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Monday, February 7, 2011

आत्मा पर इस बोझ को लिए मैं

आत्मा पर इस बोझ को लिए मैं
लीलाधर मंडलोई
   
वह हम सबसे अधिक सुन्दर था और मासूम गेहुँआ रंग। लंबोत्तरा। बड़ी-बड़ी आँखें। उसकी मुस्कान को देखते हुए कृष्ण याद आते। उसे घर का हर सदस्य अपनी गोद में रखना चाहता। एक झोपड़ी में उसका जन्म, एक आश्चर्य मिश्रित आनंद था। इतने सुन्दर-सलोने बच्चे बड़े घरों में पैदा होते हैं, ऐसा तब हम सोचा करते थे। हमारे इलाके में गुजराती बाबुओं की एक काॅलोनी थी पक्के मकानों वाली। इस कालोनी में जहां एक तरफ बड़े बाबू और अफसर रहते थे तो दूसरी तरफ बंगलों की कतार थी जिसमें खदान के मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर आदि रहते थे। उन बंगलों में हमने गोरी स्त्रिायों और सुंदर बच्चों को टहलते हुए देखा। यदि हमारे इस भाई को उन बंगलों के लाॅन में छोड़ दिया जाता तो वह उन सबसे अधिक सुंदर व आकर्षक लगता।
हमारे इस भाई को हम घर में मुन्ना पुकारते। राशि का नाम हुआ ओम प्रकाश। वह बहुत कम रोता। लेकिन हँसने-मुस्कुराने की कोई सीमा न थी। माँ उसके आने से बहुत खुश थी। पिता की मूँछें कुछ और उ$ँची हो गयी थीं। जीजी के लिए मानो वह खेल का सामान था। वह घर में जब होती तो उसकी होकर रह जाती। स्कूल के बाद हमारे समय को भी उसने काफी हद तक चुरा लिया था। हमारे दोस्त भी उससे मिलने आ आते। देखा जाए तो झोपड़ी में पैदा होने के बाद भी वह राजदुलारा था।
समय को उन दिनों पँख लगे थे। देखते-देखते वह तीन साल का हो गया। दीखने में और अधिक आकर्षक। आँखों का आकार कुछ और बड़ा हो गया था। होंठ अब अधिक उभर आए थे। उनका रंग सुर्ख था। वह घुटने के बल दौड़ने लगा था। उसकी चपलता देखते बनती। वह सबके पीछे घुटनों पर भागता रहता। उसकी हँसी में पूरा माहौल डूबा रहता। हम चाहते कि उसमें बाकी नैसर्गिक सौंदर्य भी खिल उठे। जैसे उसका बोलना। लोग कहते उसकी बक (वाणी) अभी नहीं फूटी। वह सिर्फ एक शब्द बोल पाताµमाँ।
वह चार के बाद पाँच साल का हो गया। लेकिन बोलना शुरू नहीं हुआ। सभी परेशान। जामई तहसील में एक डाॅक्टर था। सरनेम शायद भट्टाचार्य। वहाँ उसे ले गये। उसने दवाइयाँ दी। फीस वसूल की कई बार। कोई फायदा नहीं। माँ ने अब चुपके-चुपके रोना शुरू कर दिया। बस्ती के लोग उसे बौरा (गूँगा) पुकारने लगे। इसी तरह एक साल तरह-तरह के इलाज में बीत गया। इस बीतने में शामिल था घर की खुशी का बीतना। सभी की हँसी का बीतना। वह बोल नहीं पाता, यह एक भयावह आघात था। माँ उसके सभी काम में ज्यादा वक्त लगाने लगी। नहलाना-धुलाना शौच आदि। वह कभी भी, कहीं भी पेशाब कर लेता। पाखाना भी कपड़ों में कर देता। शुरू-शुरू में इस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। लगा जैसे यह सामान्य बात हो। समय के साथ यह ठीक हो जाएगा, इस उम्मीद में दिन सरकते गये। लेकिन जब यह रोज का काम होने लगा तो मानो पूरे घर पर चिंता के बादल। यही बातचीत कि कहीं यह मँद बुद्धि तो