उनका नाम आता है, ये भी चली आती हैंµ
    खोजता हूँ पहाड़...प्रस्तर-समुंदर
    जहाँ मिल सके मुझे/ मेरी वह खोयी हुई
    परम अभिव्यक्ति अनिवार/आत्म संभवा
    और
    मुझे पुकारती हुई पुकार खो गयी।
   
    इसी तरह जो पंक्तियाँ सदैव पीछा करती हैं वे आदरणीय त्रिलोचन की हैµ‘दोनो पाँव काट दो। फिर भी मैं चलूँगा। अपनी राह। दोनो हाथ काट दो। फिर भी मैं बजाउ$ँगा। अपनी धुन। फिर भी मैं देखूँगा। अपना सपना।’ त्रिलोचन का कविता और जीवन में स्वभाव कड़ियल था। भाषा को समझने और वापरने का उनका अंदाज निराला था। अपनी तरह से साॅनेट रचे। उसका छंद निर्मित किया। वे मौलिक थे। विरल सर्जक थे। मुझे नागार्जुन, शमशेरµदो ध्रुवांतो पर रहते हुए ‘संगामन’ लगते हैं। रघुवीर सहाय ने जिस तरह कविता मुहावरा बदला, वह विरल मिसाल है। वे कविता में लोकरंग का पाठ-पुनर्पाठ जिस निर्ममता और निस्संगता से करते हैं, वैसा देखने में नहीं आता। धूमिल और राजकमल चैधरी मुझे बेहद खुरदरे और तीक्ष्ण संवेदना वाले कवि लगते रहे हैं।
    केदारनाथ सिंह की कविता के पास में पूरी विनम्रता के साथ जाता हूँ। वहाँ लोक और नागर जीवन की अविस्मरणीय छवियाँ है। उन्होंने बहुत-सी अमर कविताएँ दी है। ‘बाघ’ मेरी प्रिय कविता है। बनारस और गाँव के जीवन वाली कविताओं में बार-बार लौटता हूँ।
    विष्णु खरे यकीनन विलक्षण कवि हैं। कविता के फाॅर्म को बदलकर उन्होंने एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट दिया। उनके फाॅर्म की अंधाधुंध नकल की चपेट में कई कवि खेत होने को हैं।
    अपना मुहावरा गढ़ने वालों में और उसे क्लासिकल उ$ँचाई देने में कुँवर नारायण को हिन्दी कविता शायद ही भुला पाए।
    जिन अन्य अग्रज कवियों को मैंने उनकी भाषा, वस्तु, फाॅर्म के लिए सम्मान से बार-बार पढ़ा है और उनकी कविताओं से नये अर्थ ग्रहण किये हैं उनका उल्लेख जरूरी हैµविनोद कुमार शुक्ल का फाॅर्म और कहन अन्तिम है। मलय की काव्य-जिजीविषा और असमतल फाॅर्म मौलिक है। विष्णुचंद्र शर्मा की दृष्टि स्थानीय होकर भी वैश्विक है। जगूड़ी का केनवस और एप्रोच एकदम जुदा है। ऋतुराज में जो विषय के साथ हर बार नये ढंग से ‘प्ले’ करने और नयी अर्थ छवियों को खड़ा करने का कमाल हासिल है वह उनका ऐसा हासिल है जो दूसरी जगह कम देखने को मिलता है। देवताले की काव्य दुनिया में जो लोकेल्स, किरदार, प्रसंग और काल है वह पुरखों से भविष्य के हवलदारों तक पहुँच बनाते हैं। उनकी समकालीनता राजनैतिक चेतना से भरी-भरी है। सुदीप बनर्जी अपनी तरह के सबसे मौलिक कवि हैं सबसे अधिक नैतिक। भाषा में सर्वाधिक प्रयोगशील। नरेश सक्सेना की वैज्ञानिक दृष्टि और संवेदनशीलता में आई कविताओं ने हिन्दी कविता को समृद्ध किया है। वेणुगोपाल की कविताएँ अपने फाॅर्म में सर्वाधिक सरल और संप्रेषणीय हैं।
    प्रभात त्रिपाठी की आलोचना ने अनदेखी की है। लेकिन उनकी कविताओं को नए सिरे से देखने की जरूरत है। भगवत रावत को जब-जब पढ़ता हूँ। भवानी प्रसाद मिश्र की दुनिया में लौटता हूँ जहाँ उनकी सतपुड़ा कविता में अपनी आँखें खोलता हूँ। उनके उच्चरित शब्द की महिमा का चमत्कार पूरी जन प्रतिबद्धता के साथ भगवत रावत में देखता हूँ। अशोक वाजपेयी के पहले संग्रह की कविताएँ अभी तक याद हैं। ‘पोते’ के लिए कविता में प्रार्थना की-सी लय है। इब्बार रब्बी और पंकज सिंह इसी दौर के अल्प चर्चित उल्लेखनीय कवि है।
    राजेश जोशी, अरुण कमल, मंगलेश, उदय प्रकाश, विष्णु नागर, असद जै़दी के अलावा विजय कुमार, विनोद दास, ओम भारती, सुधीर सक्सेना और राजेन्द्र शर्मा के साथ ही तीन प्रमुख नाम हैं जिनके बिना कथित 80 का दशक अधूरा है मनमोहन, नवीन सागर और नरेन्द्र जैन। इन कवियों ने कथित सातवें के बरक्स कविता को एक नया वातावरण दिया। कविता पर गद्य लिखकर अपने काव्य-काल को पहचान से अधिक आंदोलन की शक्ल दी। यह पीढ़ी जुझारू थी। इसने अपने लिखे को आलोचना से मनवा लिया।
    इस दौर में एक लम्बे समय की प्रतीक्षा के उपरांत जो महत्वपूर्ण कवयित्रियाँ, दृश्य के एकांगीपन को ख़त्म करती हैं वे हैंµगगन गिल, सविता सिंह, अनामिका, कात्यायनी। कवियों में कथित नवें दशक की यात्रा शरद बिल्लौरे के साथ शुरू होती है और कई कवि एकरस काव्य समय में नये आयाम जोड़ते हैंµदेवी प्रसाद मिश्र, बद्री नारायण, बोधिसत्व, पवन करण, एकांत श्रीवास्तव, आर. चेतनक्रांति, विमल कुमार, हेमंत कुकरेती, नीलेश रघुवंशी, निर्मला गर्ग, प्रताप राव कदम, निरंजन श्रोत्रिय आदि। ठीक इसके साथ यात्रा शुरू करने वाले जिन कवियों के अर्थवान काव्य लेखन को देखता हूँ तो अनीता वर्मा, आशुतोष दुबे, मोहन कुमार डेहरिया, अनूप सेठी, अनिल गंगल, नासिर अहमद सिकंदर, निर्मला पुतुल, शरद कोकस, माँझी अनंत, ब्रज श्रीवास्तव, हरिओम राजोरिया, सविता भार्गव, सुंदर चंद ठाकुर, जितेन्द्र श्रीवास्तव, कुमार मुकुल, महेन्द्र गगन, अनिल करमेले, कुमार वीरेन्द्र, मनोज मेहता, अनिल त्रिपाठी की सहज याद आती है। ये कवि मिल जुलकर विषय, भाषा और फाॅर्म के स्तर पर बहुत कुछ नया जोड़ते हैं। इस दौर में बलराम गुमास्ता को लगभग खोने का दुक्ख है। मेरी यादों में एक चिंता है कि नया करने और भाषा में अपने मुहावरे को अर्जित करने में बहुत से कवि हैं जो कम गंभीर दीखते हैं। उन्हें रिवाइवल की सख़्त जरूरत है।
    वैसे इसे दर्ज़ किया जाय कि मैंने इनसे कुछ न कुछ ग्रहण किया है। मेरे भटकाव में इन्होंने मुझे पुनः कोई न कोई राह, अपनी कविताओं से दिखाई। इन्हें याद करने में एक कृतज्ञता-भाव भी है।

