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Monday, February 7, 2011

मैं हर बरस लौटता हूँ


(1)

बिन चाहते
हम खड़े हैं
किनारों पर
बीच में नदी बह रही है

(2)

पहनी हुई वर्दी
उतारकर
कहा उसने
आज मैं छुट्टी लूँगा

आज मैं गोली नहीं चलाऊँगा

(3)

मैं हर बरस लौटता हूँ
धरती के इस टुकड़े पर
जहाँ ईंट के भट्टे लगे हैं

पहलेे यहाँ मेरा खेत था

(4)

तुम समोसे खाते हो गपागप

समोसे खाना
सिर्फ सुधीर जानता हे

उसे आती है भूख को
जीतने की कला

(5)

खाने का स्वाद
संजीव कपूर से पूछो

भूख का स्वाद
जानता था जो

अभी-अभी मरा है

(6)

मैं हिन्दी का लेखक हूँ

मेरे बच्चे अंग्रेजी पढ़ते हैं

(7)

ईश्वर क्या है
एक दुकान

कितने धर्मों से
अपना सफल व्यवसाय करता है
ईश्वर का धन्धा कभी घाटे में नहीं चलता

(8)

मैं सब्बल हूँ
मैं गैंती
फावड़ा मैं
मैं बेलचा हूँ
मैं क्रांति का हथियार हूँ

(9)

इंटक यूनियन

दलाल है?
खदाने घाटों से पट गई हैं

(10)

हड़ताल पर पाबंदी है
हड़ताल विकास के विरुद्ध है

हम जेल जाने को तैयार हैं

(11)

मैं आदिवासी खदान से निकली
मैं काली हूँ

सुंदरता की पहचान में
ईश्वर चूक गया

(12)

मेरा मूल्य है
मुझे लाया गया
मैंने नारे लगाये

नारे झूठे थे

झूठ की क़ीमत से
मैंने आज रोटी खायी

(13)

मैं चोर हूँ
हत्यारा हूँ
मैं बलात्कार में प्रवीण हूँ

मैं टिकिट प्रार्थी हूँ

(14)

युद्ध जीतने से
ख़त्म नहीं होगी
यह जाति की लड़ाई है

(15)

जहाँ-जहाँ
दुनिया में बसे हैं वे
एक सुर हैं
ब्राह्मण एक हैं दुनिया में

(16)

मैं गाँव से आया था
सब कुछ लुट जाने के बाद

उन्होंने मुझे नौकरी दी
नौकरी के पैसों में
दो जून की रोटी थी और एक सपना

मैं कभी गाँव न लौट सका

(17)

मैं स्त्राी हूँ
सौंदर्य का
अंतिम प्रतिमान

मैं प्रकृति
मैं ईश्वर की माया नहीं

(18)

मैंने गुफाओं की देह पर
रचे जो चित्रा
अब तक अमर हैं

तुम्हारे चित्रों के लिए
ईश्वर तुम्हें क्षमा करे

(19)

तुम्हारी उस बही पर
लिखा है जो
सब जानते हैं

कहाँ है तुम्हारी आत्मा की बही

यह जानने में हर बार भूल हुई
हर बार बिका एक और खेत

(20)

तरह-तरह की छेनियाँ
एक हथौड़ी
और एक जोड़ी कुशल हाथ

एक नयी दुनिया
कभी भी बनाई जा सकती है
(21)

नटिनी के पाँवों में चमत्कार है
लोग उसका
चलना नहीं

फिसलना देखना चाहते हैं

(22)

शांति के लिए,
तुम लाये कबूतर
और 21 तोपों की सलामी

कबूतर नहीं बचे
शांति के लिए कई 21 तोपे हैं

(23)

सब कुछ मिलता है
इस बाज़ार में

पानीदार मनुष्य नहीं मिलता

(24)

साड़ियों पर ढाले ये रंग
हमने वसंत से लिये

रंगों में उतरने का हुनर तुम क्या जानो

(25)

एक तरफ़ ख़जाना था
एक तरफ़ लोग

लोगों के हाथों में दरातियाँ थीं

(26)

कफ्र्यू में जब
बाहर निकलने पर
गोली मारने का हुक़्म था

एक पागल सड़क पर दौड़ रहा था
गालियाँ दे रहा था खुले-आम

(27)

बहस के लिए
एक-दूसरे में प्रतियोगिता
और यह संसद नहीं

यहाँ बकवास नहीं हो रही थी

(28)