नहीं। फिर उसके स्वभाव और हरकतों को पढ़ा जाने लगा। जैसे उसका अनवरत् मुस्कुराना। जिस मुस्कान पर सभी न्यौछावर थे, उससे एक खीझ सी होने लगी। ‘मुन्ना’ शब्द जब कोई उचारता, वह पलटता और मुस्कुराने लगता। वह लगभग झपटके आता और पाँवों से चिपट जाता। पहले उसके चिपटने में आनन्द की अनुभूति होती और इधर एक खीझ जो चेहरे पर साफ पढ़ी जा सकती थी। वह अब भी गोद में बैठने को ललकता-झपटता लेकिन लोग किनाराकशी करते कहीं वह पेशाब न कर दे। उसके चेहरे पर अब उसकी अनदेखी का दर्द झलकने लगा था। उसके संसार से बाहर के लोग अब दूर हो रहे थे और घर के चंद लोगों के बीच उसका होना था जिसमें अनदेखी, उपेक्षा और दूरी का बनता एक अनचाहा माहौल था। वह अब घर को कुछ चीजों का हो गया था जिसमें बर्तन थे जिन्हें वह बजाया करता। सांकल जिसे वह खड़खड़ाता। अपने गले से अजीब सी आवाजें निकालता और उनमें खोया रहता। अपनी सुध-बुध खो देने की विकट स्थिति में वह अपनी पेशाब से छप-छप की आवाज के साथ खेलता। एक किशोर होते बच्चे को इस स्थिति में संभालना अब एक दुष्कर कार्य था। माँ-पिता काम पर जाते समय, अब बाहर से दरवाजा बंद करने लगे ताकि वह सड़क पर निकलकर किसी गाड़ी से टकरा न जाए। हम घर पर उसके साथ अब एक कठिन समय बिताते। वह चाकू, फावड़ा, गेंती कुछ मिल पाने पर जमीन खोदने लगता। रोज कुछ-न-कुछ खुदा हुआ सामने होता। वह कुछ न कुछ ध्वनियाँ या
आवाजें  अपने पास चाहता। अगर किसी बोलने की आवाज सुनाई न देती तो वह बैचेन हो जाता। उसकी मुस्कान अब मुरझा रही थी। उसके हँसने में अब रोने की आवाजें अधिक थीं और इतनी मर्मभेदी कि हम बाज-दफा रो पड़ते और उसे बहलाने का यत्न करते। वह घर में माँ के अलावा सबसे भीतर ही भीतर दूर जा रहा था। हमारे भीतर ममता और वात्सल्य की भावना में जो कभी आ चुकी थी, उसे वह पहचान रहा था। इसलिए वह माँ के लौटने की प्रतीक्षा करता। माँ के आने पर उसका जीवन एक फूल की हँसी सा खिल उठता। उसके आने पर उसके उत्साह, प्रेम और आनंद को देखकर हमें माँ के होने का ईश्वरत्व पता चलता। कोयले के खदान सी निकली काली घुस्स माँ की आवाज पर ऐसे भागता-लगता मानो कमान से छूटा तीर। वे माँ-बेटे के मिलन के दृश्य ऐसे थे कि जिन्हें मैंने न कहीं पढ़ा, न किसी फिल्म में देखा। एक गहरा मौन, डबडबाती आँखें, आँखों में ऐसा उत्कट प्रेम, अधरांे की थरथराहट, गले का रुँधना, साँसों की आवाज, बेसाख्ता बेटे को अंक में भरने और चूमने का दृश्य और कोयले की धूल से अटेचेहरे पर आँसुओं की बहती बेतरतीब धार...वह प्रेम का कोई ऐसा अमर दृश्य था जिसे हजारों बार देखने के बावजूद, न उसे पूरी तरह लिखा जा सकता है, न फिल्माया जा सकता है...केवल वही क्षण थे जब भाई का गूँगा, मँद बुद्धि होना माँ शायद भूल जाती थी...वह बस एक दैवीय स्त्राी की तरह लगती थी तब...। बाद में आँसू पोंछती हुई उसे साथ में लिए पिछवाड़े जाती हुई, कब वह एक घरेलू स्त्राी में तब्दील हो जाती थी पता ही नहीं चलता था...



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