ओम निश्चल: प्रेम कविताओं के थोक रचयिता आप भले न हों, प्रेम के प्रति आस्था तो आपमें कूट कूट कर भरी हैं । अशोक वाजपेयी के बाद समकालीनों व युवा पीढ़ी में प्रेम कविताओं के महासमर में कोई दिखता है क्या। यों प्र्रेम की पातियों की कमी नहीं पर दिल के किस्से की तरह बयान करने व  प्रेम का उत्ताप दर्ज करने वाले कवि तो विरल ही हैं। इस सम्बन्ध में आपका अध्ययन क्या कहता है। कोई सूची पत्रा, कोई आकलन?
लीलाधर मंडलोई: प्रेम कविताओं का जिक्र हो तो केदारनाथ अग्रवाल के ‘जमुन जलतुुम’ को नहीं भूलना चाहिए। उसमें प्रेम की-सी सरलता और जो उदात्तता है वह बाद की कविताओं में कम मिलती है। आप बात को आग्रहपूर्वक अशोक वाजपेयी पर जरूर खीच लाते हैं उन्हें मुझ जैसे कवि की सहमति-असहमति या प्रशंसा की जरूरत नहीं। मैंने उन्हें ध्यान से पढ़ा है। प्रेम कविताओं के बहाने उनकी देह तक पहुँच से विस्मित हूँ। वे केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा में नहीं आते। शमशेर जी का अनुकरण भी सौंदर्यबोध के संदर्भ में कम करते हैं। लेकिन उनकी कुछ प्रेम कविताओं को मैंने अलग से संजोकर रखा है कभी लिखूँगा। लेकिन प्रेम कविताओं को जिन कवियों ने नया मानी दिया है, उनकी चर्चा जरूरी है। चंद्रकांत देवताले, विष्णु नागर, नरेन्द्र जैन, ध्रुव शुक्ल, विजेन्द्र, नीलेश रघुवंशी, अनीता वर्मा, सविता सिंह, अरुण आदित्य आदि। इनकी कविताएँ भी अलग सुरक्षित कर रखी हैं। इनकी कविताओं में दूसरा केनवस है और दृष्टि। कितना कुछ देखने-लिखने को शेष है। मेरा तो एक संग्रह है ‘क्षमायाचना’। कई प्रेम कविताएँ है इसमें जो अलक्षित चला गया।

ओम निश्चल: युवाओं में अभी हाल में आया सबसे ध्यानाकर्षी संग्रह किसका हैµयानी यकीन की आयतें, अंतिम पंक्ति में (नीलेश रघुवंशी), इसी काया में मोक्ष (दिनेश कुशवाहा), दूब धान (अनामिका) , याज्ञवल्क्य से बहस (सुमन केसरी), हृदय की हथेली (पुष्पिता), जुगलबंदी (निरंजन श्रोत्रिय), बोली बात (श्री प्रकाश शुक्ल), विलाप नहीं (कुमार वीरेन्द्र), उनका बोलना (मोहन कुमार डेहरिया) आदि के मध्य।
लीलाधर मंडलोई: युवा कवियों के इन संग्रहों में नीलेश का ‘अंतिम पंक्ति’ में सशक्त है। वह नये विषय-लोक में जाती हैं। अपने आसपास के जीवन पर मार्मिक और तरल दृष्टि रखती हैं। ‘जुगल बंदी’ में हमें निरंजन की ग्रोथ साफ दिखती है। शीर्षक कविता अकेली ही संग्रह को अलग से खड़ा करती है। इसका विषय, लोकेल और संदर्भ एक बड़ी कविता की इमारत को आकार देते हैं। आशुतोष के नये संग्रह ‘यकीन की आयतें’ को पढ़ते हुए लगा कि उसने अपने आपको तोड़ा है। भाषा और फाॅर्म से अधिक वह जीवन में लौटा हैं। कुमार वीरेन्द्र का संग्रह हाशिए के महानगरीय जीवन को पहले-पहल सामने लाता है और तलछट के यथार्थ को उजागर करता है। इस बीच नरेश चंद्रकर का नया संग्रह मुझे विशेष उल्लेखनीय लगा। बाक़ी संग्रहों को अभी पढ़ा नहीं है गंभीरता से। जितनी कविताएँ देख पाया हूँ। उससे सकारात्मक राय बनती है।

ओम निश्चल: साहित्य में धड़ेबंदियाँ जग जाहिर हैं, वैचारिक वाद-विवाद भी होते रहे हैं। बल्कि वाद-विवाद तो साहित्य की सेहत के लिए पोषक तत्व की तरह हैं। पर पिछले दिनों कुछ ज्यादा की कटुताएँ देखने को मिली। रवीन्द्र कालिया के संस्मरण पर कृष्णा सोबती का बज्र प्रहार, खंडित दाम्पत्य की तहों को उधेड़ता हुआ असीमा भट्ट का आलेख, नया-ज्ञानोदय में विजय कुमार के मूल्यांकन पर युवा कवियों के निरंकुश वक्तव्य, ब्लाग पर घमासान, बोधिसत्व जैसे संवेदनशील कवि का विजयकुमार पर शाब्दिक हमला, नासिरा प्रकरण, लेखकीय परिचय देने की रीति को लेकर कालिया पर युवा टोली का हल्ला बोल, रवीन्द्र कालिया की टिप्पणी से नाराज ज्ञानरंजन का संबंध तोड़ लेने की हद तक उठाया गया सख्त कदम, सब कुछ साहित्य के भीतर चलते शीतयुद्ध की गवाहियाँ हैं। इस प्रसंग में क्या कहना है आपका?
लीलाधर मंडलोई: वाद-विवाद यदि स्वस्थ हैं तो उनकी उपस्थिति मंगल के लिए होती है। यदि कटुताओं को जन्म देती हैं, इनका प्रसार होता है तो पाठकों का विश्वास डिगता है। शक्ति केन्द्र के थानेदार होने का सुख यदि अश्लीलता से भर उठे तो सामाजिक मर्यादाओं और मूल्यों को धक्का लगता है। मैं इन्हें दुर्भाग्यपूर्ण मानता है। फिर इस तरह का बिन सोचे का एक्शन तीखा रिएक्शन तो लगाएगा। जवाब देने वाला सवा सेर हो तो कोई शमी कोटर में मुँह छिपाने को नहीं मिलता। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इससे युवा कवि भी अछूते नहीं रहे। उनका काम लिखना है, विवादों से रोमांस करना नहीं। धीरज से सोचने और साहित्य में इसकी परंपरा के ग्रेस को आत्मसात किये बगैर एक सकारात्मक वाद-विवाद सम्भव नहीं है। मैंने इन विवादों पर गम्भीरता से ध्यान दिया है। दुखी हूँ। मैंने कुछ कविताओं में इस दुख को उजागर किया भी है। दो उदाहरणµ‘शरीर में भिदी गोली। निकल गई। दर्द निकल गया। भर गया घाव भी। जो घाव मन में हुआ। किसी के पास नहीं था उसका इलाज।’ और एक कविताµ‘पहचानो शब्द की ताकत। शब्द उचारने के पहले। सौ बार सोचो।’

ओम निश्चल: यह दौर स्त्राी लेखकों की आत्मकथाओं का है। पिछले दिनों मन्नू भंडारी और प्रभा खेतान की आत्मकथाएँ आईं और अब मैत्रोयी पुष्पा की आत्मकथा का ताजा खंड-‘गुड़िया भीतर गुड़िया’। ‘देहरी भई बिदेस’ शीर्षक से राजेन्द्र जी स्त्रिायों की आत्मकथाओं का संपादित संचयन निकाल ही चुके हैं। अब कोई राजेन्द्र जी और मन्नू जी के पर्सनल एकाउंट में झाँक कर क्या करे? प्रभा खेतान के पास दरअसल एक ही कहानी है, जिसे वे अपने उपन्यासों के साथ साथ आत्मकथा में भी फेंट रही हैं। रमणिका गुप्त की ‘हादसे’ पढ़ कर लगता है, हिन्दी लेखकों के पास लिखने को क्या यही सब है! हाँ, मैत्रोयी जी में आत्मकथा को एक हद तक विमर्श में बदलने का माद्दा है। पर राजेन्द्र-छाया से वे भी पूरी तरह मुक्त नहीं हो पायी है। ज्यादातर आत्मकथाएँ आखिरकार अपने भीतर की उमड़-घुमड़ से बाहर क्यों नहीं आ पातीं।
लीलाधर मंडलोई: ‘आत्मकथा’ सिर्फ पर्सनल एकाउंट का प्रकाशन नहीं। आप उसमें एक माध्यम हैं और एक युग की कथा कहते हैं। अपने जीवन के बहाने समय के कई महाजीवनों की कथाओं का उजागर करते हैं। संस्मरण के कई फुटकर टुकड़ों को जोड़कर आत्मकथा बनाने का भी एक चलन है। रसूल हमजातोव का ‘मेरा दागिस्तान’ आत्मकथा ही है और वहाँ पूरा अवार काल, संस्कृति और इतिहास बिना लाउड हुए कालजयी रचना बन जाता है। ऐसी किसी एपिकल कोशिश के बिना ‘पर्सनल एकाउंट राइटिंग’ साहित्य में समादृत आत्मकथा की परम्परा में किस हद तक मान्य होगी, सोचना होगा। मैंने सिर्फ दो ही किताबें हाल में खरीदी हैं मन्नू जी और मैत्रोयी जी की। फिलहाल झंझटों में पढ़ नहीं पाया हूँ। अतः ब्लर्ब पढ़कर कुछ कहना बेशर्मी होगी, अपराध होगा। कभी बाद में लिखूँगा या जरूर कहूँगा।