बीर बहूटी से रक्तिम अधर

नहीं-नहीं
ये तुम्हारी लिपस्टिक से उतरा रंग नहीं

(29)

तुम्हें चाहिए
डाॅक्टर द्वारा प्रमाणित
टूथपेस्ट

मैं पुरखों द्वारा रजिस्टर्ड
दातून करता हूँ

(30)

मैं वो स्त्राी हूँ
जिसके भाग्य में
ससुराल नहीं

मैंने कोख में नाचना शुरू कर दिया था

(31)

उसका जल
दूसरे समुद्रों की तरह है

उसे ‘काला पानी’
गोरों ने बनाया।

(32)

मैं कौन हूँ
पूछा एक स्त्राी ने

कहा उसने
हँसी-ठिठोली का सामान

(33)

वह ताउम्र का
अँधकार है

वह भोर की कविता लिखती है

(34)

हमें भूख लगी थी
और प्यास

‘महुआ’ का पेड़
टप-टप करता हुआ

दौड़ कर आया हमारे पास

(35)

मैं खूँटे से बँधी
अधज कड़ी
परछाईं हूँ

मैंने गिरमा काटना1 शुरू कर दिया
1. पशुओं के गले में बाँधी जाने वाली रस्सी

(36)

स्वीकार किया मैंने
जिस दिन उसे पति

मेरी गुलामी की कथा आरम्भ हुई

(37)

यह सुरक्षा की बेड़ियाँ हैं
मैंने इन्हें पिघलाना शुरू कर दिया

(38)

मैं बटखरा हूँ
यह बाज़ार
मेरे बिना चल नहीं सकता

(39)

तुमने क्या देखे
‘आँसू’

मैंने किसान की आँखों में
बादल देखे

(40)

रूप की हाॅट में
गाये जाते हैं जो गीत

उनमें चिड़ियों के कराहने की
आवाज़ सुनाई देती है

(41)

चोरों का कोई ईमान नहीं होता
कहनात है पुरानी

हिस्से-बँटवारे में
उनका ईमान अटल है

इस पर किसी को संदेह नहीं

(42)

जानवर धोखे से मारने की
कला नहीं जानता
उसके चलाक़ी भरे आक्रमण को
जानते हैं जंगल के जीव
मनुष्य के बारे में
यह क़िस्सा आम है
कि वह हमेशा धोखे से वार करता है

(43)

हम डरते हैं जिस समंदर से
मछलियाँ
उसी से इश्क़ करती हैं

मछलियाँ
कितनी छोटी सामने उसके
यहाँ तक विशालकाय व्हेल

इश्क की कोई सीमा नहीं

(44)

खिले हुए फूलों में
पत्तों में
डूबने वालें

देखो, यह जो पत्ता झरा हैं
अभी-अभी
वसंत की आमदा के लिए
त्याग का अनुपम उदाहरण है

(45)

कुछ यादें
जीवन काल में अमर बनी रहती हैं

पिता के गुजर जाने की
धुँधली याद
अमर है

(46)

ईंट, गिट्टी ढोते हुए
बेडौल हो गया है यह तसला

कितने दिनों से
बजाना इसे बंद हुआ
एक उम्र से जैसे
माना मैंने बंद किया

(47)

दीवार नहीं चाहती
अपनी देह पर
कोई विज्ञापन
कोई झूठा पोस्टर

सूनी दीवार की आवाज़ से
ज्यादा असरदार कुछ नहीं

(48)

बाज़ार से ख़रीदी गयी उ$न से
बने स्वेटर के
एक-एक फंदे से
उभरती ख़ूबसूरती में
अनुभव है उँगलियों का

इसकी तुलना करना
अपमान है प्रेम का

(49)

चुप्पी का अर्थ
कायरता नहीं

वह स्त्राी कभी भी बोल कर
हतप्रभ कर सकती है

(50)

मेरी हँसी का रंग
स्याह है

कभी देखा आपने?

(51)

बाज़ार एक जाल है
हम उनकी मकड़ी नहीं
हम मुक्ति के गायक हैं
बाज़ार हमसे डरता है

2 comments:

संजय भास्‍कर said...

बहुत प्रेरणा देती हुई सुन्दर रचना ...

संजय भास्‍कर said...

वसन्त की आप को हार्दिक शुभकामनायें !