दिल का किस्सा है तो कहना चाहिए
मंडलोई जी, चलिए आपके पर्सनल एकाउंट की ओर लौटते हैं।

ओम निश्चल: बताइये, खुशियों को कैसे सेलीबे्रट करते हैं?
लीलाधर मंडलोई: खुशी का प्रतिशत बेहद कम और बाज-दफ़ा उ$ब के शिल्प में रहा है। शायद किसी लेखक ने इतने कोर्ट कचहरी के दिन और भीतरी विस्थापन न देखे होंगे। फिर भी खुशी अपने लिए कम और परिवार तथा दोस्तों के लिए सेलेब्रेट करता हूँ। ऐसे दोस्त कम हैं जिनके साथ यह किया जा सके। कारणों में नहीं जाउ$ँगा।
    सेलेबे्रट उन्हीं दोस्तों के साथ किया जाता सकता है जो आपके हों और आपके मन को उम्दा ढंग से पढ़ सकें। जिनमें पूर्वग्रह न हों। मसलन महाराष्ट्र में आल्हाद पंडित। छिदंवाड़ा में हनुमंत मनगटे, मिर्जा हासम बेग। भोपाल में इलाशंकर गुहा, दिनेश जुगरान, प्रभुनाथ सिंह आजमी, हरि भटनागर, राजेन्द्र शर्मा, श्रीराम तिवारी, ओम भारती, मुकेश वर्मा, महेन्द्र गगन, आनन्द सिन्हा और बलराम गुमास्ता। दिल्ली में सुदीप बनर्जी, विष्णु नागर, मनोहर बाथम, शरद दत्त, अरविंद जैन और सुधीर सक्सेना। जबलपुर में ज्ञानरंजन, मलय, वीणा तिवारी, बसंत मिश्रा और राजेन्द्र दानी। सागर में वीरेन्द्र मोहन, शिवरतन यादव। लखनउ$ में नरेश सक्सेना, हैदराबाद में वेणुगोपाल, छत्तीसगढ़ में विनोद मिश्र, शरद कोकास, एस. अहमद, पन्ना से हेमन्त और वीणा जो अब भोपाल में हंै। इंदौर में प्रभु जोशी, उज्जैन में देवताले जी, देवास में नईम जी। कटनी में अनिल खंपरिया। जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, फ़ज़ल ताबिश और इन्द्रमणि उपाध्याय। दरअसल इन सभी के साथ एक काॅमन बात है कि ये अपनी वय, व्यक्तित्व, उपलब्धियों के दबाव को साथ में लेकर नहीं चलते। फाॅर्मल नहीं हैं। मेरे सुख से ज़्यादा दुखों में भागीदार रहे हैं।

ओम निश्चल: तनावों और दुखों के समय कौन दिलासा देता है?
लीलाधर मंडलोई: माँ, भाई, पत्नी व बच्चे। दोस्तों के नाम गिना ही चुका हूँ।

ओम निश्चल: यों ‘याद आए पिता’ एक बहुत अच्छी कविता है ‘काल बाँका तिरछा’ में। फिर भी पूछना चाहूँगा, किन मौकों पर पिता की याद आती है?
लीलाधर मंडलोई: मेरी एक ओर छोटी सी कविता हैµ‘हरेक प्रवेश करता है। पिता के चित्रा में। हरेक पिता होते हुए। डरता है।’ दरअसल पिता होने के बाद समझ आए पिता। पिता की भूमिका निभाने के वक़्त पिता बहुत याद आते हैं।

ओम निश्चल: किन दोस्तों पर भरोसा है आपको? ऐसा कोई दोस्त जिसके कंधे पर सिर टिका कर रो सकते हों। गोकि आप कहते हैं, रोना मेरे स्वभाव में नहीं?
लीलाधर मंडलोई: मेरे मँझले भाई दोस्त से अधिक हैं। उनके काँधे पर सिर रख कर रो सकता हूँ। किसी और से शेयर करने की कभी नहीं सोच पाता।

ओम निश्चल: सुख के एकान्त में कौन याद आता है?
लीलाधर मंडलोई: माँ, पत्नी, बेटी और बेटा।

ओम निश्चल: अपनी कविताओं का पहला ड्राफ्ट किसे सुनाना पसन्द करते हैं?
लीलाधर मंडलोई: अमूमन घर में पत्नी को। दिल्ली में विष्णु नागर को। भोपाल में हरि और प्रभुनाथ सिंह को।

ओम निश्चल: किसी बच्चे पर आपका गुण गया है?
लीलाधर मंडलोई: शिक्षा में बिटिया पर। सृजन में बेटे पर।

ओम निश्चल: कल से कहा जाए कि लीलाधर, तुम्हारी सजा यही होगी कि तुम कलम का गांडीव धर दो तो?
लीलाधर मंडलोई: भाई यह तो फाँसी की सजा हो गयी। मेरी पत्नी और बच्चे भी कई बार मेरे इस काम पर बेहद खीझते और गुस्साते हैं। लेकिन उन्होंने इतनी सख़्त सज़ा नहीं सुनाई। आप आलोचक होने का धर्म निभाएँ लेकिन सज़ा न सुनाएँ। यह अकेली ऐसी सज़ा होगी जिसमें सज़ा सुनाने वाले के खि़लाफ कुछ भी कर सकता हूँ हत्या तक।

ओम निश्चल: साहित्य के अलावा किन-किन क्षेत्रों में दिलचस्पियाँ हैं?
लीलाधर मंडलोई: खाना बनाने और खिलाने में मन रमता है। चिड़ियों को रोज़ दाना डालना अच्छा लगता है। संगीत और फ़िल्म में रूचि है। यात्रा और आवारगी में। उर्दू कविताएँ खूब मज़े से पढ़ता हूँ। पढ़ने का शौक़ इतना अधिक है कि सब कुछ भूल सकता हूँ। अकेला होता हूँ तो बुंदेली गीत गाना बहुत अच्छा लगता है।

ओम निश्चल: शेरो शायरी में दिलचस्पी कैसे जगी? किन शायरों में मन रमता है?
लीलाधर मंडलोई: हमारे कोयलांचल में क़व्वाली के बहुत प्रोग्राम होते थे। हज़ारों की भीड़ जुटती थी। याद करता हूँ ग़ालिब, मीर, वली दकनी, अमीर खुसरो, नज़ीर अकबराबादी, मोमिन, फ़ैज आदि को क़व्वाल बीच-बीच में रंग जमाने के लिए उठाते थे। सो मैं क़व्वाली में गायन के चमत्कार से छूटकर इन अजीम शायरों की गायी गयी दो पंक्तियों में उलझ जाता था। तीन ऐसे क़व्वालों की याद है शंकर-शंभू, अब्दुल रब चाउस और जानी बाबू।
    वैसे शेरो-शायरी की दुनिया में सौंदर्यबोध का यज्ञोपवीत भोपाल में फ़ज़ल ताबिश के सौजन्य से हुआ। उन्हीं की मार्फ़त मेरा परिचय ताज, शेअरी, कैफ, जानिसार अख़्तर, इजलाल मजीद जैसे बड़े शायरों से हुआ। मंजूर एहतेशाम ने भी इस आर्ट को समझने-सराहने का रास्ता दिया। शकेब जलाली की ग़ज़लों का लिप्यंतरण इन्हीं के साथ किया। इस काम में जो आनन्द मिला उसका बखान मुश्किल है।
    मेरा मन मीर, गालिब, फ़ैज, मज़ाज़, दाग़, शकेब जलाली और फ़ज़ल ताबिश में ज्यादा रमता है। हिन्दी में अनुवाद तो मैं किसी के नहीं छोड़ता। जहाँ जो काम लायक मिला, दर्ज कर लेता हूँ। जैसे ये शेर मैंने कोई 30 साल पहले नोट किए थे। शायद ताबा झांसवी और शब्बीर अहमद क़रार के थे।
        (1)
    किसी मुफ़लिस ने की है शम्मा रोशन
    फ़लक से रोशनी टकरा रही है
        (2)
    साये से अपने आप ही लगता है डर हमें
    ग़म दे गया है जबसे कोई मौतबर हमें
    औरों को क्या पड़ी थी कि पत्थर संभालते
    अपनों ने चीखकर कहा आशुफ़्तासर हमें।

ओम निश्चल: मुशायरों में कभी शिरकत की है क्या? नहीं तो सुनने तो जाते ही होंगे?
लीलाधर मंडलोई: पिछले साल मुंबई में हिन्द-पाक मुशायरे में शिरकत की। हिन्दी के कवि यहाँ से थे, शायर अधिकतर पाकिस्तान से आये थे। इसके अलावा फ़ज़ल साहब के साथ म.प्र. के कुछ मुशायरों में जाने का मौक़ा मिला है। मुझे आधुनिक शायरों के साथ पढ़ने में सुख ही मिलता है।
    सुनने जाता रहा हूँ। यह क्रम टूटा नहीं है। दिल्ली में कई बार गया हूँ। उम्दा रजतगा और आवारागर्दी हो जाती है। हूट भी पहले किया करता था। अब    बनता नहीं उस तरह।

ओम निश्चल: अब तक तो दिल्ली की सत्ता-संरचना के खेल में आप भी रम चुके होंगे?
लीलाधर मंडलोई: दिल्ली में तीन प्रमुख सत्ता केन्द्र हैµडाॅ. नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव। इन सभी के साथ सहज संबंध हैं। किन्तु इन शक्ति केन्द्रों का भीतरी सदस्य न मैंने बनना चाहा, न बन सका। हाँ, नामवर जी के सत्संग का लाभ उठाने में चूकता नहीं। कुछ और छोटे सत्ता केन्द्र है उनसे मेरी हलो-हाय की दोस्ती है। फ़जल ताबिश के इस शेर का मैं कायल हूँ और बहुत खुशµ
    सिवाय प्यार के कोई हुनर नहीं सीखा
    बहुत न सीखना हमको कमाल रास आया

ओम निश्चल: जीवन में कभी ऐसे क्षण आए कि झूठ बोलना पड़ा?
लीलाधर मंडलोई: मोबाइल पर तो रोज़ बोलता हूँ। नौकरी ऐसी कि बचने के गुर सीख लिये। हाँ! इधर आमने-सामने अपने दोस्तों-परिचितों से झूठ बोलने की जरूरत नहीं रही। नौकरी में ऐसे प्रसंग हैं कि किसी भलाई के लिए, बचाने के लिए ज़रूरत पड़ती है, बोलता हूँµऔर न शर्म आती है न दुख होता है।

ओम निश्चल: आपने बुरे दिन भी देखे हैं। ऐसे वक्त किन लोगों ने सहारा दिया?
लीलाधर मंडलोई: मँझले भाई, माँ, पत्नी, बच्चे, भतीजे-भाँजे, नाती, जीजी के अलावा आल्हाद पंडित, वीणा जीजी, हरि, प्रीति, बसंत मिश्रा, श्रीराम तिवारी, मंजूर एहतेशाम, आनंद सिन्हा, सुधीर सक्सेना, राजेन्द्र शर्मा, महेश कटारे, प्रभुनाथ सिंह आजमी, नीलेश रघुवंशी, हुस्ना, सुशील, ओम प्रकाश, विजय के अलावा दो प्रमुख व्यक्ति हैं दिनेश जुगरान और जे. पी. गुप्ता साहब।

ओम निश्चल: जब कभी देखा मेरे किरदार पे धब्बा कोई/देर तक बैठ के तनहाई में रोया कोईµऐसे हालात से कभी रू-ब-रू होना पड़ा है।
लीलाधर मंडलोई: मेरे मित्रा जो बहुत बड़े पुलिस अधिकारी बनकर सेवानिवृत हुए उन्होंने कहा थाµ‘अगर मेरे साथ ऐसा होता तो यकीकन आत्महत्या कर लेता।’ लेकिन मैंने अंत तक संघर्ष किया। जीता। और दाग़ को मिटाकर दम लिया। अगर रोता तो यह न कर पाता। मेरे साथ दाग़-धब्बे बनाने और लगाने वालों का एक कुशल समुदाय अपने काम में लगा रहता हैं। उन्होंने यह काम धार्मिक श्रद्धा के साथ किया। ईश्वर! उन्हें क्षमा करे। वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।

ओम निश्चल: घात-प्रतिघातों से रचनात्मकता को ताकत मिलती है। ऐसा कभी अहसास हुआ?
लीलाधर मंडलोई: मेरा सर्वश्रेष्ठ लेखन बुरे दौर का है। इसे आप ‘मगर एक आवाज़’ और ‘दाना पानी’ डायरी में देख सकते हैं। कुछ हिस्सा ‘काल बाँका तिरछा’ में भी है।

ओम निश्चल: दुख सबको माँजता है, अज्ञेय की तरह क्या आपको भी ऐसा लगता है?
लीलाधर मंडलोई: दुक्ख ने ही मुझे रचनात्मक रूप से यकीकन माँजा है। मैं दुखों का बहुत शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे चुना। हाँ! मेरे दुख महाप्राण निराला और मुक्तिबोध के सामने नगण्य हैं किन्तु जितने भी हैं, उनकी बड़ी भूमिका है, बरास्ते समाज रचना, में प्रवेश करने की वे जगह देते हैं।

ओम निश्चल: तस्मै श्री गुरुवे नमः। किन गुरुओं के प्रति माथा श्रद्धा से झुक जाता है?
लीलाधर मंडलोई: विभु कुमार जो अब इस दुनिया में नहीं। मेरे साहित्यिक संसार को सँवारने में उनका बड़ा योगदान है।

ओम निश्चल: किन लोगों के असमय चले जाने का दुख सालता है?
लीलाधर मंडलोई: पिता, छोटे भाई, विभु कुमार, इन्द्रमणि उपाध्याय, नवीन सागर, और सत्येन कुमार की मृत्यु ने गहरी पीड़ा से भरा। ये सभी मृत्यु के बाद गाहे-बगाहे सामने आ खड़े होते हैं।

ओम निश्चल: ‘दिल का किस्सा’ में नामवर जी, काशीनाथ सिंह, कुमार गंधर्व, ज्ञानरंजन तथा फ़ज़ल ताबिश व शकेब जलाली पर बड़े मार्मिक और छू लेने वाले लेख हैं। इतना मीठा कैसे लिख लेते हैं आप?
लीलाधर मंडलोई: दरअसल ये कमाल तो व्यक्तित्वों का है। मैंने तो बस अपना मन खोलकर रख दिया है। कविता में इसी तरह नवीन सागर, फ़ज़ल ताबिश और वेणुगोपाल पर लिखते हुए हुआ।

ओम निश्चल: यारों के यार: हरि भटनागर। इस दुष्ट पर कुछ कहना चाहेंगे?
लीलाधर मंडलोई: हरि दुष्ट है और भोपाल की भाषा में ‘हरामुद्दौला’। इस पर मैंने ‘वागर्थ’ में लिखा। हरि के भीतर बचपना है। बच्चे की तरह खुश और नाराज। हर किसी के खिलाफ बोल सकता है। ज़्यादातर लोगों से कम से कम भोपाल में इसकी नहीं पटती। भोपाल के बाहर साला लगभग राज करता है। युवाओं के बीच ख़ासा पापुलर है। ससुरा आकर मेरे घर रुकता है दिल्ली में और पहले दिन से ही दिल्ली के युवा लेखक अपहरण कर लेते हैं। अमूमन उसके साथ बैठक नहीं होती। बस सामान उठाने आता है। एक वही है जो कमजोरियों में रास आता है। उसकी बड़ी फिक्र रहती है। महाराज कृष्ण संतोषी की पंक्तियाँ हरि के संदर्भ में एक झटके में याद आती हैंµ‘कील पर टँगी/कमीज/स्वप्न देखती है/अभी-अभी कोई आदमी/उसे पहन कर/दुश्मनों के शिविर में गया है।’
हम उससे बच के चलते हैं जो रास्ता आम हो जाए

ओम निश्चल: मंडलोई जी, आपकी कविता पर कुछ बातें हो जाएँ। मुझे आपकी कविता अभावों के अर्थशास्त्रा की कविता लगती है। उसमें वायवीयता नहीं, ठोस वस्तुनिष्ठता है। आपकी कविता में बहुतेरे किरदार आते हैं, जिनके अभावों की पोटली आप खोलते हैं पर ध्यान भी रखते हैं कि इस प्रक्रिया में इन किरदारों के स्वाभिमान की पूँजी ओझल न होने पाए। इसके पीछे क्या कोई तयशुदा पोयटिक स्ट्रेटेजी होती है?
लीलाधर मंडलोई: ओम भाई! मेरी कविता के बारे में कुछ अधिक ही स्नेहपूर्वक आपने बोल दिया। आपकी कविता की समझ का आदर करता हूँ। लेकिन अतिशय प्रेम से घबराता हूँ। इस प्रश्न का जवाब मेरे लिए मुश्किल है। मैं अपनी कविता के बारे में अधिकारिक रूप से कहने में हिचकता रहा हूँ। मेरी कविताओं में ही आपके प्रश्न का उत्तर है। कुछ छोटी कविताएँµ
    (1)
मेरे लिखे में
अगर दुक्ख है
और सबका नहीं

मेरे लिखे को आग लगे
    (2)
अगर कविता में
न आये मेरी मातृभूमि

मैं कवि नहीं

    (3)
जैसे संदूक में
रखती है माँ
अपनी प्यारी चीजें
कविता में इतना ही तो करता हूँ मैं

    (4)
यह कविता है
तो इसमें
मेरी आत्मा होनी चाहिए

    (5)
बार-बार गाता हूँ
तुलसी बाबा का दोहा
वह सुन्दर हो उठता है
बार-बार लिखता हूँ वही पंक्तियाँ
एक दिन वह कविता हो जाती है

    (6)
अच्छी कविता का महत्व सिर्फ अच्छी कविता में है
उस पर हुई अच्छी बातों में नहीं

ओम निश्चल: यह जो आपका कविता का चरित्रा सबाल्टर्न किस्म का है, उसे दिल्ली तक पहुँच कर भी वैसे का वैसा कैसे महफूज रख सके। क्योंकि दिल्ली तो आदमी को पहले की तरह नहीं रहने देती?
लीलाधर मंडलोई: कविता का सबाल्र्टन चरित्रा आदिवासी और कोयला खानों में रहने-जीने की वजह से है। मैं आधुनिक सम्वेदना का कवि होने के बावजूद नगरीय संसार को समझने की दृष्टि उसी लोक से पाता हूँ जिसमें जंगल, नदी, पहाड़ और समुद्र का साहचर्य है। मेरी एक पंक्ति हैµ‘सतपुड़ा के कंधे हैं मेरे पास।’ बस यह चरित्रा यहीं से बनना शुरू हुआ तो अनेक जगहों, यात्राओं, जिन्दगियों के साथ हो लिया।

ओम निश्चल: किसी और कवि को आप अपने इतना करीब पाते हैं?
लीलाधर मंडलोई: बुंदेली में माधव शुक्ल मनोज, हिन्दी में सुदीप बनर्जी और इधर कुछ हद तक मोहन कुमार डेहरिया। हाँ निर्मला पुतुल की कविताओं में भी वह चरित्रा है जो मेरी कविता के मूल रंग के अनकरीब है।

ओम निश्चल: आपकी कविता पूरे तौर पर संकीर्णता के विरोध में खड़ी नज़र आती है। परदुखकातरता आपकी कविता का ही स्वभाव है या आपका भी?
लीलाधर मंडलोई: भई ऐसा है कि मैं बचपन से ही संकीर्णता के विरुद्ध रहा हूँ दरअसल ऐसे संस्कार बचपन से विरासत में मिले। ये संस्कार कविता का स्वभाव बन गये। ये सच है कि लोग दो चेहरे, दो तरह के स्वभाव और दो तरह का जीवन जीते हैं। यह मुझसे संभव न हो सका। मैंने समाज में सफल होने के लिए, इस तरह की जो चालाकियाँ जरूरी होती हैं नहीं सीखी और घाटे में भी रहा। लेकिन यकीन मानिए मुझे अपनी असफलताओं से भी प्यार है। उनकी उपस्थिति मुझे सुख ही देती है।
ओम निश्चल: अपना दुख तो  सच ही, बहुत कम आप खोलते हैं। मजूर, किसान, स्त्राी, दलित, पशु-पक्षी और वनस्पतियों की पीड़ा आपको घेरे रहती है। ‘उसका होना न होना’ में वनस्पतियों की चिलक, सूखती कराहती नदी और अंतिम झरनों का सिसकता शोकगीत केवल पारिस्थितिकी के उजड़ने का ही संकेत नहीं देते बल्कि कवि के भीतर जड़ जमाती शिकस्त की आवाज भी बुलंद करते हैं। क्या ऐसा मानते हैं आप?
लीलाधर मंडलोई: मै कविता में सृष्टि को लिखता हूँ। मेरी कूव्वत भर जितनी आ सके। कितना कम जानता हूँ मैं। जानने की प्रक्रिया में आपका सृष्टि में होना भी है। आपकी जिज्ञासा ही आपको चीज़ों तक ले जाती हैं। आप उसके साथ रहते हुए जान पाते हैं कि वह सजीव कविता है। मैंने अपनी तरफ़ से कुछ खास किया हो ऐसा नहीं। ये तो सृष्टि है जिसमें विषयों, किरदारों, प्रसंगों, संदर्भों तक आने और पाने की छूट थी।
    मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे कविता के लिए जीवन से इतना समय मिला कि मैं कोयले खान की काली अँधेरी रातों से लेकर सतपुड़ा के सघन वन, गोंडवाना के आदिवासी अंचल से लेकर अंदमान निकोबार की दुर्लभतम जनजातियों के बीच, मालवा, बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़, भोपाल, दिल्ली से लेकर कई देशों के जीवन-समाज को कविता में ला सका। पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, विरल किरदार और प्रसंगों ने मेरे काव्य जीवन को समृद्ध किया। एक कवि के रूप में, मेरे जीवन में जो आया मैंने समस्त इंद्रियों के साथ आत्मसात किया। अब जो कुछ अच्छा बुरा लिखा पाठकों की दुनिया में है। मैंने जिस तरह इस सृष्टि को पकड़ने की कोशिश की, उसकी रचना प्रक्रिया कुछ ऐसी रहीµ‘बचपन में जैसा करता था। उचका हुआ हूँ अभी तक। पंजों पर। मैंने संसार नहीं देखा।’

ओम निश्चल: छिंदवाड़ा से आपका और विष्णु खरे दोनों का रिश्ता है, पर दोनों की कविता में भारी अंतर हैं। उनकी कविता में एक तो उस लोकेल  की मौजूदगी कम है, दूसरे वह जिरह की तार्किकता से भरी तथा पौरुषपूर्ण गद्य से लैस दिखती है। इसके उलट आपकी कविता न नर्मदा को भूलती है न कस्तूरी, अमर कोली और तोड़ल को न आदिवासी इलाकों में पैर पसारते भूमंडलीकरण के प्रभुत्व को, न न्याय की तुला पर तुलते अन्याय को और उसमें एक धीमी गति से बजते संगीत और नज्म-की-सी वर्तुल रवानगी नजर आती हैं। वह पराजयों के बीच देख जा रहे प्रतिरोध का स्वप्न लगती है। एक ही अंचल के दो कवियों के बीच की कविता के स्वभावगत अंतर को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
लीलाधर मंडलोई: विष्णु खरे मेरे वरिष्ठ कवि है। उनकी कविता में छिंदवाड़ा जिले की अनेक शक्तिशाली और मार्मिक छवियाँ है। छिंदवाड़ा छोड़ने के बावजूद उनकी कविता में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सदैव उपस्थित रहता है ठीक वैसे जैसे ‘शंख में समुद्र प्रतिध्वनित होता है।’ हम दोनों की कविता का लोकेल छिंदवाड़ा का होते हुए भी भिन्न जीवन-समाज का है। वे अरबन कवि उस अर्थ में नहीं है। मुझे लगता है कि इस तरह का स्वभावगत अंतर सहज है। उनके देखने और मेरे देखने में यह फर्क स्वाभाविक है। इस फर्क की वजह से ही, हम एक ही जगह के होकर भी कविता में भिन्न हैं। कला की दुनिया में ही ऐसा संभव है।

ओम निश्चल: कविता में सौंदर्यबोध को यदि रुपायित करना हो तो मुझे आपकी कुबड़ा यथार्थ कविता याद आती है, जिनमें आप कोयला ढोते झुक गयी कमर और मरने पर मुश्किल से सीधे बाँध पाने वाले भद्दू के हवाले से आप कहते हैं, मैंने एक कुबड़े यथार्थ को दिया कंधा इस देश में। ‘अमर कोली’, ‘कस्तूरी’, ‘अनुनय विनय के शिल्प से बाहर’ और ‘आपको क्यूँ नहीं दीखता’ केवल कविताएँ नहीं बल्कि हमारे कुबड़े यथार्थ की शोकांतिकाएँ हैं और तिस पर उन पर न कोई कैमरा का अफसोस। गलत तो नहीं कह रहा?
लीलाधर मंडलोई: हाँ! मेरी अधिकांश कविताएँ जो कोयलांचल की हैं अथवा ऐसे लोकेल की जिनमें मनुष्य के खिलाफ सत्ता सक्रिय है, ‘कुबड़े यथार्थ’ को ही प्रकाशित करती हैं। चूँकि मनुष्य के अधिकारों की अवमानना मैंने बचपन से देखी है अतः ऐसा किसी के साथ भी होता है, मेरी कविता अपनी तरह से उठ खड़ी होती है। और इस संदर्भ में युवतुशेन्को की बात याद आती हैµ‘कविता तभी तक जीवित रहती है जब तक वह कवि के भीतर अँधेरों में धड़कती है, उसके भीतर घात-प्रतिघात करती है।’

ओम निश्चल: कविता में आपने प्रयोग भी किए हैं। कथा शैली में आपकी गद्य कविताएँ जो काल बाॅका तिरछा में हैं, मार्मिक और चित्तग्राही हैं। उनमें केवल गद्य का वितान नहीं है, आख्यान की सरसता और चिंतन की सादगी है। ऐसे प्रयोग मंगलेश ने, अशोक वाजपेयी ने, विष्णु खरे ने, उदयन ने, और भी कइयों ने किए हैं। बल्कि हाल में आई आपकी डायरी भी लगभग इसी काव्यात्मक शैली में लिखी गयी हैं । इस शिल्प में आपको कविता की क्या संभावनाएँ नज़र आती हैं?
लीलाधर मंडलोई: काव्यात्मक शिल्प कदाचित मेरे लेखकीय मिजाज के अधिक अनुकूल है। डायरी में भी इस स्वभाव में कह पाना अधिक सुकून और सुविधा देता है। कठिन से कठिन बात अपने तरीके़ से कहा पाता हूँ। व्यवस्था के अनेक कुत्सित रंग इसमें अभिव्यक्ति पा लेते हैं। बहुत से दोस्त और पाठक तो मेरे गद्य के इसी मिजाज़ की पुष्टि करते हैं। प्रयोग करने का अर्थ है अपनी एक तरह की कंडीशनिंग से मुक्त होना। इधर मैंने एकदम छोटी कविताएँ लिखी हैं। मैं अपने को लगातार तोड़ता रहा हूँ। उसमें अपनी संभावित असफलता से मैं कभी भयभीत नहीं होता।
ओम निश्चल: ‘कवि ने कहा कि भूमिका में आपने कविता के लिए सूक्ष्मश्रवा होने की जो जरूरत जाहिर की है, वह वास्तव में एक नई बात है। कविता की यह विशेषता कुछ अलग सी लगती है। यह प्रतीति भी, लगता है, समुद्री सोहबत की देन है?’
लीलाधर मंडलोई: ‘सूक्ष्मश्रवा’ जैसा शब्द मुझे प्राप्त हुआ उसके दो स्तर है। एक तो अंदमान-निकोबार द्वीप समूह में समुद्र की संगत जो चेतना पर छायी रहती है। मैंने अंडरवाटर ड्राइविंग भी की और समुद्र के शांत चित्त और हलातोल दोनों के भीतरी सतहों में अनुभव किया। तो एक चेतना का स्तर है। रही शब्द की प्राप्ति तो यह प्रभु जोशी की संगत से मेरे पास चला आया या कहें ढिठाई के साथ मैंने चुरा लिया।

ओम निश्चल: मीडिया में रहते हुए आपने मुक्तिबोध की डायरी, परसाई के निबंधों, जेल के कैदियों, जे स्वामीनाथन, कुमार गंधर्व, शमशेर, अमीर खाँ व श्रीकान्त वर्मा, चेखव व ज्ञानरंजन पर केन्द्रित फिल्में बनायी हैं। कविताई का कोई लाभ आपकी फिल्म कला को मिला है क्या?
लीलाधर मंडलोई: कविता में जो बिंब कवि देखता है फिल्म में उसे निर्देशक या सिनेमेटोग्राफर रचता है। कविता फिल्म के बेहद नजदीक विधा है। कविता में संगीत, कथा और डाक्यूमेंटन होता है। फिल्म में कविता के कई तत्व शिरकत करते हैं। मैंने थियेटर और कविता की जुगलबंदी में मुक्तिबोध की डायरी का फिल्मांकन किया था। यह कठिन था बहुत। लेकिन कल्पना ने इस निर्माण को संभव कर दिखाया। थियेटर की भाषा में इसे अरुण पांडेय ने संभव किया। फिल्म की भाषा में हमने प्रोडक्शन-पोस्ट प्रोडक्शन में सम्भव किया। कवि ने हर रूप में फिल्म से जुड़ने को आसान बनाया।

ओम निश्चल: आदिवासी जन-जीवन के अनुभवों से आप काफी मालामाल हैं। इन अनुभवों ने आपको क्या दिया?
लीलाधर मंडलोई: सृष्टि के आदिम जीवन के अनुभवों से जोड़ा। खासकर अंदमान-निकोबार और पातालकोट की जनजातियों की लोक कथाओं के संचय और चयन प्रस्तुति के दौरान मैंने आदिम जीवन की स्थिति-परिस्थिति के इतिहास में यात्रा की और पुरखों के अवदान को जाना। उनके संघर्ष को समझा और इस परिणाम पर पहुँचा कि उनका जीवन जितना कठिन था उसके सच को जान लेने के बाद कृतज्ञता से आपका सिर झुक जाता है।

ओम निश्चल: लेखन के लिए आपको कई सम्मान मिले। पर किस सम्मान से वाकई आपको सुख मिला। पुरस्कार के मौजूदा तंत्रा के बारे में, जिसमें एकाधिक में आप भी शरीक रहे हैं, आपका क्या विचार है?
लीलाधर मंडलोई: ‘वागीश्वरी सम्मान’µयह जीवन के सर्वाधिक कठिन समय में मिला। मैं हिन्दी साहित्य सम्मेलन के उस निर्णय के लिए सदैव आभारी रहूँगा। वह निर्णय बड़ा कठिन था। बड़ी हिम्मत की दरकार थी।

ओम निश्चल: पुरस्कारों से लेखक की हैसियत सँवरती है, क्या आप ऐसा मानते हैं।
लीलाधर मंडलोई: हैसियत नहीं विश्वास सँवरता है।

ओम निश्चल: बोली-बानी में बुंदेली की धमक, बर्रूकाट भोपालियों के शहर के बाशिंदा, चित्त में मालवी रंगत और आपके ही बहुधा उद्धृत पद को उधार लेकर कहें तो कविता में भी कुछ अलग-सी ही बनक, और अब दिल्ली में भी अपने मित्रा मंडल का लगातार विस्तार और चाहने वालों से बेपनाह मुहब्बतµभीड़ में अलग-से दिखने के लिए क्या योग-क्षेम करते हैं?
लीलाधर मंडलोई: अलग दिखना कविता और जीवन में बहुत मुश्किल है। मित्रों को अर्जित करना आसान काम नहीं। बड़े धैर्य और समझदारी की ज़रूरत होती है। प्यार करने के लिए प्रतिकूल स्थितियों में भी बड़ा दिल चाहिए। इसके लिए आप आम आदमी-सा व्यवहार नहीं कर सकते। बने बनाये रास्ते से अलग जोखिम के साथ चलना पड़ता है। शकेब जलाली की पंक्तियाँ इस संदर्भ में याद आती हैंµ
    शकेब अपने तआरुफ़ के लिए यह बात काफी है
    हम उससे बचकर चलते हैं जो रास्ता आम हो जाए।

ओम निश्चल: इधर ज्ञानरंजन जी, उधर नामवर जी और कमला प्रसाद जीµदो विरुद्धों के मध्य सामंजस्य बना लेने में कुशल, दिल्ली में अशोक वाजपेयी से भी बाअदब मधुर रिश्ते, राजेन्द्र यादव को वक्रगति को भी साध कर रखना, प्रभाकर श्रोत्रिय की पवित्रा पंगत में भी शरीक और विष्णु नागर व आलोक मेहता की साधु संगत का तो कहना ही क्या!µजहाँ भी रहते हैं, मैत्राी की समशीतोष्ण जलवायु में रहते हैं। जहाँ साहित्यकारों के विराट अंतःकरण को छोटी से छोटी ठेस भी बर्दाश्त न होती हो, साहित्य की दुरभिसंधियों में पले-बढ़े दुर्वासाओं के कोपभाजन बन जाने के खतरे हों, ऐसे में सबके लाड़ले बन जाने की सिफत कैसे हासिल की।
लीलाधर मंडलोई: आपके इस दिलचस्प और फोकस्ड सवाल पर जिसमें एक इशारा है, मैं कबीर की एक पंक्ति सामने रखना चाहता हूँµ‘हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या।’ हालांकि इसकी दूसरी पंक्ति सीधे दर्शन में ले जाती है और वहाँ जाने में हम सभी को वक्त लगेगा। तो इस पंक्ति के मर्म में प्रेम ही प्रेम है। कोई हुशियारी नहीं। गर संबंधों में प्रेम और आदरभाव हो और आप स्वार्थों से उ$पर रहें तो कोई खतरा नहीं। हाँ! एक बात मुझे सबका स्नेह मिला और चाहूँगा आपके प्रश्न से किसी की बुरी नज़र न लगे। मियाँ! दिठौना लगवाने का इंतजाम करो।

ओम निश्चल:  समाज बदला है। लोगों के खयालात बदले हैं। पर यह बदलने की कार्रवाई बडे़ सूक्ष्म स्तर पर चलती है। इस परिवर्तन की कोई उमड़-घुमड़ आपके भीतर भी महसूस होती है?
लीलाधर मंडलोई: समाज का बदलाव तो फिर भी निगाह में आ जाता है। किन्तु सालों-साल बदलाव के लिए जो गुप्त सूक्ष्म कार्रवाई चलती हैं। उसे पकड़ना बड़ा कठिन है। यह समाज नैसर्गिकता में बदल रहा हो, ऐसा नहीं है। किसी सुपरकम्प्यूटर के स्क्रीन पर न कहो कई दशक पूर्व इस तरह के समाज का कच्चा प्रारूप बनाकर कार्रवाई को अंजाम दिया गया हो। मुझे पर्यावरण के सारे ख़तरों, बाज़ार के कदमों की पूर्व ध्वनियों और पंूजी के नाटकीय फैलाव में घुसने पर लगता है कि आप किसी भयावह अँधेरे की सिम्त बढ़ रहे हैं।
ओम निश्चल: तकनीक ने मनुष्य की चेतना पर आसन जमा लिया है। सारी चीजें तकनीक शासित होती जा रही हैंµहमारी संवेदना, हमारे इमोशन्स, प्रदर्शनकारी कलाओं तक में तकनीक का बोलबाला है। तकनीक और मानव सभ्यता के आपसी रिश्तों पर क्या कहेंगे?
लीलाधर मंडलोई: तकनीक के जादू ने ख़बर को सूचना में रिड्यूस कर दिया है। यह विकास का वाहन है। आधुनिक दुनिया में प्रवेश का रास्ता भी किन्तु इस आधुनिक और उत्तर आधुनिक रास्तों पर मनुष्यता को बचाए रखने के संकट गहरा रहे हैं। नागरिक दायित्व और आपसी भाईचारे और प्रेम में एक घुन लग रहा है तकनीक का और यह ऐसी बारीक प्रक्रिया में हो रहा है कि हम उसके मानव सभ्यता विरोधी रूपों को भी सहज स्वीकार करते जा रहे हैं। अमरीका के 75 प्रतिशत बच्चे सेक्स एडिक्ट हैं। बच्चों के खेलने-कूदने, मौज-मस्ती और जीवन को समझने के दिनों में वे स्क्रीन को सब कुछ मान बैठे हैं। यही कथा स्त्रिायों की है। बहुत हद तक पुरुषों की। दरअसल हम सब ‘सेटेलाइट प्राणी’ हैं जिसका रिमोट कंट्रोल भयावह राक्षस के हाथ में है। इस खतरे को लेकर मेरी मीडिया की किताबµ‘इनसाइड लाइव’ में अनेक प्रश्न उठाये गये हैं। कई बातें सामने रखी गई हैं। तकनीक पर मुग्ध और उस पर पूरी तरह निछावर होने वालों के हित में, एक समानांतर चिंतन-मंथन की दरकार को, मैं महसूस करता हूँ।

ओम निश्चल: मुद्रा स्फीति, विकास दर, शेयर सूचकांकµअर्थशास्त्रा की इन पदावलियों से कितना वास्ता रखते हैं आप?
लीलाधर मंडलोई:  इसके लिए आपको ‘मगर एक आवाज़’, ‘काल बाँका तिरछा’ और इधर प्रकाशित हो रही छोटी कविताओं से एक बार गुजरना होगा। एक छोटा सा इधर का नमूनाµ‘शेयर बाजार/मधुमक्खी का छत्ता है/ जिसे छेड़ता है कोई अरबपति/और भगदड़ मच जाती है।’ बाजार की ठेठ भाषा आपको संकेतिक संग्रहों में मिलेगी। इस दिशा में ओम भारती का काम बहुत महत्वपूर्ण है।

ओम निश्चल: एक तरफ अरबपतियों के आशियाने हैं, दूससरी तरफ बेघर जनता। जिस समाजवाद के धीरे-धीरे आने की उम्मीदें गोरखपांडे ने अपने एक गीत में संजोई थी (समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई) वह तो धीरे-धीरे ओझल हो रहा है। यह समाज में कैसी लेवलप्लेइंग हैµइस बारे में आपका चिंतन, आपकी आशंकाएँ, आपके सरोकार?
लीलाधर मंडलोई: पिछले 10 सालों में भारत के अरबपतियों की संख्या दस गुना बढ़ गई है। गरीबों के साथ जो हो रहा है किसी से छिपा नहीं। बढ़ती हुई बेरोजगारी किसानों की आत्महत्याएँ, दलितों की हत्याएँ, जमीनों से बेदखली, कार्पोरेट संसार के क़ब्जों में असामान्य तेज़ीµये सब पूँजी के नये साम्राज्यवाद के उदाहरण हैं। इसमें दम तोड़ते समाजवाद को हम दम साधे देख रहे हैं। कोई फौरी इलाज न तो है, न उससे कुछ होगा। मैं इस बदलते समाज के पाश्र्व में खूंखार हँसी सुन रहा हूँ, मैं अपने सरोकारों को कविता में दर्ज कर रहा हूँ, गद्य में एक नई ताकत भरने की चेष्टा कर रहा हूँ। उम्मीद के हाथ थामे खड़ा हूँ और महाप्राण निराला को याद करता हूँ इस संघर्ष के बीच और लगता है जैसे साम्यवादी प्रशासनिक पराभव की चर्चा के अन्तिम दौर में जैसेµ‘रह गया राम-रावण का अपराजेय समर।’

ओम निश्चल: इनसाइड लाइवµआपकी किताब हैµमीडिया पर आपकी ही भाषा में कहें तो मीडिया के अंतःपुर के रहवासी हैं आप। मीडिया की संवेदनहीनता को रोना हम बहुत रोते हैं, मीडिया के गुणसूत्रों पर आप क्या कहेंगे?
लीलाधर मंडलोई: मैं विज्ञान या टेक्नाॅलाजी का विरोधी नहीं हूँ। बगैर इनसे अपने को जोड़े विकास सम्भव नहीं। न हम आधुनिक हो सकते हैं। मेरा रोना इसके दुरुपयोग को लेकर है। इसमें से निकलते खतरनाक रास्तों के विरोध में लुकाठी लेके खड़े होने के काम में अपने को साथियों के साथ तैयार कर रहा हूँ। इसका इशारा ‘इन साइड लाइव’ में है।

ओम निश्चल: एक कवि के रूप में आप किन बातों से परेशान हो उठते हैं?
लीलाधर मंडलोई: साहित्य की धड़ेबाजी, संवादहीनता, कीचड़ उछालने की कार्रवाइयों और साहित्य परिवार के बिखरने से। एक कवि को इन बातों पर सिर्फ शोक मनाने के अलावा भी कुछ करना चाहिए। मैं ऐसी छोटी-मोटी कोशिश में बना रहता हूँ। सबको आगे आना चाहिए वरना मुक्तिबोध का बेहतर दुनिया का स्वप्न बिखर जाएगा। साहित्य में घर कर रही इस टूटन से भी इमारत धसक सकती है।

ओम निश्चल: एक नागरिक के रूप में व्यवस्था पर कब गुस्सा आता है?
लीलाधर मंडलोई: व्यवस्था का स्थायी रंग स्याह है। वहाँ किसी के लिए सकारात्मक निर्णयों की स्पेस बनिस्बत कम है। पहुँच और अनुनय-विनय के शिल्प का ओहदा नियम-कानून से बड़ा है। आम-आदमी के पक्ष में संघर्ष के बावजूद न्याय का प्रतिशत कम हैं। मैंने खुद कइयों के पक्ष में लड़ाई की। सफलता कम मिली। सफलता के द्वार बन्द होने में वक्त नहीं लगता। यहाँ लोग अँधेरों के साथ किसी अवसाद में रोमांस अधिक करते हैं।
    जब इस व्यवस्था में परिवर्तन की नागरिक कोशिशें हारने लगती हैं। मैं गुस्से से अधिक अपनी असहायता पर शर्मिंदा होता हूँ। महात्मा गांधी का कथन हैµ”क्रोध के शमन के बाद, आप जो कार्य करते हैं, उसी में फल मिलता है।“ तो मैं हारने के बावजूद जुटा रहता हूँ।

ओम निश्चल: आपके नियमित पठन-पाठन में क्या कुछ होता है?
लीलाधर मंडलोई: समय का टोटा है पठन-पाठन के लिए किन्तु मैं अव्यवस्थाओं में भी एक व्यवस्थित समय निकाल लेता हूँ। मसलन रात नौ बजे घर लौटने के बाद 10 से 12 बजे के बीच पढ़ता हूँ। सुबह एक-दो घंटे के लिए पुनः लिखता हूँ या मन न हो तो पढ़ता हूँ। शनिवार-रविवार को कम से कम चार-पाँच घंटे पढ़ने-लिखने के होते हैं। मन उ$बता है तो संगीत सुनता हूँ ‘रिचार्जिंग’ के लिए या परिवार के साथ गप्प मारता हूँ। कभी ब्रेक में सब्जी बनाता हूँ।
    मैं पठन-पाठन में सभी विषय शामिल करता हूँ। कविता, कहानी, उपन्यास के अलावा मेरा बल लोक-आदिवासी साहित्य, इतिहास, समाज शास्त्रा और देश-विदेश के प्रकृति विषयक साहित्य में रुचि रहती है। विश्व का कालजयी साहित्य तो पढ़ता ही हूँ। मुझे आत्मकथाएँ और जीवनियाँ पढ़ता बहुत भाता है। साथ ही मीडिया और फिल्म विषयक शोध साहित्य भी चाव से पढ़ता हूँ। भारतीय भाषाओं के अनुवादों को अनिवार्य रूप से पाठ में शामिल करता हूँ। तो इतना कुछ ही किस्त-किस्त जिंदगी है पठन-पाठन की। हादी आज़मी ने हम जैसे साहित्य रोगियों के लिए कहा हैµ
    ”लगाकर शम्मा से लौ खाक कितने हो चुके लेकिन
    ये परवाने अभी तक रोशनी की बात करते हैं।“

ओम निश्चल: कभी मन हुआ कि कविता तो बहुत कर ली, अब कहानी की ओर लौटे या कोई उपन्यास लिखें। क्योंकि कहानी की भाषा तो बखूबी आपके पास है?
लीलाधर मंडलोई: मेरे कई मित्रा अक्सर कहते हैं कि तुम्हारे भीतर कथा व उपन्यास लिखने की सारी सामग्री है। भाषा से जैसे उन्हें बड़ी उम्मीद है। शायद जो गद्य लिखा उसमें कुछ कण उन्हें दीखते हों। मैंने तीन साल-पहले कुछ कोशिश भी की। लेकिन संतोष नहीं हुआ। अरुण प्रकाश जी ने ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में एक कहानी छापी भी। प्रतिक्रियाएँ भी ठीक-ठाक थी। लेकिन लगता है मुझे व्याकरण और शिल्प ठीक-ठाक पकड़ में नहीं आ रहा। मुझे एक ‘टेक आॅफ प्वाइंट’ जैसा चाहता हूँ मिल नहीं पा रहा।
    गद्य में डायरी, संस्मरण और निबंध मेरी प्रकृति के अधिक करीब लगते हैं इनमें मन रमता है। इंद्रियाँ जागती है। मेरी कहीं कै़द स्मृतियाँ-अनुभव एकाएक मेज पर आ विराजती है। फिलहाल जिंदगी का तमाशा जिन विधाओं में आ रहा है, उतने से ही गुजारा चला रहा हूँ। मानस रंजन महापात्रा, उड़िया कवि उपन्यासकार की एक कविता ‘हे सड़क’। उसमें वे कहते हैंµसड़क के इस पार से। जाना होगा मुझे उस पार। तुम मेरे साथ रहो। तो इन विधाओं के साथ उस पर जाउ$ँगा तो शायद जो अब तक टुकड़ों-टुकड़ों में जो लिखा है उसमें से शायद कोई राह निकले।
ओम निश्चल: इधर कहानी में क्या कुछ पढ़ा जो स्मृति में धारण करने योग्य हो?
लीलाधर मंडलोई: अरविन्द कुमार सिंह की ‘बलि’, हरि भटनागर की ‘माई’, अजित हर्षे की ‘प्रेम सपना और मृत्यु’, उदय प्रकाश की ‘मोहन दास’, पंखुरी सिन्हा की ‘कोई भी दिन’, राजेन्द्र दानी की ‘महानगर’µये कहानियाँ मैंने पढ़ी है।

ओम निश्चल: और उपन्यासों में µपिछले एक-दो साल के भीतर?
लीलाधर मंडलोई: नासिरा शर्मा का ‘कुईंया जान’, असगर वजाहत का ‘कैसी आगि लगाई’, विष्णु नागर का ‘दिन रात’, भगवान दास मोरवाल का ‘.............’ और अजय नावरिया का ‘..............’

ओम निश्चल: जहाँ आप हैं, वहाँ से कभी पीछे मुड़ कर देखते हैं?
लीलाधर मंडलोई: अनीता वर्मा मेरे प्रिय कवियों की फेहरिस्त में हैं। उन्होंने अपने गिरते स्वास्थ्य के बावजूद अतीत की स्मृतियों को बहुत सटीक ढंग से कविता में व्याख्यायित किया है। पंक्तियाँ मुझे प्रिय इसलिए भी हैं कि स्मृतियों को लेकर मेरे भी मन कुछ ऐसा ही हैµकुछ पंक्तियाँµ

    हर समय वही उपस्थित जो दिखाई नहीं देता
    अदृश्य सबसे अधिक है
    धुँधला ही सबसे ज्यादा साफ
    उसी में बची है देखने की सबसे ज्यादा कोशिश

    दूर की चीजें बहुत पास हैं
    जैसे तारे जिनकी रोशनी में चमकती यह खिड़की
    दूरी एक महीन डोर है
    जिसे मैं थामे रहती हूँ
    खिंचती हुई चली आती हूँ तारों तक

    µतो मैं पीछे देखता हूँ। कुछ सामान झोली में भर लेता हूँ और आगे की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ


डाॅ. ओम निश्चल